गोखारगिरि पर विराजे शिव तांडव करते दुख दूर

गोखारगिरि पर विराजे शिव तांडव करते दुख दूर

  • 10 भुजाओं वाली विशालकाय प्रतिमा देख लोग हो जाते हैं आश्चर्यचकित

भगवान भोले नाथ का रौद्र के साथ अत्यंत विनयशील स्वरूप देखना हो तो महोबा आइए, यहां के गोखारगिरि पर्वत पर भगवान भोलेनाथ विशालकाय स्वरूप में दस हाथों के साथ तांडव करते दिखाई देते हैं। 

चंदेल काल में जो शिलालेख मिले हैं उनके आरंभ शिव या विष्णु को प्रणाम किया गया है। इसका आशय है कि जिस राजा के शासनकाल में यह शिलालेख उत्कीर्ण कराया गया है। वह राजा वैष्णव मत का है या शैव मत का। इसी के अनुसार राजा मूर्तियों का निर्माण कराते थे। बुंदेलखंड के जनपद महोबा के मुख्यालय महोबा में गोरखगिरी की तलहटी में विशाल शिव की तांडव करती प्रतिमा एक चट्टान पर उत्कीर्ण है।

लगभग 150 वर्ष पहले इस क्षेत्र को लश्कर रावण कहा जाता था। शिव तांडव की प्रतिमा गजान्तक शिव के नाम से भी विख्यात है। गजा सर नामक राक्षस का अंत करने वाले गजानन तक शिव कहलाए। प्रतिमा में शीर्ष पर गज की मूर्ति उत्कीर्ण है 10 भुजा वाली इस मूर्ति के करो में विभिन्न आयुध और वस्तुएं दिखाई देती हैं। गयासुर का वध करने के बाद नृत्य कर रहे शिव नर मुंडो की माला धारण किए हुए। शीश पर जटा मुकुट और इस कंधों में बाल बिखरे हुए। नाग मालाएं गले में पहने हुए लंगोटी धारण किए हुए घंटियों को कमर में बांधे हुए सुशोभित हो रहे हैं। सर्प के फन पर गयासुर का शरीर छात्र के रूप में दिखाई दे रहा है। अतीत काल में इस क्षेत्र में शरीफा के बहुत पेड़ लगे थे। अतः मूर्तिकार ने एक हाथ में शरीफा भी दिखाया है। इस ग्रेनाइट पत्थर पर उत्कीर्ण इस मूर्ति की विशेषता है की प्रथम दृष्टया यह लकड़ी की बनी दिखाई देती है। पत्थर में रेखाओं को दिखा देना शिल्पकार की योग्यता का परिचायक है। एलोरा गुफा में  गजारी अंधकार ई मूर्ति से यह मिलती-जुलती मूर्ति है। सन 12 वीं शताब्दी में जब 1182 में कीर्ति सागर के तट पर पृथ्वीराज चैहान और आल्हा ऊदल का युद्ध हुआ था। तब पृथ्वीराज चैहान को युद्ध से पलायन करना पड़ा था रक्षाबंधन का पर्व अगले दिन मनाया गया था। राजा परमाल ने अगले दिन शिव तांडव की प्रतिमा के समक्ष आकर पूजा अर्चन किया था। उस समय परमाल की अवस्था 58 वर्ष की थी। इससे आशय यह है की यह मूर्ति 12 वीं शताब्दी से पहले की है। नृत्य मुद्रा को शिव तांडव कह देना उचित नहीं है। नीचे मां पार्वती ताली बजाते हुए दिखाई दे रहे हैं। 

इस विषय में एक मत यह भी है की नृत्य करने से रोकने के लिए पार्वती जी ने हाथ उठाया हो। कालिंजर में इसी तरह की मूर्ति काल भैरव की है हर काल में मूर्तिकार मूर्ति के आकार प्रकार और उसके स्वरूप का निर्धारण करते थे। उनके हाथों में तत्कालीन आयुध और वस्तुएं देख कर ही मूर्ति के निर्माण काल का अनुमान लगाया जाता है। वास्तव में यह प्रतिमा दक्षिण भारत और मध्य भारत की मूर्ति कलाओं का समन्वय है। राष्ट्रकूट राजा कृष्ण दुतीय द्वारा प्रतिहार राजा भोज के विरुद्ध लगभग 800 ईसवी में किए गए आक्रमण के बाद उत्तर भारत में शिव की नृत्य मुद्रा वाली मूर्तियों पर राष्ट्रकूट कला का क्या प्रभाव पड़ा है। इस मूर्ति में रंग भर देने के कारण इसका प्राचीन स्वरूप प्रभावित हुआ है। लगभग 10 फुट ऊंची और 8 फीट चैड़ी इस मूर्ति का वाम भाग का कर क्षतिग्रस्त हुआ था। जिसके अंगूठे का जो धार किया गया है। संस्कृत ग्रंथ रूप मंडन में लेखक सूत्रधार मंडन जीने मूर्तियों के आकार प्रकार का विस्तृत वर्णन किया है। बहुत बाद में इस शिव प्रतिमा के नीचे बगल में राम भरत के मिलाप की मूर्तियां बनवा दी गई है। यद्यपि यहां इन प्रतिमाओं का सिर्फ प्रथमा से कोई संबंध नहीं है। राजा परमाल द्वारा इनकी पूजा अर्चन के दिन से ही प्रतिवर्ष यहां मेला लगने की परंपरा आरंभ हुई और इस प्रकार कीरत सागर पर लगे कजली मेला के अगले दिन गोरख गिरी में मेला लगता है।

ज्ञातव्य है की यहां गुरु गोरखनाथ ने अंशकालीन तपस्या की और आल्हा इनके संपर्क में आए। वर्तमान में नगर के बुद्धिजीवियों ने व महोबा के हितों की चिंता करने वाले तारा पाठ करने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर उन्हें गोरे गिरी के इतिहास के बारे में बताते हुए साहित्य भेंट किया किंतु दुखद बात यह है की इस गोरख गिरी को पर्यटन स्थल बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया गया है। गोरख गिरी में गुफाएं व एक तालाब है  अंधियारी गुफा और उजियारी गुफा पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। यहां एक सिद्ध बाबा की भी गुफा है। पूरे पहाड़ में बहुत सी जड़ी बूटियां विद्यमान है आवश्यकता इस बात की है की उनके महत्व को जनसामान्य के बीच रखा जाए और उनका संरक्षण किया जाए। इस दिशा में वैज्ञानिक डॉक्टर रामसेवक चैरसिया ने प्रयास किया है किंतु इसमें शासन की सहभागिता आवश्यक है। पूर्णमासी को इस पर्वत की परिक्रमा की जाती है जिसमें प्रातः 5.00 बजे से दूर-दूर से आए हुए श्रद्धालु राम कीर्तन करते हुए इस पर्वत की परिक्रमा करते हैं। इसके लिए एलसी अनुरागी प्रमोद कुमार सक्सेना शिव कुमार गोस्वामी विजय बहादुर राजपूत सहित बहुत से समाजसेवियों ने यहां परिक्रमा हवन कवि गोष्ठी विचार गोष्ठी  के आयोजन का क्रम बना रखा है। इसका आरंभ छोटी चंडिका में आए हुए एक साधु ने घोड़े पर बैठकर पर्वत की परिक्रमा करके किया था। शिवमूर्ति को ध्यान से देखने पर ऊपर दोनों हाथों से उठाएं त्रिशूल को देखा जा सकता है। कूर्म पुराण में वर्णित गयासुर का प्रसंग है जिसमें उल्लेख है की शिव आराधना में ध्यान मग्न विप्रो का उत्पीड़न करने पर शिव ने गजा सुर का वध करके उसकी त्वचा को अपने हाथों में लेकर नृत्य किया था। उसी प्रसंग को मूर्तिकार ने यहां दिखाया है वस्तुतः यह शिव का गजारी रूप है।

संतोष पटैरिया

 (लेखक भाषाविद, साहित्यकार व इतिहास के मर्मज्ञ विद्वान हैं)