नेताजी की मौत की खबर पर ब्रिटिश सरकार और नेहरू की प्रतिक्रिया ये थी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ क्या घटित हुआ? क्या वो सचमुच 18 अगस्त 1945 को फारमोसा में ताई होकू हवाई अड्डे के पास विमान दुर्घटना में मारे गए थे?...

नेताजी की मौत की खबर पर ब्रिटिश सरकार और नेहरू की प्रतिक्रिया ये थी

1945-46 में भारत के वायसराय रहे वावेल ने अपनी पहली प्रतिक्रिया के एक माह बाद डायरी में लिखा, "सिंगापुर के जापानियों के अनुसार सुभाष चंद्र बोस की निश्चित ही मृत्यु हो चुकी है, लेकिन जब तक आगे और पुष्टि नहीं हो जाती मुझे शंका बनी रहेगी।" 23 अगस्त 1945 को जापानी प्रसारण सुनने के बाद वावेल ने अंग्रेज और भारतीय विशेषज्ञों की एक मिली-जुली टीम जांच के लिए भेजी और कहा, "बोस को गिरफ्तार कर लाओ, जिंदा या मुर्दा।"

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वावेल की टीम ने क्या निष्कर्ष निकाले वह पूरी तरह बताया नहीं गया। लेकिन प्रेस को यह खबर लीक की गई कि कथित विमान दुर्घटना में मारे गए हैं। लेकिन वावेल की वास्तविक राय कथित विमान दुर्घटना के 67 दिन बाद ब्रिटेन की ऐटली सरकार को वावेल के गृह सचिव आर एफ मूडी ने भेजी। इस रिपोर्ट में टॉप सीक्रेट लिखा था। और सत्ता हस्तांतरण 1942-47 के ब्रिटिश दस्तावेज के खंड 6 में, जोकि 30 वर्ष बाद प्रकाशित हुई थी, वह रिपोर्ट छपी थी। जिसमें यह संभावनाएं व्यक्त की गई थी।

1. सुभाष चंद्र बोस को युद्ध घोषित करने के अपराध अथवा शत्रु के एजेंट का काम करने के अपराध संबंधी अध्यादेश के अंतर्गत भारत लाकर उन पर अभियोग चलाया जाए।
2. बर्मा या मलाया की अदालत में उन पर उन देशों के राजाओं के विरुद्ध युद्ध का संचालन करने के अपराध में अभियोग चलाया जाए।
3. भारत से बाहर एक सैनिक अदालत उन पर मुकदमा चलाएं।
4. उन्हें भारत में नजरबंद करके रखा जाए।
5. ब्रिटिश स्वामित्व वाले किसी अन्य स्थान मसलन सीचेलस द्वीप ने उन्हें नजरबंद रखा जाए।
6. वह जहां भी हो वहां रहने दिया जाए और समर्पण का आग्रह न किया जाए।

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सभी संभावनाओं पर विचार कर अंत में सुझाया यह गया कि वे जहां है वहीं रहने दिया जाए और उनकी रिहाई की मांग भी ना की जाए। संभव है कि स्वयं रूसी लोग किन्हीं परिस्थितियों में उनका स्वागत करें उससे कोई बहुत राजनीतिक मुश्किल तत्काल नहीं पैदा होगी।
ना तो भारत की वावेल सरकार ने और ना ही ब्रिटेन की ऐटली सरकार ने सुभाष की मृत्यु की रिपोर्ट की कोई अधिकृत पुष्टि की। यद्यपि भारतीय साम्राज्य का दुश्मन नंबर एक दर्ज किया गया था। दोनों ही सरकारें सुभाष बोस के रूप में होने की रिपोर्ट पर खामोश बनी रही।

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नेहरू का टालमटोल
नेताजी की मृत्यु इस कथा पर भारत में कोई भी विश्वास नहीं कर रहा था। शिकागो ट्रिब्यून के प्रतिनिधि अमेरिकी पत्रकार अल्फ्रेड वेग ने 29 अगस्त 1945 को दिल्ली में पंडित नेहरू से कहा कि जापानी प्रसारण के बाद बोस जिंदा थे, और 4 दिन पहले उन्हें सैगाव में देखा गया है। 11 सितंबर 1945 को स्वयं नेहरू ने झांसी में एपीआई के प्रतिनिधि से कहा था, "अन्य लोगों की तरह मुझे भी सुभाष चंद्र बोस की मौत के किस्से पर यकीन नहीं है, मुझे ऐसी कई रिपोर्ट मिली है जिन्होंने मुझको गहरे संशय में डाल दिया है और मैं मौत की खबर को प्रामाणिक नहीं मानता हूं"।

प्रतीक देशभक्त भारतीय को आशा थी कि 15 अगस्त 1945 को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने के बाद जवाहरलाल नेहरु इसे अपना प्रमुख राष्ट्रीय कर्तव्य मानेंगे की एक उच्च स्तरीय जांच कराकर यह पता लगाएंगे कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ सचमुच क्या हुआ था। लेकिन सुभाष चंद्र वह उसके बारे में किसी तरह की जांच की हर एक प्रार्थना को भी अविचारणीय और अस्वीकार्य बताते रहे। खुद सार्वजनिक रूप से यह कह चुकने के बाद कि मुझे सुभाष की मौत की खबर पर भरोसा नहीं है, नेहरू उच्च स्तरीय जांच समिति स्थापित करने से क्यों बचते रहे और भरोसेमंद जांच की मांग को क्यों स्वीकार करते रहे? यह रहस्य है।

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गुजराती दैनिक जन्मभूमि के संपादक रहे स्वर्गीय अमृतलाल सेठ में एक लेख लिखा था, इससे यह पता चलता है कि नेहरू के मन में क्या था। जब नेहरू 1946 में माउंटबेटन के मेहमान के तौर पर सिंगापुर गए थे तब अमृतलाल सेठ नेहरू के साथ गए थे। उन्होंने भारत आकर शरद चंद्र बोस को यह जानकारी दी की माउंटबेटन ने नेहरू को चेतावनी दी है कि "यदि वे बोस और उनके आजाद हिंद फौज को महत्व देते रहे तो बोस के भारत लौटने पर भारत को उनके हाथों सौंपने का जोखिम उठा रहे हैं।" इस सलाह पर पंडित जी खुद सिंगापुर से ही अमल करने लगे। उन्होंने सिंगापुर में आजाद हिंद फौज के उस स्मारक स्थल पर पुष्प माला चढ़ाने के कार्यक्रम को रद्द कर दिया जिस स्मारक को सिंगापुर में कब्जे के बाद अंग्रेजी फौजों ने तहस-नहस कर डाला था। भारत आने के बाद नेहरू नेताजी और आजाद हिंद फौज के बारे में एकदम खामोश बने रहे।

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पंडित नेहरू ने संसद में और संसद के बाहर उठी न्यायिक जांच की हर मांग को अनसुना कर दिया। और 10 साल तक वह नेता जी के अदृश्य रहने की सच्चाई के बारे में किसी तरह की जांच से बचते रहे। जब कोलकाता के नागरिकों ने 1956 में प्रसिद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त न्यायाधीश डॉ राधा विनोद पाल की अध्यक्षता में एक गैर सरकारी जांच समिति स्थापित करने का निश्चय किया, तब सहसा नेहरू ने शाहनवाज खान की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित किए जाने की घोषणा कर दी। जबकि शाहनवाज खान को न्यायिक जांच की कोई योग्यता नहीं थी। जब यह समिति जांच कर ही रही थी तभी पंडित नेहरू ने संसद में बयान दे डाला, "मुझे इस तथ्य के बारे में बिल्कुल भी शक नहीं रह गया है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मामला निस्संदेह निश्चित हो चुका है"। निस्संदेह निश्चित हो चुके तथ्य के विरुद्ध उनके द्वारा बैठाई गई शाहनवाज खान की जांच समिति क्या जांच करने का साहस करती।

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तथापि इस रिपोर्ट से कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों के बारे में पता चला। यह दस्तावेज 1947 से 10 वर्षों तक गुप्त रखे गए थे। इनसे पता चला कि गुप्तचर रिपोर्ट के अनुसार नेता जी ने सोवियत रूस में शरण ली हो और मौत का किस्सा फैला दिया हो, इसकी ही संभावना सर्वाधिक है। दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि नेता जी ने गांधीजी और नेहरू को पत्र लिखे थे जिसमें उनसे कहा था कि उनकी भारत वापसी के लिए प्रबंध किए जाएं। जाहिर है कि नेहरू ने 10 वर्षों तक इन दस्तावेजों को छुपाए रखा।

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1951 में नेहरू ने नेताजी की आजाद हिंद सरकार के जनसंपर्क मंत्री रह चुके एस ए अय्यर को टोक्यो भेज कर कर्नल टाडा से चुपचाप संपर्क करने को कहा। और यह पता लगाने को कहा कि नेताजी की मौत की रिपोर्ट सही है या गलत। अय्यर ने नेहरू को जो गोपनीय रिपोर्ट दी उसमें कहा गया था, "इस बार मैं बहुत महत्वपूर्ण सूचना जुटा लाया हूं। कर्नल टाडा ने मुझसे कहा कि युद्ध के बाद जब जापान ने समर्पण किया, तेरौची ने नेताजी की मदद की पूरी जिम्मेदारी ली और कर्नल टाडा से कहा कि वे काका बोस तक जाएं। और उन्हें रूसी सीमा में पहुंचने को कहें। उन्हें पूरी मदद दी जाएगी"। नेहरू ने लोकसभा में अय्यर की रिपोर्ट के उन अंशों का हवाला तो दिया जिनसे को क्यों प्रसारण का समर्थन होता दिखता था, परंतु इस अंश को वे दबा गए। परंतु ऐसा लगता है कि मौत की पहले उनकी चेतना ने उन्हें कचोटा और नेहरू ने 13 मई 1962 को नेता जी के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस के पत्र के उत्तर में उन्हें लिखा, "आपने मुझे सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु का प्रमाण भेजने को कहा है। मैं कोई निश्चित और प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं भेज सकता।" अपनी मौत की लगभग 1 महीने पहले नेताजी के भतीजे अमिय नाथ बोस को उनके पत्र का उत्तर देते हुए नेहरू ने लिखा, "मैं तुमसे इस बात पर सहमत हूं कि नेताजी की मौत के मसले को आखरी तौर पर हल करने के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए।"

नेताजी के साथ क्या हुआ था?
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ क्या घटित हुआ? क्या वो सचमुच 18 अगस्त 1945 को फारमोसा में ताई होकू हवाई अड्डे के पास विमान दुर्घटना में मारे गए थे? उनकी मृत्यु का जो प्रसारण किया गया था वह केवल डोमई न्यूज़ एजेंसी के द्वारा प्रसारित खबर थी। जबकि कायदे से जापान के किसी नागरिक अथवा सैनिक आधिकारिक बयान के द्वारा ही यह प्रसारण स्वभाविक होता। तब तक जापान संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना के कब्जे में नहीं आया था।

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बहरहाल यह प्रसारण कथित विमान दुर्घटना के 5 दिन बाद किया गया। और बताया गया कि स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार के प्रधान श्री सुभाष चंद्र बोस नहीं रहे। विमान दुर्घटना में मारे गए और उनका शव टोक्यो लाया गया है। इसके कुछ दिनों बाद ही अन्य प्रसारण में यह कहा गया कि उनके शव की अंत्येष्टि फारमोसा में ही कर दी गई थी। इसी परस्पर विरोधी और बदलते रूपों के कारण इन प्रसारणों पर किसी ने विश्वास नहीं किया। कोई भी साक्ष्य या दस्तावेज इस दुर्घटना की पुष्टि में प्रस्तुत नहीं किया गया। इस प्रसारण पर ना तो महात्मा गांधी ने विश्वास किया और ना ही भारत के तत्कालीन वायसराय वाबेल ने।

गांधी जी ने भारतीयों से बार-बार कहा कि नेताजी की मृत्यु की खबर पर मुझे भरोसा नहीं है। 30 दिसंबर 1945 को बंगाली बंधुओं से उन्होंने कहा यदि कोई उनकी भस्म भी लाकर दिखा दे तब भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि सुभाष जीवित नहीं है। वह निश्चय ही जीवित है और कहीं छिपे हुए हैं।

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