आज़ादी के नायकों से सोशल मीडिया के नायकों तक : कहाँ आ पहुँचा हमारा युवा नेतृत्व?
विचार और रास्ते अलग-अलग थे, लेकिन मंज़िल एक थी भारत की स्वतंत्रता। आज हम जिस स्वतंत्र भारत में साँस लेते हैं, उसके पीछे केवल...
एक वक़्त था, जब इस देश के युवाओं के सामने महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, रानी लक्ष्मीबाई, सरदार वल्लभभाई पटेल, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, मंगल पांडे, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, सुखदेव, राजगुरु, बेगम हज़रत महल और सरोजिनी नायडू जैसे व्यक्तित्व प्रेरणा बनकर खड़े थे। इनके पीछे सैकड़ों नहीं, हज़ारों और लाखों भारतीय चले। किसी ने अहिंसा को अपना हथियार बनाया, किसी ने क्रांति को, किसी ने कलम उठाई और किसी ने अपना जीवन तक देश के नाम कर दिया। विचार और रास्ते अलग-अलग थे, लेकिन मंज़िल एक थी भारत की स्वतंत्रता। आज हम जिस स्वतंत्र भारत में साँस लेते हैं, उसके पीछे केवल कुछ बड़े नाम नहीं, बल्कि उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात भारतीयों का संघर्ष और बलिदान है, जिन्होंने शायद यह जानते हुए भी लड़ाई लड़ी कि स्वतंत्र भारत देखने के लिए वे स्वयं जीवित न रहें। वो दौर था, जब नेतृत्व का अर्थ केवल लोगों को प्रभावित करना नहीं, बल्कि उनके भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का साहस पैदा करना था। जब लोकप्रियता की कसौटी ‘फॉलोअर्स’ की संख्या नहीं, बल्कि विचारों के पीछे खड़े लोगों का विश्वास और त्याग हुआ करता था। और आज समय ने करवट ली है। आज अभिजीत, ध्रुव राठी और प्रकाश राज जैसे सोशल मीडिया से जुड़े या सार्वजनिक जीवन के चेहरे भी युवाओं के बीच राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं और बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनते हैं। लेकिन सवाल यह नहीं कि कौन सही है और कौन गलत। सवाल यह है कि भारत का युवा अपना वैचारिक नेतृत्व किसे सौंप रहा है? क्या किसी के लाखों फॉलोअर्स होना उसकी हर बात को सही मान लेने के लिए पर्याप्त है? क्या वायरल होना ही विश्वसनीय होने का प्रमाण बन गया है? क्या हम किसी वीडियो, भाषण या पोस्ट को सुनने के बाद उसके तथ्यों को स्वयं जाँचते हैं, या फिर वही हमारी राय बन जाती है? देश को प्रश्न पूछने वाले युवाओं की ज़रूरत है, लेकिन उतनी ही ज़रूरत उन युवाओं की भी है जो उत्तर सुनने से पहले तथ्य परखना जानते हों। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली युवा वह नहीं है जो सबसे ऊँची आवाज़ के पीछे चल पड़े बल्कि वह है जो हर आवाज़ को सुने, तथ्य समझे, इतिहास पढ़े और फिर अपना मत स्वयं बनाए। आज के भारत को किसी व्यक्ति की अंधभक्ति या अंधविरोध से अधिक जागरूक, शिक्षित और स्वतंत्र सोच रखने वाली युवा पीढ़ी की आवश्यकता है। चेहरे बदलते रहेंगे, माध्यम बदलते रहेंगे, विचार भी बदलेंगे लेकिन राष्ट्रहित में सोचने और सच को परखने की जिम्मेदारी हर पीढ़ी की अपनी होती है।
Purti Nigam
Journalist | Entrepreneur
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