चित्रकूट में सप्तावरण में विराजते हैं प्रभु श्रीराम

चित्रकूट में सप्तावरण में विराजते हैं प्रभु श्रीराम

  •   प्रभु की नाभि से प्रकट होने के बाद प्रजापति ब्रहमा ने चित्रकूट में रामार्चा करने के बाद शुरू किया था सृष्टि का आरंभ 

कामदगिरि पर्वत को कोई आश्चर्य की पहाड़ी कहता है तो कोई मेरू पर्वत का एक श्रंग। कोई कुछ भी अपना मत दे, पर इतना तो साफ है कि माता सीता के निवास के लिए यहीं पर पर्णकुटी का निर्माण किया गया था। वैसे वृहद चित्रकूट महात्म, अध्यात्म रामायण व वाल्मीकि रामायणम् को देखें तो श्री कामदगिरि का स्वरूप अलग ही दिखाई देता है। कामदगिरि पर्वत के मध्य में सान्तानक वन के बीचों-बीच प्रभु दिव्य साकेत में स्थित सप्तावरण में अपने सभी गणों के साथ विराजते हैं। वशिष्ठ संहिता का मत है ”रामस्य नाम रूपं च लीलाधाम परात्परं, एतच्चतुष्टयं सच्चिदानंद विग्रहं। इसका मतलब 11 साल 6 महीने और 18 दिन तक चित्रकूट निवास को वास्तव में लीलाधाम समझा जा सकता है। वैसे गोस्वामी तुलसीदास जी की विनय पत्रिका में सब कुछ साफ कर कहते हैं, ”चित्रकूट सब दिन बसत, सिय सौमित्र समेत। राम नाम जपु जाप कहिं, तुलसी अभिमत देत।।

चित्रकूट के बारे में इतना समझना चाहिए कि जहां पर प्रभु प्रतिक्षण वास करें वह स्थान परमधाम, साकेत, नित्यलोक, गोलोक, सांतानिक लोक व महाबैकुण्ठ है। इस रहस्य का अलग-अलग ग्रंथों में वर्णन भी आया है। चित्रकूट स्थित दिव्य साकेत के सप्तावरण की झांकी का हम दर्शन करते हैं।

साकेत दक्षिण द्वारे हनुमान राम वत्सलः।

यत्र सांतानिकन्नाम वनं दिव्यं हरेःप्रियं।।

अर्थात साकेतपुरी के दक्षिण द्वार में भक्त वत्सल श्री हनुमान जी महाराज रहते हैं। यहां पर भगवान को अति प्रिय सांतानिक वन है। आनंद पूर्ण रामायण व अध्यात्म रामायण के उत्तर कांड में सान्तानिक वन में ही दिव्य साकेत होने व वृहद्रामायण में श्री कामदगिरि के मध्य सांतानिक वन में ही दिव्य साकेत होने की बात कही गई है। वृहद चित्रकूट महात्म के अध्याय 4 का चैथा श्लोक दृष्टव्य है।

सन्तानक वनं नाम पर्वत मध्य सु संस्थितं।

मध्ये सरोवरं तत्र विधिना निर्मितं पुरा।।

इसी ग्रंथ के 15वें अध्याय के 36वां व 37वां श्लोक सारी कहानी कह देते हैं।

मंदाकिन्याः पश्चिमे च चित्रकूटाच्च पूर्वतः।

वैद्या दक्षिण तश्चैव सीतारामस्य चैत्तरे,

साकेत नगरं नाम वनं मुनि गणाश्रयं।।

अर्थात मंदाकिनी से पश्चिम एवं चित्रकूट से पूर्व यज्ञवेदी से दक्षिण तथा श्री सीताराम जी के उत्तर यह सब साकेत नगर नाम का वन है। इसमें सप्तावरण चक्र का सविस्तार वर्णन पाया जाता है।

प्रथमवरण में श्रीविमला जी, श्रीसुप्रभा जी, श्रीकांता जी, श्रीकान्तिमती जी, श्रीलक्षणा जी, श्रीअभिज्ञा जी, श्रीचंद्राजी, श्रीचंद्रमत जी, श्रीरंभाजी, श्रीराम प्रिया जी, श्रीज्ञानाभिज्ञाना जी, श्रीप्रिया जी, श्रीविभूतिदा जी, श्रीऋषिदा जी, श्रीरामपाद प्रिया जी, श्रीराम रंभाजी, श्रीरामरता जी, श्रीरामनाम परायणा जी, श्रीजानकीलक्षणाभिज्ञा जी, श्री जानकी पादसेविका जी, सप्रियतम श्रीप्रिया जू वेदी के मध्य कल्पतरू तले रतन सिंहासन पर विराजमान हैं। षोडश द्वारपाल उनकी सेवा में तत्पर हैं। द्वितीयावरण मेें अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्यषित्व, वशित्वादि नव निधियों सहित विराजमान हैं।

तृतीयावरण में गायत्री सहित चारांे वेद, अठारह पुराण, संहिताओं सहित आगमों के विराजमान होने का वर्णन है। चतुर्थावरण में ब्रह्म, शंभु, सूर्य, अष्ट, वसु, साध्य, मरूतगण, अश्विनी कुमार, देवराज इंद्र, चंद्रमा, सिद्व, गंधर्व एवं चारणों का वर्णन है। पंचमावरण में वशिष्ठ, वामदेव, देवल, गौतम, असित, वाल्मीकि, अंगिरा, गर्ग, गालव, च्यवन, भृगु, पुलस्त्य, पुल, विश्वामित्र, वामन, शक्ति, पराशर, व्यास, बोधायन, रैम्य, अत्रि, याज्ञवल्क्य, अज, जातुकर्ण, सेतु, बाजपेय, अग्निवेष, कौडिल्य, दुर्वासा, सुचंद्र, शुक्र, सारण, हारित, पर्वत, चंद्र, भरद्वाज, गृगीसुत, माडव्य, लिखित, सभ्य, सुरभ्य, पूति, भाषक, शेयद, अंतरिक्ष, मंड, माण्डली, बुध, मृकण्डक, जाबालि, जांजलि, मृण्य, शांडिल्य, सौरिभ, भानुरूप, रतम्भ, कुशारू, सनत, कुमार, दालभ्य, दीर्घ चक्षु, उद्वालक, आर्व, दीर्घतमा, वत्स, वात्सायन, मुदगल, मातंग, भागुरि, गर्गायन, गौमिल, जमदग्नि, सतानंद, जैमिन, गल, किंजलि, आसुरि, कणभ्रक, कण, आक्षीणघृत, कौशिक, पैठीन, शिरोभूति, सनाक, सुनारू, स्वम्भु, दध्यांगर्वण, वैज, वैश्वानर, कपिल, पंचशिखा, पुरोजास, जासुरि, आसुरि, मरू, प्रभृति, मुख्य महिर्षिगणों व असंख्यक मुनैश्चरों का सविस्तार वर्णन मिलता है। षष्टावरण में जाहन्नवी, गंगा, नर्मना, सरस्वती, कावेरी, भीमा, भीमरथी, वीणा, कृष्णवीणा, निर्विध्या, सरयू, मंदाकिनी, पयोष्णी, सावित्री, विरजा, कौशिकी, चंद्रभागा, ताम्रपर्णी, गौतमी आदि नदियां विराजमान हैं।

सप्तावरण में सुग्रीव, हनुमान, नल, नील, पनस, जाम्वंत, अंगद, मयंद, दधिमुख, केशरी, सुखेन, गन्धमाधन आदि का वर्णन है। कहा गया है कि देवतीर्थ, पावन नदी, सरोवर, सर, सागर नित्य कामदगिरि की परिक्रमा किया करते हैं। गोस्वामी जी इसकी उद्घोषणा इस प्रकार करते हैं, ”उदय अस्तु गिरि अरू कैलासू, मंदर मेरू सकल सुरवासू। सैल हिमाचल आदिक जेते, चित्रकूट जसु गावहिं तेते।।

वृहद चित्रकूट महात्म में वर्णन है कि चित्रकूट के मध्य में सांतानक वन है। इस वन के मध्य में ब्रह्मा जी के द्वारा निर्मित सरोवर है। सरोवर के उत्तर दिशा में मणियों से सुशोभित विश्वकर्मा जी द्वारा निर्मित मंदिर है। जिस मंदिर में इंद्रनील, महानील, पद्यरागादि मणियुक्त शिल्पकलाओं से शोभित चार द्वार हैं। वर्तमान में चारों मुखारबिंद चार द्वार ही माने जाते हैं। दरवाजों की देहली विद्रभ मणियों की है। तथा कपाट रत्नों से युक्त वज्र मणियों से जड़ित हैं। शिखरों में मणि और माणिक्यों से सुशोभित सुवर्ण के कलश हैं तथा मोतियों की लटकती मालाओं के विचित्र वितान शोभित हो रहे हैं। वह मंदिर हंस, कबूतर, मयूर, कोकिलादि के सुंदर शब्दों से गुंजित है। वज्रमणि जड़ित दीवाल से युक्त हजार खम्भों युक्त दिव्य मंदिर के मध्य में दिव्य रत्नों से जड़ित वेदिका है। यह वेदिका इतनी सुंदर है कि मानों तीनों लोकों की संपूर्ण वस्तुओं के सौंदर्य के सारतत्व से रची गई है। संपूर्ण रत्नों से विनिर्मित यह वेदिका अतिशय शोभा से युक्त है। सुंदर रत्नों का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप, ज्ञानियों की ज्ञानता, तीर्थों का निवास रूप ध्यान करने वालों का ध्यान सिद्वि देने वाली है।

भावनाहीन योगियों के लिए दुर्निरीक्ष्य तथा दुराराध्य वह वेदिका अपने अनन्य प्रभावों के द्वारा तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाली है। चैकोर चारो कोनों के मध्य प्रदेश में मणियों से जड़ित तीन-तीन सीढ़ी युक्त हैं। वेदी की पूर्व दिशा में सोपान से अति निकट ही काण्ड प्रमाण में मंदार नामक वृक्ष प्रजापतियों को हर्षित करने वाला है। वेदिका के दक्षिण दिशा में सोपान से एक काण्ड प्रमाण में पारिजात का वृक्ष मनुष्यों को संसार सागर से पार कराता है। वेदिका के पश्चिम दिशा में संतानक नामक वृक्ष संतान को देने वाला है। वेदिका के उत्तर दिशा में ताम्रत्रय नामक वृक्ष दुख दूर करता हुआ हरिचंदन के नाम से विख्यात है। वेदिका के मध्य में कल्पवृक्ष सुशोभित है। मंदिर के मध्य भाग से एक योजन तक इसकी छाया संपूर्ण पापों को सदा सर्वदा नष्ट कर देती है। वेदिका के उपरी भाग में दिव्य रत्नों से जड़ित सिंहासन स्थित है। इंद्र, नीलादि नवरत्नों से जड़ित यह स्वर्ण सिंहासन दिव्यस्तरणों से युक्त है, तथा पारिजात आदि वृक्षों की पुष्पवर्षा से वह सिंहासन सुशोभित है। उस पुष्पवर्षा से युक्त सिंहासन में श्यामवर्ण श्री रामसीता सहित विराजमान है। भगवान श्री राम जी का मंदिर चार द्वारों से युक्त है। पूर्व द्वार की रक्षा देव मंडल से युक्त इंद्र करते हैं। दोनों ओर सरस्वती व शतदू्र नामक नदियां हैं। पूर्व द्वार पर नंदन वन में प्रियाल, चंपक, देवदार, अशोक, आम, हरिताल, तमाल, कृतमाल, शीशम,साखू, कुदालु, कदम्ब आदि के वृक्षों पर मधुमक्खियां लगी हुई हैं। प्रातःकाल भगवान श्री राम मां जानकी के साथ यहां पर विराह करते हैं। दक्षिण दिशा के द्वार पर धर्मराज का पहरा रहता है। इस द्वार पर कृतमाला व ताम्रपर्णी नदियां बहती हैं। यह नदियां ब्रह्म हत्या का पाप दूर करती हैं।

वैश्राम्बिक वन नामक वन इस द्वार पर प्रतिष्ठित है। कदम्ब, किंसुक, कोल, लवंग, महुआ, पाटल, अशोक, मौलश्री, कुंद, कुर्वर, स्वर्णक्षीरी, शतपत्र, बांस व चमेली के वृक्ष हैं। यहां पर प्रभु मध्यान्ह में विहार करते हैं। पश्चिम दिशा के द्वार पर नलेश श्री वरूण जी दत्तचित्त होकर भगवान राम की सेवा में संलग्न हैं। इस द्वार के समीप पुष्पभद्र नाम का वन है। जिसमें कनेर, करंज, आम्र, जामुन, चमेली, पद्माक्ष, सुपारी, भिंडी, सरपत, शीशम, बरगद, पीपल, भिलावा, विल्ब, इमली, सेल, गुलाब, अशोक, दुबरिया, बेर, धमोई आदि के वृक्ष हैं। इस द्वार पर चंद्रभागा व कौशिकी नदियां हैं। भगवान यहां पर शाम के समय आते हैं। उत्तर दिशा के लोकपाल कुबेर जी हैं। यहां पर सरयू व यमुना नदियां प्रवाहित हैं। यहां चैत्ररथ नामक वन में हरीतिका, बहेडा, आमला, खजूर, भोजपत्र, केतकी, मालती, कुंद, जूही, प्रतिका, वासन्तिका, चंपक, नाग व चंपक, अनार, पारिजात, सान्तानक, हरिचंदन,नीला-लाल सफेद-पीत कमल, शतपथ आदि के वृक्ष जलाशयों व कूपों से सुशोभित इस वन में प्रभु रात्रि के समय विहार करते हैं।

वैसे चित्रकूट के आध्यात्मिक स्वरूप के दर्शन करें तो मालूम देता है कि अतःकरण चतुष्टय के मन, बुद्वि एवं अहंकार त्रयी त्रकूट को नियंत्रित रखने वाले कूटस्थ चिंत का नाम चित्रकूट है। इसी त्रयी समस्याओं का समाधान चित्त के माध्यम से होता है। सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा का जन्म श्री हरि की नाभि कमल से होता है। गर्भस्थ शिशु भी नाल के माध्यम से नाभि से संपर्क रखता है। चित्त के मूल स्थान का नाम है नाभि। अर्थात प्रभु के समस्त लीलाधामों की नाभि है चित्रकूट। यही कारण है कि सृष्टि रचना से पूर्व ब्रह्मा, अखिल ब्रह्माण्ड श्रष्टाप्रभु श्री राम का अर्चन चित्रकूट में करते हैं इसके पश्चात सृष्टि की रचना। जिसका वृहद उल्लेख वृहद रामायण व शिव संहिता में है।

पूर्व वाल्ये त्वया वत्स मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।

चित्रकूट कृता सृष्ट्यै श्री रामार्चाममाज्ञयया।।

                                    (शिव संहितायां)

गिरिः श्री चित्रकूटाख्यो यत्र मंदाकिनी नदी।

तयोर्मध्ये सु विस्तीर्णा त्रिंशद्वनुष मायता।।

एतत् क्षेतं प्रियतमं न कश्मैचित्प्रकाशितं।

तत्र त्वं धनुष क्षेत्रे यज्ञं कुरू पितामह।। 

                (वृहद चित्रकूट महात्म 8/5-7)

(लेखक जगद्गुरू स्वामी रामभद्राचार्य जी के उत्तराधिकारी व श्री तुलसी पीठ द्वारा संचालित जगद्गुरू रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय सहित अन्य संस्थाओं के प्रमुख हैं)