रामगिरि पर मौजूद हैं माता के पीठ

रामगिरि पर मौजूद हैं माता के पीठ

वेद कहते हैं कि राम के आगमन से पूर्व सतयुग के प्रारम्भ से चित्रकूट एक बहुत सुन्दर देवी पीठ था। श्रीराम व माँ जानकी ने यहां पर देवी की आराधना की और शक्तियां अर्जित कीं। तंत्र चूड़ामणि, ज्ञानार्णव दाक्षायणी तंत्र, योगिनी हृदय तंत्र व शिव चरित्र सहित अनेक ग्रंथ यहां पर शक्तिपीठ होने की पूर्ण पुष्टि करते हैं। ग्रंथ इसे पीठों में सर्वोत्तम पीठ होने की संज्ञा देते हैं। तंत्र चूड़ामणि ‘रामगिरौ स्तरनान्यंप चपरिभाषित करता है तो देवी भागवत व मत्य्ूड़ापुराण में ‘चित्रकूटे तथा सीता विन्येषित विंध्यवासिनीकी पुष्टि करता है। तांत्रिक लक्ष्मी कवच तो सीधे तौर पर ‘सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूट निवासिनी। भयं हरते् सदा पायाद् भव बंधनात् विमुच्य्ते।।परिभाषित करता है।

चित्रकूट का नाम सामने आते ही लोगों को याद आते हैं राम। याद आती हैं चित्रकूट वो शिलाएं जो भाईयों के प्रेम को देखकर पिघल गईं थी। लेकिन उससे बड़ा एक सच यह भी है कि आखिर भरद्वाज मुनि ने श्री राम को चित्रकूट ही क्यों भेजा? वह चाहते तो एक बार फिर श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र के पास भेज सकते थे या फिर ऋषि वाल्मीकि के पास ही चैदह वर्ष रहने का निर्देश दे देते। श्रीराम का चित्रकूट में साढे़ ग्यारह वर्ष से ज्यादा का समय गुजारना, सब कुछ देवताओं व ऋषियों की योजना के अनुसार हुआ। वास्तव में ऋषि अगस्त्य, अंगिरा, सरभंग, सुतीक्ष्ण सहित अन्य ऋषियों से उन्हें राक्षसराज रावण को मारने के लिए आयुध प्राप्त तो करने ही थे, साथ ही यहां पर माँ मोक्षदा से उन्हें शक्तियां भी अर्जित करनी थीं। वेद कहते हैं कि राम के आगमन से पूर्व सतयुग के प्रारम्भ से यह स्थान एक बहुत सुन्दर देवी पीठ था। श्रीराम व माँ जानकी ने यहां पर देवी की आराधना की और शक्तियां अर्जित कीं। तंत्र चूड़ामणि, ज्ञानार्णव दाक्षायणी तंत्र, योगिनी हृदय तंत्र व शिव चरित्र सहित अनेक ग्रंथ यहां पर शक्तिपीठ होने की पूर्ण पुष्टि करते हैं। ग्रंथ इसे पीठों में सर्वोत्तम पीठ होने की संज्ञा देते हैं। तंत्र चूड़ामणि ‘रामगिरौ स्तनान्यंे चपरिभाषित करता है तो देवी भागवत व मत्स्य पुराण में ‘चित्रकूटे तथा सीता विन्येकरत विंध्यवासिनीकी पुष्टि करता है।

तांत्रिक लक्ष्मी कवच तो सीधे तौर पर ‘सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूट निवासिनी। भयं हरते् सदा पायाद् भव बंधनात् विमुच्यते।।  परिभाषित करता है।

वैसे चित्रकूट में शक्तिपीठ होने की कथा भी बहुत ही पौराणिक है। श्रीमद्भागवत में उल्लिखित है कि सतयुग के प्रारम्भ में प्रजापति दक्ष ने कनखल के समीप सौनिक तीर्थ में बृहस्पति सब नामक यज्ञ किया। इस यज्ञ में भगवान भोलेनाथ को छोड़कर सभी देवताओं व ऋषियों को निमन्त्रण दिया गया। माता सती ने सभी देवताओं के विमान कैलाश से दूसरी दिशा की ओर जाते देख महादेव से इसका कारण पूंछा, भगवान ने उन्हें उनके पिता द्वारा यज्ञ के आयोजन के बारे में बताया। माता ने वहां पर जाने का अनुरोध किया तो भोलेनाथ ने कहा कि पिता का घर बेटी के लिए विवाह होने के पूर्व तक होता है। विवाह के पश्चात उसका घर पति का होता है, अतएव उनका वहां पर जाना उचित नहीं होगा। माता ने पिता के घर में अपने अधिकार होने की बात कहकर भोलेनाथ से जाने की अनुमति प्राप्त कर ली। भोलेनाथ ने अपने गण वीरभद्र के साथ उन्हें जाने की आज्ञा दी। वहां पर जाकर जब माता ने अपने पति का हवि भाग व बैठने का स्थान न पाया तो वह क्रोधाग्नि से भड़क उठीं और अपने आपको हवनकुण्ड में जलाकर नष्ट करने का प्रयास किया। इसी दौरान वीरभद्र और भगवान भोलेनाथ ने पहुंचकर यज्ञ को नष्ट कर डाला। राजा दक्ष का सिर काटकर यज्ञ कुण्ड में डाल दिया। महादेव माता का जला हुआ मृत शरीर लेकर ब्रह्माण्ड में करूण विलाप करते हुए विचरण करने लगे। तभी देवताओं की मंत्रणा के बाद श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि वह माता के अंगों को काट दे ताकि महादेव के अन्दर से मोह का निवारण हो सके और सृष्टि का क्रम चल सके। चक्र ने जैसे ही अंग काटे वह धरती पर गिरकर पाषाण में परिवर्तित हो गए। भूतल पर उन्हें महातीर्थ, मुक्तिक्षेत्र व शक्तिपीठों की संज्ञा प्राप्त हुई। जहां पर कमर के ऊपर के अंग गिरे उन्हें दक्षिणमार्गी शक्ति पीठ व नीचे के अंग गिरने के स्थानों को वाममार्गी शक्तिपीठ कहा जाने लगा। यहां पर शक्ति भैरव व बीज मंत्रों का प्रादुर्भाव हुआ। तंत्र चूड़ामणि, ज्ञानार्णव दाक्षायणी तंत्र, योगिनी हृदय तंत्र एवं शिव चरित्र में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। देवी भागवत, मत्स्य पुराण में उप पीठों सहित 108 का वर्णन है। देवी गीता में 72 का और कालिका पुराण में 26 पीठों का वर्णन मिलता है। 51 शक्तिपीठों में 9 पीठ पहले से ही पड़ोसी राष्ट्रों में हैं। श्रीलंका, पाकिस्तान, तिब्बत में एक-एक, नेपाल में दो व बांग्लादेश में चार शक्तिपीठ मौजूद हैं। आज के भारत में केवल 42 शक्तिपीठ ही बताए जाते हैं। वैसे इसके अलावा भी चित्रकूट की धरती पर और भी अलग तरह के शक्तिपीठ होने के तर्क दिए जाते हैं।

कैवल्योेपनिषद में ‘सा सीता भवति मूल प्रकृति संज्ञिता। उत्पकत्ति स्थिति संहार करणी सर्व देहि नाम।।शक्ति, शक्तिमान श्रीसीता जी और श्रीरामजी ही जगत के सृष्टा, नियामक एवं संहार करने में समर्थ बताए गए हैं। माता सीताजी को ही परा, अपरा व चित्तै शक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है।

चित्रकूट के प्रसिद्ध संत राम सखेन्द्रै जी महाराज की लिखी श्री मन्नरनृत्याराघव मिलन में इस बात का प्रमाण ‘कामद जनक लली कर रूपा, चित्रकूट रघुनाथ स्वरूपामें पूर्ण रूप से मिलता है। प्रमोदवन के रहने वाले संत स्व. लखन शरण महाराज ने ‘श्री जानकी धाम पद, बंदौ बारंबार। जाकी कृपा प्रताप तें, मिल्यौ् संत दरबार।।वैसे रामाज्ञा प्रश्नों में गोस्वामी तुलसीदास जी भी सीधे तौर पर चित्रकूट धाम को पीठ घोषित करते हैं। ‘पय पावनी वन भूमि भलि शैल सुहावन पीठ। रागिहिं सीठ विशेषि थलु, विषय विरागिहि मीठ।।

वैसे किसी भी रामतीर्थ में बलि का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन चित्रकूट में नारियल के रूप में बलि का प्रावधान किया गया है। श्रीकामदगिरि पर्वत में मौजूद कामतानाथ जी के चार द्वारों पर नारियल की बलि स्वीकार की जाती है। बलि तो शाक्त परंपरा के अनुसार प्रमुख प्रसाद है। यहां पीठ होने के कारण ऐसा होता है। इसके साथ ही देवी के सामने माथा रगड़ने पर ही वह मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। इसलिए यहां पर लोग अपना माथा रगड़-रगड़ कर मनौतियां पूरी करने के लिए गुहार लगाते हैं। वैसे एक दृष्टांत और भी देखने योग्य है। वृहद चित्रकूट महात्म के अनुसार माता सीता ने भी यहां पर देवी की स्थापना की थी। ‘दुर्गा भगवती माया सीताया स्थापपितोनघ। तताश्रमं च तं विद्वि दुर्गा पर्वतमुत्तसमं।।इसका अर्थ है कि माता सीता ने दुर्गा पर्वत पर माता दुर्गा की स्थापना की थी और पूजा की थी।

वहीं चित्रकूट वृहद महात्म में ही ‘पीठानाम् परम पीठं पर्वतानां च पर्वतं। धर्माभिलाष बुद्धिनां धर्मराशिकरम्प रम्। अर्थानामार्थं दातारं परमार्थ प्रकाशकम्। कामिनां कामदातारं मुमुक्षुणां च मोक्षदं। सर्वत्र श्रूयते तस्यि महिमा द्विज सत्तां।।

वैसे श्री कामदगिरि के कई नाम हैं। इसे रामगिरि व श्रीगिरि भी कहा जाता है। अलग-अलग पुराणों में इसका उल्लेख अलग नामों से किया गया है। वृहद चित्रकूट महात्म में इसे रामगिरि या श्रीगिरि ही उल्लखित किया गया है। श्रीगिरि का तात्पर्य श्री हरिविष्णु की पहली पत्नी श्रीसीता जी से है। उन्हें केवल श्री से भी सम्बोधित किया जाता है। वैसे शुक्ल यजुर्वेद में ‘श्रीश्चह ते लक्ष्मीध पत्यौवैससाफ तौर पर लिखा है।

ऋग्वेद का पंचम आत्रेय मंडल के नाम से विख्यात है। इसके मंत्रदृष्टा अत्रि ऋषि हैं। जिसमें अति प्रसिद्ध अत्रि सूत्रों सहित आर्चाप्राण ‘श्री सूत्रतक समाहित हैं। यही श्रीसूत्र माँ जानकी का यशोगान हैं। दूसरी ओर भृगुवंश के तपोनिष्ठ पुराण प्रवक्ता मारकण्डेय ऋषि ने तेरह अध्यायों में वॉछा कल्पतरू, दुर्गासप्तशती इन्हीं भगवती का यशोगान किया है। तीसरी ओर श्रीजी की उपासना सरभंग ऋषि ने बहुत ही मनोयोग से की थी। भुशुंडि रामायणकार कहते हैं ‘सुतीक्ष्ण वंदिता पूज्याथ सरभंगाश्रमवासिनीइसलिए चित्रकूट सीता शक्तिपीठ एवं श्रीधाम होने के नाते सीता तीर्थ के नाम से सुविख्यात हो गया। अठारहवीं शताब्दीे में रामघाट से उत्तर के इलाके को महंत चरणदास ने इसे ‘सीतापुरनाम से प्रतिष्ठित किया जो आज भी लोगों द्वारा लिया जाता है। वैसे तुलसीदास जी के काल में श्रीकामदगिरि की तलहटी पर ‘श्रीपुरनामक गांव का उल्लेख मिलता है।

सीतोपनिषद में सीधे तौर पर चित्रकूट में दीपमालिका का पर्व मुख्य पर्व होने की मान्यता को पुष्ट कर देता है। अथर्वेदीय कौशिक सूत्र सहित वृहद चित्रकूट महात्म अमावस्या व पूर्णमासी को यहां के पर्व घोषित करते हैं। 

वैसे एक अन्य प्रमाण के अनुसार श्री कामदगिरि परिक्रमा में ही साक्षी गोपाल मंदिर पर स्थापित नौ देवी की प्रतिमाओं को भी माँ जानकी के द्वारा स्थापित बताया जाता है। वैसे दक्षिणमुखी यह प्रतिमा भी बहुत ही ज्यादा प्राचीन व पवित्र मानी जाती है, इसी मंदिर के उत्तर मुख पर गोपाल जी मौजूद हैं। मान्यता के अनुसार गोपाल जी श्री कामदगिरि परिक्रमा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति जो मंदिर के खंभों पर साक्ष्य के रूप में उंगली से सीताराम लिखते हैं तो वह साक्ष्य के रूप में दर्ज हो जाता है।

इसके अलावा भी चित्रकूट परिक्षेत्र में शक्ति की उपासना के तमाम केंद्र हैं। हनुमान धारा रोड पर स्थित वन देवी के मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह अयोध्या राजवंश की कुलदेवी हैं। जबकि कुछ मत इन्हें भी शक्तिपीठ मानते हैं, वैसे यहां पर माता सीता के स्पष्ट रूप से चरण चिह्न मौजूद हैं। इसी प्रकार अनुसुइया आश्रम व गुप्त गोदावरी भी देवी अर्चना के स्थान हैं। अनुसुइया आश्रम में चैसठ योगिनी की शिला अपने आपमें अद्भुत है।

वैसे जहां एक ओर लोग भगवान राम पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने माता सीता की अग्नि परीक्षा ली और एक धोबी के कहने पर उन्हें वन में भेज दिया, वहीं दूसरी ओर चित्रकूट ऐसा स्थान है जहां पर श्री राम ने माता सीता का पूजन भी किया है। इस बात का प्रमाण स्वयं संत तुलसीदास जी श्रीरामचरित मानस में देते हैं ‘एक बार चुनि कुसुम सुहाए, मधुकर भूषण राम बनाए। सीतहिं पहिराए प्रभु सादर, बैठे फटकि शिला पर सुंदर।यहां पर संत ने श्रीराम के द्वारा माता को आभूषण पहनाने का जिक्र सादर के रूप में किया है। सादर शब्द का अद्भुत प्रयोग अपने आपमें अनुपम है। व्यक्ति जब किसी की पूजा करता है तो उसे सादर रूप में ही कुछ वस्तु अर्पित करता है। इसलिए उन्होंने जगत जननी माँ सीता श्रंगार बहुत ही प्रेम पूर्वक श्रद्धा के साथ किया है। इसलिए चित्रकूट को काम की नहीं अपितु राम की भूमि कहते हैं। जिस स्थान पर पत्नी को पति सादर रूप में आभूषण अर्पित करे तो वह पूज्यनीय है। 

वैसे अन्य प्रमाणों के अनुसार यह भी सिद्ध होता है कि वास्तव में कामदा नाम माता सीता का ही है। दुर्गा संकट नाशन स्तोत्र में ‘कामाख्यांत कामदा श्यासमां काम रूपां मनोरमामका उल्लेख आया है। इसी तरह के अर्थ मुंडमाला तंत्र, पद्मपुराण के संकटा स्तोत्र, देवी भागवत, लक्ष्मीण सहस्रनाम, ब्रह्मपुराण के ललितोपाख्यान में व बगला सहस्रनाम सहित अन्य ग्रंथों में मिलते हैं। अतएव हम यह भी मान सकते हैं कि कामदनाथ माँ सीता का ही स्वरूप हैं।

- संदीप रिछारिया

(लेखक बुन्देलखण्ड कनेक्ट के कार्यकारी सम्पादक हैं)