अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजा हिंदी का स्वर
हिंदी की वैश्विक पहचान, सांस्कृतिक एकता और भाषा-विज्ञान से जुड़ी चुनौतियों पर केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया...
वैश्विक पहचान, भाषा-विज्ञान और शिक्षा नीति पर हुई तीखी बहस
लखनऊ/नई दिल्ली। हिंदी की वैश्विक पहचान, सांस्कृतिक एकता और भाषा-विज्ञान से जुड़ी चुनौतियों पर केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया, जिसमें भारत सहित यूरोप, एशिया और अमेरिका के कई देशों से विद्वानों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया। सम्मेलन में हिंदी को वैश्विक संवाद की भाषा के रूप में स्थापित करने और उसकी वर्तमान समस्याओं पर गंभीर मंथन हुआ।
इस क्षेत्रीय सम्मेलन में स्वीडन से हेंज वर्नर वेस्लर, डेनमार्क से अर्चना पैन्यूली, नीदरलैंड से सुश्री रितु नन्नन पांडे, यूनाइटेड किंगडम से ऋचा जैन, जर्मनी से श्रीमती श्रद्धा मिश्रा, बुल्गारिया से सुश्री मिलेना ब्रतोएवा, स्पेन से एनरिक गैलुड जार्डिएल, आर्मेनिया से सुश्री गयाने नज़रियान, पोलैंड से एलेक्जेंड्रा एंटोनिया ट्यूरेक, तुर्की से कनान योगुर्त, हंगरी से डॉ. पीटर सागी, रोमानिया से डॉ. मारियस पार्नो एवं मिरेला क्रेस्टी, मोल्दोवा से इयाज़ू स्वेतलाना, क्रोएशिया से सुश्री माताएआ वेडिल्जा, कज़ाख़स्तान से दारिगा कोकेयेवा, अमेरिका से प्रो. इंद्रजीत सिंह सलूजा और सर्बिया से प्रेड्रैग सिकोवच्की शामिल हुए। भारत से प्रो. नवीन कुमार एवं डॉ. के. डी. सिंह गौर ने सम्मेलन में सहभागिता की। विदेश मंत्रालय की प्रतिनिधि श्रीमती सचेतना स्नेही भी पूरे सम्मेलन के दौरान उपस्थित रहीं।
सम्मेलन के अंतर्गत कुल चार सत्र आयोजित किए गए। 28 जनवरी को हुए पहले सत्र का विषय था “हिंदी: वैश्विक पहचान और सांस्कृतिक एकता”, जिसमें वक्ताओं ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद और सांस्कृतिक सेतु के रूप में विकसित करने पर बल दिया। दूसरे सत्र में “हिंदी भाषा-विज्ञान की वास्तविक समस्याएँ” विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ, जिसमें शिक्षण, शोध और व्यावहारिक उपयोग से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित किया गया।
सम्मेलन के पहले ही दिन डॉ. के. डी. सिंह ने भारत की शिक्षा नीति पर तीखा प्रहार करते हुए इसे मैकॉले के षड्यंत्र की परंपरा से जोड़ दिया। उन्होंने भारत में हिंदी की वर्तमान स्थिति पर कड़ी आलोचना की, जिससे सम्मेलन में तीखी बहस और गंभीर विमर्श का माहौल बन गया।
विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि हिंदी को केवल भावनात्मक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और वैश्विक संवाद की सशक्त भाषा के रूप में विकसित करना समय की मांग है। सम्मेलन में हिंदी के भविष्य को लेकर ठोस नीतिगत पहल और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
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