क्या बुंदेलखंड केवल मज़दूरों का उत्पादन केंद्र बनकर रह जाएगा?
यह प्रश्न आज बुंदेलखंड के भविष्य से जुड़ा सबसे गंभीर और मूलभूत प्रश्न बन चुका है...
यह प्रश्न आज बुंदेलखंड के भविष्य से जुड़ा सबसे गंभीर और मूलभूत प्रश्न बन चुका है। क्या बुंदेलखंड की पहचान केवल पलायन, बेरोज़गारी और मज़दूरी तक सीमित रह जाएगी, या फिर यहाँ भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरह औद्योगिक और शैक्षणिक अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का विकास होगा?
शिक्षा में क्षेत्रीय असमानता की सच्चाई
उत्तर प्रदेश देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ दो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) स्थित हैं। देश में कुल 23 IIT हैं, जिनमें अधिकांश राज्यों में एक-एक IIT है, कई राज्यों में तो एक भी नहीं है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश को दो IIT मिले, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि बुंदेलखंड जैसे पिछड़े और पलायन-प्रभावित क्षेत्र में एक भी IIT या IIM जैसा उच्च तकनीकी संस्थान मौजूद नहीं है।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में कुल 6 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। इनमें से झाँसी में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किया गया है, लेकिन वह भी मुख्यतः कृषि शिक्षा तक सीमित है।तकनीकी शिक्षा, मानविकी (Arts), साहित्य, सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों के लिए बुंदेलखंड में एक भी पूर्ण केंद्रीय विश्वविद्यालय उपलब्ध नहीं है।
परिणामस्वरूप झाँसी और आसपास के छात्रों को तकनीकी शिक्षा के लिए मध्य प्रदेश (ग्वालियर) तक पलायन करना पड़ता है। हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि बुंदेलखंड के युवाओं को बुनियादी शिक्षा के लिए भी अपना क्षेत्र छोड़ना पड़ रहा है।
बेरोज़गारी और पलायन का दुष्चक्र
बुंदेलखंड आज देश के उन क्षेत्रों में शामिल है जहाँ से सबसे अधिक पलायन होता है। शिक्षा का अभाव, उद्योगों की कमी और रोज़गार के सीमित अवसर इस पलायन को मजबूरन जन्म देते हैं। जब शिक्षा नहीं होगी, तो उद्योग नहीं आएँगे और जब उद्योग नहीं आएँगे, तो पलायन ही एकमात्र विकल्प बचेगा।
हम 2047 तक “विकसित भारत” बनने की बात करते हैं, लेकिन यदि देश के किसी बड़े क्षेत्र में बुनियादी शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था ही नहीं होगी, तो क्या यह विकास केवल आँकड़ों और भाषणों तक सीमित नहीं रह जाएगा?
औद्योगीकरण: बुंदेलखंड से भेदभाव क्यों?
यदि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में औद्योगिक अवसंरचना विकसित की जा सकती है, पूर्वी उत्तर प्रदेश को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है, तो फिर बुंदेलखंड में औद्योगीकरण क्यों नहीं हो सकता?
हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही। इसके अंतर्गत कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए गए—
- डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर
- जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट
- एक्सप्रेसवे नेटवर्क (यमुना, गंगा)
- इंडस्ट्रियल सिटी डेवलपमेंट
नोएडा, आगरा, बरेली जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश हुए, लेकिन सवाल यह है कि क्या बुंदेलखंड को इनमें से एक भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रोजेक्ट नहीं मिल सकता था? आँकड़े साफ बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में आए अधिकांश बड़े प्रोजेक्ट पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहे हैं।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में 5 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं— लखनऊ, वाराणसी, कुशीनगर, अयोध्या और नोएडा। लेकिन बुंदेलखंड में एक भी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नहीं है।
केंद्र और राज्य की विकास नीति पर सवाल
जिस प्रकार केंद्र सरकार पर यह आरोप लगते रहे हैं कि बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट गुजरात-केंद्रित हैं, उसी प्रकार राज्य स्तर पर भी यह धारणा बनती जा रही है कि उत्तर प्रदेश के बड़े प्रोजेक्ट केवल पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों तक सीमित हैं। बुंदेलखंड इस विकास मॉडल में लगातार हाशिये पर खड़ा दिखाई देता है।
निष्कर्ष
बुंदेलखंड की समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नीतिगत और राजनीतिक प्राथमिकताओं की समस्या है। यदि समय रहते शिक्षा, तकनीकी संस्थानों, उद्योगों और आधारभूत संरचना में निवेश नहीं किया गया, तो बुंदेलखंड केवल मज़दूरों का “सप्लाई ज़ोन” बनकर रह जाएगा। विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार हो सकता है, जब उसका हर क्षेत्र—विशेषकर बुंदेलखंड जैसे उपेक्षित क्षेत्र— समान अवसर, शिक्षा और औद्योगिक विकास का हिस्सा बने। अन्यथा यह सपना केवल भाषणों, आँकड़ों और पोस्टरों तक ही सीमित रह जाएगा।
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