अथ चित्रकूटः

अथ चित्रकूटः
कामदगिरि पर्वत

चित्रकूट का वन प्रदेश उत्तम प्रदेश है। चित्रकूट में वैराग्य मंत्री, विवेक राजा, यम नियम योद्वा, शांति और सुमति दो सुंदर रानियां हैं। तात्पर्य है कि संसार में सवत्र्र मोह का ही राज है और काम कोधादि का आधिपत्य। मोह राजा के राज्य से संसार विभिन्न ज्यालाओं में जल रहा है। जीवन में व विश्व में सुख की वर्षा तभी होती है जब विवेक राजा के राज्य में रहने का अवसर मिले। चित्रकूट में यह सब सुलभ है। यहां पर परस्पर विरोधी पशु भी विरोध छोड़कर एक साथ रहते हैं। 

चित्रकूट का अर्थ है चित्रों का दर्शन और यही वास्तविकता सतयुग से लेकर आज तक इस अदभुत, अनोखे, अकल्पनीय,चित्ताकर्षक परिक्षेत्र को दूसरे धर्मस्थलों से अलग कर देती है। जनश्रुति है कि चार धाम की यात्रा करने वाले अगर यहां पर नहीं आए तो उनको तीर्थयात्रा का फल नहीं मिलता। आदि मानव व प्रकृति द्वारा निर्मित की गई गुफाओं, नयनाभिराम श्वेत जलराशि वाले झरनों, उच्च शैल शिखरों व पवि़त्रता का अहसास दिलाती नदियों व सरोवरों के बीच ‘ चित्रकूट‘ आज भी विश्वयुगीन समस्याओं के समाधान के केंद्र के रुप में पूरे विश्व में सुविख्यात है। किसी भी धर्म या मत को मानने वाला हो या फिर राजसत्ता के आधार स्तंभ, जो भी यहां आता है उसकी जुबान से केवल चित्रकूट का नाम ही निकलता है। एक बार नहीं अनेक बार भाजपा, सपा, कांग्रेस ने अपने चिंतन शिविर यहां पर आयोजित कर समस्याओं से निजात पाने का प्रयास किया। शैव, शाक्य, वैष्णव, जैन, प्रणामी संप्रदाय के साथ ही बौद्ध धर्मावलंबियों की श्रद्वा का यह अनोखा स्थान अपने आपमें खास तब हो जाता है जब यहां पर लोग आकर अपने धर्म से संबंधित कहानियों के बारे में बात करने लगते हैं। मुगलिया सल्तनत के दौरान शहंशाह अकबर के दरबार के नौरत्नों में से प्रमुख संगीत सम्राट तानसेन व राजा बीरबल का संबंध भी यहां से रहा है, तो भक्तिकाल के प्रमुख कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने तो अपने बुरे दिनों में यहां पर आकर भाड भूजनें का काम भी किया है। उनके लिखे- चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेश, जापर विपदा परत है सो आवत यहि देश, को आज कौन नही जानता।

धार्मिक स्थल

कामदगिरि पर्वत
परमेश्वर की विभूति का नाम मेरू पर्वत है। गीता जी ( 10़/23 ) में इसे मेरू का शिखरिणामहम् कहा गया है। कथा है कि एक बार मेरू के गर्व से कु्रद्व होकर वायुदेव ने उसे उड़ा देने की ठानी। भगवान श्री हरि विष्णु ने उसकी सहायता के लिए गरूण जी को भेजा। उन्होंने मेरू को अपने डैनों से आच्छादित कर लिया। वायु के प्रचंड वेग से उसे कोई हानि नहीं हुई। मेरू को वायु के वेग का सामना करने की इच्दा जानकर गरूण जी ने अपने डैने थोड़े सरका दिए। इसी से उसे दो श्रंग उड़ गए। पहला श्रंग चित्रकूट में गिरा और दूसरा बृज में। चित्रकूट गिरि या कामदगिरि के साथ बृज में गिरे श्रंग का नाम गोवर्धन हुआ। इसलिए त्रेता में प्रभु श्री राम चित्रकूट गिरि और द्वापर में प्रभु श्री कृष्ण अपनी लीलाएं गोवर्धन में करते हैं। 

स्वामी कामतानाथ का मंदिर व परिक्रमा
मान्यताओं के अनुसार आदिकाल में कामदगिरि पर्वत से निकलकर प्रभु कामदनाथ विग्रह के रूप में प्रकटे। मानवी काया के अनुसार उनके मुख पर दांत भी हैं। सात शालीग्राम रूपी दांतों में पांच का पूजन रोजाना किया जाता है। साढे पांच किलोमीटर की परिक्रमा मुख्य द्वार से प्रारंभ होती है। चारों दिशाओं में चार द्वार हैं, तीन में मुख का दर्शन व चैथे में संपूर्ण स्वरूप में भगवान विराजते हैं। इसके साथ ही अलौकिक छटायुक्त पर्वत के चारों ओर शनि मंदिर, महलों वाले मंदिर के पीछे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लगाया गया पीपल का वृक्ष, उनके द्वारा लिखी गई रामचरितमानस की हस्तलिखित प्रति, मां पयस्वनी का उद्गम स्थल, ब्रह्मकुंड, साक्षी गोपाल, कामधेनु, भरत मिलाप, रामवन पथ गमन स्थल प्रदर्शनी ,लक्ष्मण पहाडी, स्वर्गाश्रम पीलीकोठी, बरहा के हनुमान जी, सरयू धारा आदि स्थान यहां पर देखने योग्य हैं।

बृहद चित्रकूट महात्म के अनुसार मां सती का दायां वक्ष यहीं गिरा था और मां जानकी ने भी नौ देवियों की स्थापना की थी। आधे परिक्रमा में भरत मिलाप मंदिर में विश्व के सर्वाधिक प्रमाणिक चरण चिंह आज भी विद्यमान हैं। लक्ष्मण पहाड़ी पर रोप वे निर्माण के बाद यहां पर जाने वालों की संख्या में काफी बढोत्तरी हो चुकी है। वैसे कई धर्म ग्रंथों में इसे चित्रकूट पर्वत व श्री पर्वत भी कहा जाता है। एक मान्यता के अनुसार शेषशैया पर भगवान श्री हरि विष्णु इसी पर्वत के अंदर विराजते हैं। पर्वत के उपरी भाग में भी तमाम विशेष स्थान हैं। पर्वत से 76 जलधाराएं निकलती हैं, जिनका अपना अलग महत्व है। कामदगिरि की परिक्रमा करने का समय भी प्राचीन समय से निर्धारित है। अमावस्या को छोड़कर रात 12 बजे सुबह 4 बजे तक का समय आम गृहस्थ लोगों को प्रतिबंधित है। वृहद चित्रकूट महात्म के अनुसार आज भी पर्वत में मौजद सैकड़ों गुफाओं में आज भी सतयुग के तमाम ऋषि तपस्यारत हैं। जो रात में 12 से 4 बजे तक श्री कामदगिरि की परिक्रमा लगाते हैं।   

मंदाकिनी के घाट
वैसे तो मंदाकिनी अनुसुइया आश्रम के पास जंगलों से निकलती हैं। लेकिन इसके बहाव के स्थानों पर अलग-अलग घाट अपनी अलग विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध हैं। टाठी घाट जंगलों के मध्य स्थित देवरहा बाबा की साधना का स्थल माना जाता है। लोकोक्ति है कि यहां के सिद्व को मां मंदाकिनी स्वयं दोनों समय भोजन देने आती थीं। मंदाकिनी के स्फटिक शिला घाट पर श्री राम के अलग ही चरित्र के दर्शन होते हैं। यहां पर बैठकर भगवान श्री राम ने मां जानकी का श्रंगार पुष्पों के आभूषणों से किया था। संत तुलसी ने लिखा ‘सीतहि पहिराए प्रभु सादर‘ उल्लेख किया। श्रीराम मां जानकी ने अपने दाम्पत्य जीवन का सर्वाधिक समय व्यतीत किया। यहां पर आकर वह कैसे रहे इसकी बानगी तुलसीदास जी ने दी। आज भी यह शिला पूरे वैभव के साथ मौजूद है। यहीं पर राजा इंद्र के पुत्र जयंत का वर्णन भी आता है। जिसे प्रभु राम ने अपने बाण से काना बना दिया था। इसके साथ ही जानकीकुंड, पंचवटी घाट, प्रमोदवन घाट, सूरजकुंड का घाट जहां मां मंदाकिनी पश्चिम मुखी हो जाती हैं देखने योग्य हैं। वैसे मंदाकिनी के सर्वाधिक लोकप्रिय स्थल राघव प्रयाग घाट व रामघाट, भरत घाट है। राघव प्रयाग घाट पर सरयू व पयस्वनी का संगम है। एक मत के अनुसार पितृविसर्जनी अमावस्या पर स्वयं प्रयागराज कौवे के रूप में आकर यहां पर स्नान कर साल भर के इकट्ठे किए अपने पापों को विसर्जित कर जाते हैं। यहां पर राम ने अपने पिता दशरथ का पिंड तर्पण किया था। इसके साथ ही यहां पर चित्रकूट के क्षेत्राधिपति स्वयं शंकर स्वामी मत्स्यगयेन्द्र नाथ के विग्रह के रूप में विराजमान हैं। पहला शिवलिंग अनादि है। दूसरा शिवलिंग स्वयं प्रजापति ब्रहमा जी ने स्थापित किया। तीसरा भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि ने जबकि चैथा भगवान राम ने प्राणप्रतिष्ठित किया था। प्रजापति ब्रहमा जी द्वारा स्थापित यज्ञवेदी भी यहीं पर है और उनके हवनकुंड का दर्शन भी किया जा सकता है। यहीं पर संत तुलसीदास जी को भगवान श्री राम के दर्शन भी हनुमान जी की कृपा से हुए थे। हनुमान जी ने तोते के रूप में कहा था ‘ चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड, तुलसीदास चंदन घिसैं तिलक देत रघुवीर। अनुसुइया आश्रम से रामघाट तक सैकड़ों कंदराओं व स्थानों पर आज भी तमाम ऋषि तपस्यारत देखे जा सकते हैं। शहर के कोलाहल से दूर यह तपस्वी आज भी भी प्रभु को पाने के लिए लगे हुए हैं।

महासती अनुसुइया आश्रम
महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि अत्रि की पत्नी महासती अनुसुइया का विशाल गुरुकुल वाला स्थान धर्मनगरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर है। यहां पर नैसर्गिक प्राकृतिक सुषमा से युक्त पर्वत व झरनों के साथ सुगंधित जडी बूटियों के पहाड़ लोगों का मन मोह कर एक नया उत्साह प्रकट करते हैं। यहां पर योगिनी शिला, हनुमान मंदिर, वनवासी राम मंदिर, परमहंस आश्रम आदि दर्शनीय हैं। इसके साथ ही मां मंदाकिनी की सैकड़ों जलधाराओं को यहां से निकलते देखा जा सकता है। महासती अनुसुइया की परीक्षा लेने के लिए स्वयं त्रिदेव आए और यहां पर माता ने उनको बालक बनाकर पालने में झुला दिया। महर्षि अत्रि के पुत्र आत्रेय की लिखी संहिता विश्व की पहली आयुर्वेद की पुस्तक मानी जाती है। जिसे बाद में उनके शिष्य चरक ने अपने नाम से लिखी थी।

 
अमरावती
राम से पहले भी सूर्य वंश के अनेक राजा चित्रकूट आए। दृष्टांतों के आधार पर राम की दसवीं पीढ़ी के पूर्वज अयोध्या नरेश महाराज अम्बरीश ने यहां पर आकर कठोर तप किया था। इस बात का प्रमाण आम के वृक्षों की अमराई वाले अमरावती में दिखाई देता है। यह स्थान अनुसुइया आश्रम से लगभग तीन किलोमीटर दूर जंगलों के 

भभका उद्गम व पंचप्रयाग 
यह स्थान भी अनुसुइया आश्रम से लगभग दो किलोमीटर दूर झूरी नदी का उद्गम स्थल है। यह स्थान गुरु गोरखनाथ की प्राचीन तपस्या स्थली माना जाता है। यह स्थान भी अनुसुइया आश्रम से तीन किलोमीटर घने जंगलों में स्थित है। यहां पर पांच छोटी नदियां आकर मंदाकिनी में मिलती हैं। निर्जन स्थान है, जहां पर एक साधु रहते हैं। 

गुप्त गोदावरी
प्रकृति की अनमोल धरोहर गुप्त गोदावरी ऐसा स्थान है जहां पर आकर पर्यटक अपनी सुधबुध खो देता है। प्रकृति की विलक्षण कारीगरी वाली गुफाओं में नक्काशी देखते ही बनती है। एक गुफा तो सूखी है। यहां पर गोदावरी मां के साथ ही अन्य देवता गण स्थापित है और यहां पर राजा इंद्र का पुत्र जयंत खटखटा चोर के रूप में आज भी लटका हुआ है। गोदावरी धारा की विशाल जलराशि वाली दूसरी गुफा से जल निकलकर बाहर कुंड के बाद दिखाई नही देता इसका रहस्य अभी सामने नही आया है।

हनुमान धारा
रामघाट से तीन किलोमीटर दूर पर्वत श्रेणी पर विराजमान हनुमान के हाथों से निकलने वाली धारा का दृश्य अत्यंत मनोहारी है। इसके स्थान के ठीक ऊपर सीता रसोई है। हनुमान धारा के नीचे नरसिंह धारा, पंचमुखी हनुमान मंदिर है। रामघाट से हनुमान धारा जाने के बीच में ही वनदेवी नामक विलक्षण स्थान है।

84 कोस में विराजते हैं प्रभुसेवा में रत रहने वाले ऋषि

चित्रों के कूट चित्रकूट के दस किलोमीटर के क्षेत्रफल में तमाम मंदिरों के समूह हैं। धार्मिक, ऐतिहासिक और प्रागैतिहासिक काल के तमाम स्थान अवलोकनीय है।

वाल्मीकि आश्रम लालापुर
महर्षि वाल्मीकि की तपस्थली लालापुर चित्रकूट से इलाहाबाद जाने के रास्ते पर मिलती है। झुकेही से निकली तमसा नदी इस आश्रम के समीप से बहती हुई सिरसर के समीप यमुना में मिल जाती है। पूरी पहाडी पर अलंकृत स्तंभ और शीर्ष वाले प्रस्तर खंड बिखरे पडे हैं जिनसे इस स्थल की प्राचीनता का बोध होता है। इस गुफा में श्वेतवर्ण से अंकित ब्राही लिपि भी मिल चुकी है। चंदेलकालीन आशांबरा देवी का मंदिर इसी स्थान पर है और कहा जाता है कि यही पर स्वामी प्राणनाथ को दिव्य ज्ञान की अनुभूति हुई थी। उन्होंने बाद में पन्ना नगरी में जाकर प्रणामी संप्रदाय की शुरुआत की।

ऋषियन
चित्रकूट से इलाहाबाद जाते समय मऊ से उत्तर दिशा में 14 किलोमीटर दूर रसियन ‘ऋषियन ‘ नामक स्थान पडता है। 84 हजार देवताओं की इस साधनास्थली के बारे में कहा जाता है कि पूज्य देवरहा बाबा ने यहां पर उग्र तप किया था। वैसे यह स्थान चित्रकूट धाम का प्रवेश द्वार भी माना जाता है। बाणासुर की धर्मपत्नी बरहा के नाम पर गांव का नाम ही बरहा कोटरा रख दिया गया था। प्रख्यात शिव मंदिर के ध्वंसावशेष यहां पर बिखरे पडे़ दिखाई देते हैं। इस मंदिर का सूक्ष्म अलंकरण और भव्य वास्तुकला विस्मित कर देती है। पुरातत्वविद बाणासुर के दुर्ग के पास बने बांध के ध्वंसावशेषों को सिंधु काल की सभ्यता के समकालीन बताते हैं। मन को विस्मित कर देने वाले इस स्थान पर जाते ही अद्भुत शांति का अनुभव होता है। वैसे यहां पर पास ही पहाड़ी पर आदि काल के मानव-निर्मित शैल चित्रों के साथ ही बौद्ध मूर्तियों के भग्नावशेष भी देखने योग्य हैं। जाने का दुर्गम रास्ता और शासन के ध्यान न देने के कारण पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थान लगभग उपेक्षित सा ही है।

बांकेसिद्ध, कोटितीर्थ, देवांगना
चित्रकूट की पंचकोसी यात्रा का प्रथम पडाव अनुसुइया के भ्राता सांख्यदर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल का स्थान बांकेसिद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। इस गुफा में जहां  हजार वर्ष पूर्व के शैल चित्र विद्यमान हैं जो अब मानव भूलों के कारण अंतिम सांसे ले रहे हैं। साल भर गंधक युक्त झरनों और विशेष 20 किस्म के फूलों से सुशोभित इस स्थान को चित्रकूट का हृदय कहा जाता है। देवांगना में भी झरने और पुष्पों की लताओं से लदे पेड़ दर्शनीय है कोटितीर्थ और पंपासर में हनुमान मंदिर आज भी लाखों लोगों की आस्था का केंद्र हैं। इसके आगे पर्वतीय मार्ग पर सरस्वती नदी, यमतीर्थ, सिद्धाश्रम, गृधाश्रम, मणिकर्णिका आश्रम इत्यादि हैं। पास ही मध्य में चंद्र, सूर्य, वायु, अग्नि और वरुण तीर्थ मिलते हैं। इन पांच देवताओं के यहां पर निवास करने के कारण इसे पंचतीर्थ कहते हैं और कुछ ही दूरी पर ब्रह्मपद तीर्थ है।

मडफा
चित्रकूट से बीस किलोमीटर दूर घुरेटनपुर के पास पर्वत पर भगवान शंकर अपने पंचमुखी रूप में सशरीर विद्यमान हैं। किंवदती के अनुसार ऋषि मांडव्य की इस तपस्थली में महाराज दुष्यंत की पत्नी शकुंतला ने पुत्र भरत को जन्म दिया था। चंदेलकालीन वैभवशाली नगर के ध्वंशावशेष यहां पर बिखरे पडे दिखाई देते हैं। जैन धर्म के प्रर्वतक आदिनाथ के साथ ही अन्य जैन मूर्तियां यहां अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। 

महर्षि अत्रि आश्रम
महर्षि वाल्मीकि और महाकवि कालीदास ने इस स्थान का काफी रोचक वर्णन अपने ग्रंथों में किया है। चित्रकूट से लगभग 15 किलोमीटर दूर दक्षिण में मंदाकिनी के किनारे महर्षि अत्रि-माता अनुसुइया और उनके पुत्र चंद्रमा, दत्तात्रेय व दुर्वासा के स्थान हैं। यहां पर पाए जाने वाले शैलचित्र इसे पुराप्राचीन काल का घोषित करते हैं। मंदाकिनी नदी के उत्तरी किनारे पर भवनों के ध्वंसावशेष मिलते हैं जो कुलपति कण्व के आश्रम के माने जाते हैं। इस आश्रम की निकटवर्ती पहाडियों पर काफी मात्रा में शैलाश्रय और उनमें रामकथाश्रित शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। सप्तर्षियों में सम्मिलित महर्षि अत्रि का विद्यापीठ प्राचीन भारत के महान विद्यापीठों में गिना जाता है। यहां से दंडकारण्य की सीमा प्रारंभ हो जाती है और तीन मील दूर एक झरना और हनुमान जी की मूर्ति प्रतिष्ठित है यहीं पर विराध कुंड है। यहां पर मंदाकिनी नदी पर पाप मोचनी, ऋण मोचनी व दारिद्रय मोचनी शिलाएं हैं। मंदिर के पास ही योगिनी शिला है। 

सरभंग आश्रम
सतना के वीरसिंहपुर से लगभग 12 किलोमीटर दूर यह स्थान राम और ऋषि सरभंग के अद्भुत मिलन का स्थल है। यहीं पर भगवान विष्णु से कुपित होकर ऋषि ने अपने शरीर का हवन किया था। यहां पर दो दिव्य कुंड हैं जो ऋषि सरभंग के तप बल की पुष्टि करती है। विराध कुंड की गहराई मापने के कई प्रयास हो चुके हैं पर अभी तक इसमें सफलता नही मिली है। यहां पर पास में ही अश्वमुखी देवी का मंदिर है। यहीं सिद्वा पहाड़ है। यहां पर भगवान राम ने ऋषियों की अस्थियों से बने पर्वत को देखकर हाथ उठाकर राक्षसों का समूल नाश करने का प्रण लिया था। 

सुतीक्षण आश्रमः 
वीरसिंहपुर से 10 किलोमीटर दूर यह स्थान शातकर्णी ऋषि के पंचाप्सर तीर्थ और शरभंग आश्रम के मध्य स्थित है। सुतीक्षण के भाई अगस्त्य ऋषि का आश्रम यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। इस स्थान को ब्रह्म लोक के समान पवित्र कहा गया है।

सरहटः
चित्रकूट से तीस किलोमीटर दूर मानिकपुर के पास सरहट नामक स्थान पर प्राचीनतम शैलचित्र भारी संख्या में मौजूद हैं। ये तीस हजार साल पुराने बताए जाते हैं। सरहट के पास ही बांसा चूहा, खांभा, चूल्ही में भी इस तरह के शैलचित्र मिलते हैं। सरहट के 20 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में करपटिया में 40 शिलाश्रयों का समूह दर्शनीय है।

राजापुर
यमुना के किनारे बसी गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की जन्म स्थली। राम बोला से तुलसीदास जी ने जब रत्नावली के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया तो चित्रकूट में आकर गुरु से दीक्षा लेकर रामचरितमानस के साथ ही अनेक ग्रंथ अपने आराध्य राम के बारे में लिख डाले। यहां पर उनके द्वारा स्थापित संकटमोचन हनुमान मंदिर व उनके द्वारा पूजित लगभग 15 किलोमीटर दूर नांदी के हनुमान जी का मंदिर दर्शनीय है। वैसे पहाडी के पास ही साईपुर में दाता साई का मंदिर व स्थान दर्शनीय है। यहां पर हिंदू और मुस्लिम एकता को बढाने वाला मेला लगता है।

भरतकूप व रामशैयाः 
चित्रकूट से लगभग 15 किलोमीटर दूर इस स्थान पर राम के राज्याभिषेक के लिए लाए गए सभी नदियों व सरोवर के पवित्र जल को एक कुंए में डाल दिया गया था। यह स्थान दर्शनीय है। यहीं पास में रामशैया नामक स्थान भी है। कहा जाता है कि यहां पर राम ने चित्रकूट में पर्दापण करने के बाद पहली रात्रि का विश्राम किया था। शिवरामपुर के पास पथरौंडी गांव की पहाडी पर भी दाता साई का स्थान है। यहां के बारे में मान्यता है कि जो भी संत इस गद्दी पर विराजमान होता है वह अपनी पूरी जिंदगी पहाड से नीचे नही उतरता। 

सूरजकुंड
सूर्य भगवान के तप्त वेग के प्रभाव से जहां मंदाकिनी भी पश्चिम मुखी होकर बहने लगती है। सूर्य का प्रभाव यहां पर पत्थरों में नजर आता है। अपने ताप से बचने के लिए ब्राह्मणों को छाता और जूता दान देने की प्रक्रिया की शुरुआत करने वाला स्थान।

धारकुंडीः 
चित्रकूट से लगभग पचास किलोमीटर दूर जंगलों के मध्य दिव्य स्थान। यहां पर अघमर्षण कुंड पर महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा यक्ष के प्रश्नों के उत्तर देने के साथ ही स्थानीय जाति की राजकुमारी हिडिंबा का विवाह भीम के साथ होने की कथा कही जाती है। गंधक के साथ ही अन्य जडी बूटियों से मिश्रित झरने के पानी के स्नान व सेवन को चर्म रोगों से मुक्ति का साधन भी माना जाता है।

वामदेव
बांदा नगर में महर्षि वामदेव का मंदिर है। वामदेव भगवान शंकर का ही प्रतिरूप हैं। नगर का नामकरण भी इन्हीं वामदेव के नाम पर है। यहां पर भगवती माहेश्वरी का मंदिर भी है। जो 108 सिद्व देवी मंदिरों में एक है।  

अन्य दर्शनीय स्थान
बाला जी का मंदिरः चित्रकूट में मंदाकिनी के किनारे शहंशाह औरंगजेब के द्वारा बनवाया गया बाला जी का मंदिर दर्शनीय है।

गणेश बागः 
मुंबई में बेसिन की संधि के बाद यहां की जागीर मराठों को देने के बाद उनके वंशज अमृतराय द्वारा बनवाया गया शिल्प का अद्भुत नमूना, इसे मिनी खजुराहो के नाम से भी जाना जाता है। यहां की सात खंडों की बावली भी दर्शनीय है।

तरौंहा का किला व झारखंडी मां का मंदिरः 
सुर्की राजवंश की अमर कहानी कहता यह किला कर्वी के तरौंहा में स्थित है। वैसे अब तो यह किला बदहाल है पर यहां की वादियों में इतिहास का पूरा एक अध्याय सांस लेता है। बीरबल हों या तानसेन दोनो ही यहां के सुर्की सम्राट राजा राम कृष्ण जूदेव के दरबार से दिल्ली गए थे। यहीं पर मां झारखंडी देवी का मंदिर भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह देश के 51 शक्तिपीठों में एक है।

चर का सोमनाथ मंदिरः 
सोमनाथ के मंदिर की तर्ज पर नाम पर बना शिल्प कला का अद्भुत नमूना। यहां पर शिव लिंग के अनेक प्रकार लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इसके साथ ही दशरथ घाट व कलवलिया का शिव मंदिर भी दर्शनीय है।

बुन्देलखण्ड में यहां-यहां पडे राम चरण
इलाहाबाद की तरफ से जिले का प्रवेश द्वार मुरका गांव है।इसलिए सर्वप्रथम श्रीराम के चरण यहां पर पड़े। इसके बाद ऋषियन व सीतापहाडी पर विश्राम करने के बाद व यमुना नदी के गरौली घाट पर आए। यहां पर ‘तेहि अवसर एक तापस आवा‘ वाली घटना हुई। रामनगर के कुमार द्वय तालाब पर स्नान करने के बाद रैपुरा पहुंचे। कहा जाता है कि यहां पर श्रीराम ने अयोध्या से निकलने के बाद पांचवी रात्रि का विश्राम किया। चित्रकूट परिक्षेत्र में प्रवास के दौरान उन्होंने रामशैया, मांडव्य ऋषि के आश्रम मडफा, भरतकूप, कालिंजर, ब्रहस्पतिकुंड,सारंग, अमरावती, विराध कुंड, पुष्करणी सरोवर, मांडकर्णी आश्रम, श्रद्धा पहाड सहित अन्य स्थानों का भ्रमण किया।

लुप्तप्राय स्थानः  
सुभद्रक कुंड, सर्वतोभद्र कुंड, मणि भद्रक तीर्थ, आर्वे आश्रम, काम स्थान, मंडल तीर्थ, गौरी देवी स्थान, योगिनी देवी, भार्गव तीर्थ, सावित्री देवी, दिव्य साकेत, महामाया पीठ, शीतला पीठ, मारकुंडी, वन देवी, हंस तीर्थ, फलकी वन, तुंगारण्य, व्यास कुंड, सारंग ऋषि आश्रम, ब्रहस्पति कुंड।

विशेष स्थानः
मारकुंडी के निकट पर्वतों के बीच में चट्टानों से निर्झरित होती विशाल जलराशि जब विशालकाय कुंड में गिरती है तो उसे देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं। शबरी प्रपात के नाम से विख्यात विशाल कुंड और झरना बाहर से आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेता है। यह स्थान शासन की उपेक्षा के चलते अभी ज्यादा ख्याति अर्जित नही कर सका है। अगर इस स्थान पर शासन स्तर पर ध्यान दिया जाए तो यह विशेष स्थान न केवल बाहर से आने वालों के लिए एक विशेष स्थान सिद्ध होगा बल्कि गरीब ग्रामवासियों के लिए रोजगार के साधन मुहैया कराने का भी बडा काम करेगा। इसके साथ ही जमुनहाई, नउवाबीहर प्रपात, भंवरादाह प्रपात, कोल्हुआ कुंड, तप्त और शीतल प्रपात, बम्बिहा, रानीपुर वन्य जीव बिहार, आनंदनी गुफा, कर्का मानिकपुर, कोठी तालाब, तरौंहा का किला, लौरी का मंदिर, शिव का मंदिर बराह कोटरा, गोल तालाब बाबड़ी, कुमार द्वय तालाब रामनगर, जयदेव दास का अखाड़ा तरौंहा, बावड़ी खोह, कुबेरगंज रानीपुर भट्ट, शाही हम्मान, मराठों की छावनी, आल्हा की गढी, बूडे हनुमान, नांदी तौरा का हनुमान मंदिर, तुलसी वेदिका, कालिका मंदिर, लेटे हुए हनुमान जी बरियारी कला, लैना बाबा मंदिर शिवरामपुर, परानू बाब, बरगढ, व्यास कुंड, ब्रहस्पति कुंड, प्रभृति तीर्थ आज भी उपेक्षा का शिकार हैं! टगर सरकार इन पर ध्यान दे तो यहांपर आकर लोग काफी आनंद करेंगे औश्र स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सकेगा।  

कैसे पहुंचे
चित्रकूट के लिए कर्वी निकटतम रेलवे स्टेशन है। यह दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बनारस, लखनऊ, भोपाल, जबलपुर व रायपुर से सीधा जुडा हुआ है। चित्रकूट से 30 किलोमीटर दूर माणिकपुर जंक्शन भी है। यहां से देश के अन्य भागों के लिए ट्रेने मिलती हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग 76 पर कर्वी का बस स्टाप है यहां से लखनऊ, बनारस, कानपुर, इलाहाबाद आदि स्थानों के लिए सीधी बस सेवा है। वैसे जानकीकुंड में भी अन्तर्राज्यीय बस स्टैंड हैं। यहां से सतना, रीवा, जबलपुर, पन्ना, मैहर आदि के लिए बसें मिलती हैं। निकटतम हवाई अड्डा खजुराहो, लखनऊ व बनारस हैं। इसके अलावा टैक्सी सेवा हर समय यहां पर मिलती है।

कहां रुकें
चित्रकूट में रुकने के लिए वैसे तो तमाम धर्मशालाएं, लॉज और यात्री निवास हैं। इनमें प्रमुख उप्र और मप्र के टूरिस्ट बंगले, जयपुरिया स्मृति भवन, कामदगिरि भवन, विनोद लाज, पंचवटी ,रामदरबार होटल आदि हैं। वैसे हर मठ और मंदिर ने भी अपने गेस्ट हाउस बना रखे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार का विश्राम गृह कर्वी में जबकि मप्र सरकार का विश्राम गृह सिरसावन में है।

घूमने का मौसम
वैसे तो वर्ष भर यहां पर घूमने का मौसम रहता है, पर जुलाई से लेकर मार्च-अप्रैल तक का समय पर्यटकों व दर्शनार्थियों के लिए ज्यादा मुफीद बताया जाता है।
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कामदगिरि के चार मुख, चारो फल दातार जाकी तैसी अर्चना ताको तैसो सार। 
पूर्व मुख से अर्थ निधि, दक्षिण धर्माचार, पश्चिम काम स्वरूप प्रभु उतर उतारैं पार। ( द्वारिकेश)
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कामदगिरि का करि परिभ्रमण
आये जानकीकुंड सब जन।
फिर स्फटिक शिला अनुसुयावनसरिउद्गम
फिर भारतकूप रह इस प्रकार
कुछ दिन सब जन कर विहार 
लौटे निज-निज गृह हृदयधर छवि निरूपम। 
(सूर्यकांत त्रिपाठी निराला तुलसीदास पुस्तक में )
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यक्षश्चक्रं जनकतनया स्नान पुण्योदकेषु।
स्निग्धच्छाया तरूषु वर्सतिं रामगियां श्रमेषु।।
(महाकवि कालीदास लिखित मेघदूत से उद्त )
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जा पर विपदा परत है सो आवत इहि देश। 
 चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेश।। 

 ( रहीम)
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सुखद अमावस मौनिया बुध सोरह सौ सात,
जा बैठे तेहि घाट पै, बिरहि होतहि पात।
 प्रकटेउ राम सुजान कहेउ देहु बाबा मलय,
शुक धरू बपु हनुमान, पढेउ चितावनि दोहरा-
चित्रकूट के घाट पै, भई संतन की भीड़ 
तुलसीदास चंदन घिसैं तिलक देत रघुवीर 
( मूल गुसाई चरित्र में संत तुलसीदास)
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सगुन सकल संकट समन चित्रकूट चलि जाहु, 
सीताराम प्रसाद शुभ लघु साधन बड़ लाभु। 
(रामाज्ञा प्रश्न में तुलसीदास )
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चित्रकूट सब दिन बसत, प्रभु श्री लखन समेत 
राम नाम जप जापकहिं तुलसी अभिमत देते। 
(दोहावली में संत तुलसीदास)
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चित्रकूटे शुभ क्षे़ेत्रे श्री राम पद् भूषिते
तपष्चार विधिवद् धर्मराजे युधिष्ठिरः। 
(महाभारत )
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चित्रकूट समं नास्ति तीर्थ ब्रहमांड लोके।
यत्र श्रीराम चंद्रोसौ सीताया सहितः सुधी।।
 विमलादि सखी युक्तस्तवणिमादि विभूतिभिः।
सप्तावरण संयुक्त मंदिरे रत्न भूषिते।।
पर्वतस्थानांतराले सौ विहारं कुरूते सदा।। 
 (वृहद्रामायण )
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 भव भुअंग तुलसी नकुल, डसत ज्ञान हर लेते
 चित्रकूट एक औषधि, चितवत करत सचेत।
 (दोहावली में संत तुलसीदास) 

- संदीप रिछारिया

(लेखक बुन्देलखण्ड कनेक्ट के कार्यकारी सम्पादक हैं)