AI की प्यास: क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता बढ़ाएगी दुनिया में जल संकट?
एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग पावर की आवश्यकता होती है, जिससे सर्वर अत्यधिक गर्म हो जाते हैं...
चौंकाने वाला खुलासा: ChatGPT से पूछे गए महज 50 सवाल डकार जाते हैं आधा लीटर पानी; 2027 तक अरबों लीटर खपत का अनुमान
नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को हम भविष्य की तकनीक और विकास का इंजन मान रहे हैं, लेकिन इसकी एक डरावनी तस्वीर भी सामने आ रही है। हालिया शोधों से पता चला है कि जिस एआई को हम केवल डेटा और कोडिंग का खेल समझते हैं, वह असल में पानी की भारी खपत कर रहा है। टेक दिग्गजों के विशाल डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए हर साल अरबों लीटर मीठे पानी (Fresh Water) का उपयोग किया जा रहा है, जो आने वाले समय में एक बड़े पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा कर रहा है।
चैटजीपीटी के 50 सवाल और आधा लीटर पानी
एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग पावर की आवश्यकता होती है, जिससे सर्वर अत्यधिक गर्म हो जाते हैं। इन सर्वरों को ठंडा करने के लिए पानी का उपयोग किया जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, ChatGPT से पूछे गए हर 10 से 50 सवालों की प्रक्रिया में लगभग 500 मिलीलीटर पानी खर्च हो जाता है। सुनने में यह मात्रा कम लग सकती है, लेकिन जब दुनिया भर के करोड़ों यूजर्स इसका इस्तेमाल करते हैं, तो यह आंकड़ा भयावह हो जाता है।
2027 तक का डरावना अनुमान
शोधकर्ताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि एआई की बढ़ती लोकप्रियता के कारण पानी की मांग में बेतहाशा वृद्धि होगी। अनुमान के मुताबिक:
- कुल मांग: वर्ष 2027 तक एआई के कारण पानी की वैश्विक मांग 4.2 अरब से 6.6 अरब क्यूबिक मीटर तक पहुँच सकती है।
- साफ पानी की मजबूरी: डेटा सेंटर्स में केवल साफ और मीठे पानी का उपयोग होता है ताकि मशीनों के पाइपों में जंग न लगे। इससे उन क्षेत्रों में पीने के पानी की किल्लत हो सकती है, जो पहले से ही जल संकट से जूझ रहे हैं।
टेक दिग्गजों के डेटा सेंटर्स और पर्यावरणीय चिंता
गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियों के डेटा सेंटर्स दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैले हैं। इन केंद्रों से निकलने वाली गर्मी को शांत करने के लिए अरबों लीटर पानी की जरूरत होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई के विस्तार के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना कठिन होगा कि स्थानीय समुदायों के लिए पानी सुरक्षित रहे।
"एआई का पर्यावरणीय पदचिह्न (Carbon and Water Footprint) केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। इसकी 'प्यास' को नजरअंदाज करना भविष्य में जल सुरक्षा के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।" — पर्यावरण विशेषज्ञ
कंपनियों का दावा: बनेंगे 'वाटर पॉजिटिव'
चौतरफा आलोचनाओं के बाद अब तकनीकी कंपनियों ने इस दिशा में कदम उठाने शुरू किए हैं।
- वाटर पॉजिटिव लक्ष्य: गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने खुद को 'वाटर पॉजिटिव' (Water Positive) बनाने का लक्ष्य रखा है।
- क्या है वाटर पॉजिटिव: इसका अर्थ है कि ये कंपनियाँ जितना पानी इस्तेमाल करेंगी, तकनीकी उपायों और संरक्षण के जरिए उससे अधिक पानी का पुनर्भरण (Replenish) करेंगी।
- तकनीकी सुधार: शोधकर्ता अब ऐसी कूलिंग तकनीकों पर काम कर रहे हैं जिनमें पानी का कम से कम उपयोग हो या जो समुद्री पानी का इस्तेमाल कर सकें।
निष्कर्ष:
बेशक एआई हमारे जीवन को आसान बना रहा है, लेकिन इसकी कीमत हमारे प्राकृतिक संसाधनों को चुकानी पड़ रही है। भविष्य में एआई का विकास कितना 'सतत' (Sustainable) होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ये कंपनियाँ अपनी प्यास को कैसे नियंत्रित करती हैं।
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