चित्रकूट के अगूढ़ तथ्यों के खोज की यात्रा

चित्रकूट के अगूढ़ तथ्यों के खोज की यात्रा

@राजकुमार याज्ञिक

पिछले माह चित्रकूट के अगूढ़ तथ्यों की खोज के लिए 12 दिनी यात्रा का आयोजन किया गया। संतोष बंसल द्वारा आयोजित इस यात्रा में 1 हजार किमी से भी ज्यादा का सफर तय कर यहाँ के पौराणिक, ऐतिहासिक और साहसिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण 50 से भी अधिक स्थलों की तथ्यपरक जानकारियाँ जुटा उन्हें लोगों तक पंहुचाने के उद्देश्य से शुरू हुई यात्रा में शामिल सदस्य प्राकृतिक वैभव, ऐतिहासिक तथ्यों व धार्मिक रहस्य जानकार रोमांचित हो उठे।

जिला मुख्यालय स्थित पेशवा कालीन जोग महल से प्रारंभ हुई यात्रा सबसे पहले राम घाट पंहुची। ईसा से 5 हजार 89 वर्ष पूर्व, यानि आज से 7 हजार 106 साल पहले अपने सबसे बड़े पुत्र और प्रजा के सबसे दुलारे राजकुमार को जब उसके पिता अयोध्या नरेश दशरथ ने, उसकी 25 वीं सालगिरह के दिन न सिर्फ राजभवन बल्कि राज्य से भी निकल जाने का आदेश सुनाया तो राजकुमार राम ने ऋषि मुनियों से सलाह पर चित्रकूट में निवास करने का फैसला किया था। अपने छोटे भाई और पत्नी के साथ, ब्रह्मा की पुत्रवधू अनुसूइया द्वारा अपने तप के प्रभाव से प्रकट की गयी मंदाकिनी नदी के जिस घाट से होकर राम चित्रकूट पंहुचे उस घाट को आज राम घाट के नाम से जाना जाता है। मंदाकिनी नदी के इस घाट के एक किनारे उत्तर प्रदेश है, तो दूसरे किनारे पर मध्य प्रदेश। चित्रकूट निवास के प्रारंभिक दिनों में युवराज राम अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ यहीं स्नान करते थे।

यात्रा संयोजक संतोष बंसल के नेतृत्व में सभी लोग राम घाट में ही स्थित पर्ण कुटी मंदिर पंहुचे। पर्ण कुटी के बाद यात्रा दल तुलसी कुटी पंहुचा। विश्व प्रसिद्द ग्रन्थ, राम चरित मानस के रचनाकार, गोस्वामी तुलसी दास संवत 1607 में राम मिलन की आस में काशी छोड़ चित्रकूट चले आये। उन्होंने भी अपने निवास के लिए चित्रकूट में प्रवाहमान मंदाकिनी के उसी किनारे का चुनाव किया जंहा वनवास काल में राम, जानकी और लक्ष्मण के साथ निवास किया करते थे। हनुमान की कृपा से चित्रकूट में मंदाकिनी नदी के किनारे इसी चबूतरे में चन्दन घिस रहे तुलसी को संवत 1607 के दौरान 56 वर्ष की आयु में रघुकुल तिलक राम और लक्ष्मण के दर्शन हुए थे।

‘‘चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीड़। तुलसीदास चन्दन घिसत तिलक देत रघुवीर’’

चित्रकूट में प्रवाहमान मन्दाकिनी नदी के उत्तर प्रदेश वाले किनारे मिट्टी के जिस टीले पर ब्रह्मा ने यज्ञ वेदी का निर्माण कर यज्ञ किया वह स्थान आज यज्ञ वेदी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर बने विशाल यज्ञ कुण्ड को आज भी देखा जा सकता है। यज्ञ वेदी स्थल का तथ्यांकन कर यात्री दल राघव प्रयाग घाट पंहुचा।

चित्रकूट में वनवास बिता रहे राम ने यंही पर अपने पिता अयोध्या नरेश दशरथ के निमित्त श्राद्ध कर्म कर पिंडदान किया था। अपने पूर्वजों के मोक्ष की कामना से आज भी लोग पितृपक्ष में इस राघव प्रयाग घाट आकर श्राद्ध और पिंडदान करते हैं।

चित्रकूट में जब हनुमान ने तोते के स्वरुप में आकर रामघाट स्थित तुलसी चबूतरे में चन्दन घिस रहे गोस्वामी तुलसी दास को राम लक्ष्मण की पहचान कराते हुए उनके दर्शन कराये तो तुलसी दास ने हनुमान के प्रति अपनी श्रद्दा और कृतज्ञता अर्पित करते हुए पच गव्य से हनुमान के तोता रूप की एक प्रतिमा का निर्माण कर उसकी पूजा करने लगे। कामदगिरी भवन के सामने स्थित बाजार की दूकानों के बीच बेहद संकरी सीढ़ियों से होकर तुलसी दास द्वारा स्थापित इन तोतामुखी हनुमान के दर्शन करने के बाद सब ने चित्रकूट में औरंगजेब द्वारा बनवाये गए मन्दिर का रुख किया। सन् 1683 रमजान के महीने के 19वें दिन मुगल सम्राट औरंगजेब चित्रकूट आया था। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार औरंगजेब हिन्दू धर्म का कट्टर विरोधी तथा हिन्दुओं के मठ-मन्दिरों को ढहाने वाला तथा उनके देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ने वाला था, किन्तु चित्रकूट आने पर यंहा के आध्यात्मिक शक्ति संपन्न संतो का उस पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने चित्रकूट में ना सिर्फ एक मंदिर का निर्माण किया बल्कि श्री ठाकुर जी की ‘पूजा एवं भोग’ के लिए माफी के रूप में आठ गांव और कृषि योग्य बिना लगानी 330 बीघा अतिरिक्त भूमि के साथ-साथ मन्दिर के अन्य खर्चों के लिए एक रुपया दैनिक अनुदान (भत्ता) भी प्रदान किया था। औरंगजेब के इस ‘फरमान’ को आगे चल कर चित्रकूट के अधिपति पन्ना नरेश महाराज हिंदूपत (सन् 1894 ई.) ने भी स्वीकार किया और बाद में अंग्रेजों ने भी उसे ज्यों का त्यों बरकरार रखा।

इसके बाद यात्रियों ने शाम को देव गंगा मंदाकिनी की आरती उतारी और रामघाट में सजीधजी नावों में चित्रकूट में पर्यटन विकास और हमारी भूमिका विषय को लेकर एक विचार गोष्ठी हुई। इस विचार गोष्ठी में कामदगिरी प्रमुख द्वार के अधिकारी संत मदन गोपाल, भरत मंदिर के महंत दिव्य जीवन दास, ग्रामोदय विश्व विद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष अभय वर्मा, भाजपा जिला संगठन के वरिष्ठ जिलाध्यक्ष चन्द्र प्रकाश खरे के साथ साथ अन्य साधु संतों ने अपने अपने विचार रखे।

गणेश बाग, कोटितीर्थ, देवांगना और बांके सिद्ध 
चित्रकूट के ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों के अगूढ़ तथ्यों की खोज के लिए निकली यात्रा दूसरे दिन कोटितीर्थ पंहुची। विंध्य पर्वतमाला की गोद में स्थित यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुन्दरता की वजह से प्रकृति प्रेमी सैलानियों की मनपसंद सैरगाह के रूप में विकसित किया जा सकता है। यहाँ के घुमावदार पहाड़ी रास्ते पर्यटकों को मसूरी की वादियों का सा अहसास दिलाते हैं।
कोटितीर्थ से लगभग एक किलोमीटर आगे इसी पर्वत में देवांगना नामक तीर्थ है। जनश्रुतियों के अनुसार वनवास के समय भगवान राम से मिलने के लिए जब देवतागण आये थे तो देवराज इंद्र की पत्नी शची समेत तमाम देवताओं की पत्नियां इसी स्थान में रुकी थीं इसीलिए इसका नाम देवांगना पड़ा।

कोटितीर्थ से थोड़ा नीचे उतरने पर पर्वत में शिलाखंडों से निर्मित ऐसी गुफाएं हैं जो लम्बे अवधि तक निर्विघ्न साधना के लिए सर्वथा उपयुक्त है। पंपापुर नाम की ऐसी ही एक गुफा में बजरंगबली भी विराजे हैं जहां निरंतर जलधारा प्रवाहित होती रहती है। हनुमान की इस दक्षिणमुखी प्रतिमा पर लोगों की अटूट आस्था है जिसके चलते यहाँ भंडारों का आयोजन होता रहता है । सूर्यास्त के समय इन पहाड़ियों से थोडा नीचे आने पर ऐसा लगता है जैसे अस्ताचल गामी सूर्य कामदगिरी के मस्तक पर दमकते हुए स्वर्ण मुकुट के रूप में स्थापित हो गए हों। इस स्थान से चित्रकूट के जिस विहंगम दृश्य के दर्शन होते हैं वह अपने आप में अद्भुत है।

गणेशबाग की इमारतों का निर्माण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। इमारत में प्राचीन शैली के भव्य षट्कोणीय मन्दिरों के पांच शिखर है जिनके भित्ति-प्रस्तरों पर बेहद खूबसूरती से नक्काशी कर देवी-देवताओं की असंख्य मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं। इन्हीं मूर्तियों के बीच कुछ मूर्तियों में रतिक्रीड़ा का भी चित्रण है। गणेश बाग के प्रवेश द्वार के पास ही सात मंजिल की एक बावली भी निर्मित है। इस इमारत के छः तल पानी में डूबे हुए हैं। एक विशाल कूप से इस पूरी इमारत में पानी पहुंचता है।   

चित्रकूट के जिला मुख्यालय कर्वी से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर विंध्यपर्वत श्रृंखला के पर्वत के मध्यभाग पर एक बड़ी प्राकृतिक गुफा है। जनश्रुतियों के अनुसार इस स्थान में साधना करने से वाणी की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। वाक् सिद्ध नाम के इस स्थान का नाम अपभ्रंश होकर बांके सिद्ध पड़ गया है।

जानकीकुंड, स्फटिक शिला और अनुसूईया आश्रम का किया अवलोकन
तीसरे दिन यात्रा सर्वप्रथम मन्दाकिनी नदी के सुरम्य तट पर स्थित भगवती जानकी के स्नान करने के स्थान जानकीकुंड पहुँची। वनवास काल में चित्रकूट प्रवास के दौरान सीता यहीं स्नान किया करती थीं। जगतगुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज के अनुसार इस स्थान में आज भी किसी स्त्री के स्नान के बाद अपने बाल फटकारने जैसी आवाजें सुनाई देती हैं। यहाँ सीता के चरण चिन्ह भी बने हुए हैं। मन्दाकिनी तट पर स्थित चित्रकूट के परम साधक पूज्य पंजाबी भगवान् के आश्रम से आती सीताराम नाम संकीर्तन की धुन यहाँ के वातावरण को और भी दिव्य बना देती है।

जानकीकुंड से आगे बढ़ते हुए यात्रा स्फटिक शिला पंहुची। राम की मानवीय लीलाओं में से सबसे मधुर लीला की गवाह यह चट्टान यहाँ आये लोगों को नारी सम्मान का सन्देश सुनाती है। यह वही स्थान है जहाँ वनवास के समय भगवान् श्रीराम ने अपने हाथों से पुष्प चुनकर सीताजी का श्रृंगार किया था। तुलसी के शब्दों में -
       एक बार चुनि कुसुम सुहाए निजकर भूषन राम बनाए।
       सीतहि पहिराये प्रभु सादर। बैठे फटिक शिला पर सुन्दर।।

भगवान् राम की इस मानवीय लीला से भ्रमित हो इन्द्रपुत्र जयन्त ने राम की परीक्षा लेने के लिए कौवे का भेष बना सीता के वक्षस्थल में अपनी चोंच का प्रहार कर उन्हें लहुलुहान कर दिया। देवताओं के राजा इंद्र के पुत्र जयंत के इस दुस्साहस पर राम ने उसे दंड दे, आततायी चाहे कोई भी क्यों न हो उसे अपराध की सजा मिलनी ही चाहिए की अवधारणा कायम करते हुए चित्रकूट में राम राज्य की नींव डाली थी। स्फटिक शिला से करीब 17 कि.मी. की दूरी तय कर चित्रकूट के दिग्दर्शन की अध्ययन यात्रा का दल मन्दाकिनी प्राकट्य स्थल महासती अनुसूया तथा महर्षि अत्रि की तपस्थली ‘अनसूया आश्रम’ पहुंचा। शास्त्रों में इस वनांचल को ‘कामदवन’ कहा गया है।

यह वही पवित्र भूमि है जहाँ परम तपस्वी महासती अनसूया ने स्वर्ग से लाकर मन्दाकिनी गंगा को प्रवाहित किया था। महासती अनसूया इसी पावन धाम में अपने सतीत्व की परीक्षा लेने आये ब्रह्मा, विष्णु, महेश को छः-छः महीने के बालक बनाकर पालने में झुलाया करती थीं।

साहसिक पर्यटन का बनाया जाए केंद्र मड़फा
युवराज राम को वनवास छोड़ वापस अयोध्या ले जाने के लिए भरत चित्रकूट आये थे। वह अपने साथ राम के राज्याभिषेक की सारी सामग्री भी लाये थे लेकिन राम द्वारा राजतिलक से इनकार कर 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के उपरान्त ही अयोध्या लौटने का निर्णय सुनाये जाने पर भरत ने गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से अपने साथ लाये गए समस्त तीर्थों के जल को चित्रकूट के एक कुएं में डाल दिया था। भरत द्वारा जिस कुएं में वह जल डाला गया उसे भरतकूप और जिस जगह वह कुआं था उसे भारतपुर के नाम से जाना जाने लगा। यात्रा का अगला पड़ाव था मानपुर गाँव के पास हरी भरी पहाड़ियों के शिखर पर पांच मुख और आठ भुजाओं वाले क्रोधित स्वरुप में विराजे शिव का धाम मड़फा। साहसिक पर्यटन प्रेमियों के लिए यह शानदार इलाका है। महाभारत युद्ध के दौरान तीर्थ यात्रा पर निकले विदुर ने कुछ समय तक यहाँ निवास किया था। मडफा महादेव का यह स्थान ऋषि मुनियों और साधू संतों की साधनास्थली भी रहा है। 

बृहस्पति कुण्ड
यात्रा छठवें दिन कालिंजर से लगभग 45 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के ब्रजपुर गाँव के पास दूर तक फैले विशाल वन प्रांत के बीच लम्बी गुफाओं और जलकुण्डों वाले क्षेत्र पहुंच गयी। आदिमानवों की निवास स्थली रहा यह इलाका आज भी निर्जन और बियावान होने के चलते प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार एक दिन देवराज इंद्र जब रास रंग की महफिल सजाये थे तभी देवगुरु बृहस्पति उनके दरबार जा पहुंचे। नृत्य गान में मन रमाये इंद्र को देवगुरु बृहस्पति के दरबार में आने का भान ही नहीं हुआ और इंद्र की इस हरकत से खिन्न होकर बृहस्पति गंगा स्नान की बात कह स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक चले आये।


चित्रकूट प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा है। पर्वतों, गुफाओं और जलप्रपातों की बहुलता वाला यह इलाका केवल आध्यात्मिक गतिविधियों का ही नहीं मानव सभ्यता के विकास का भी गढ़ था। ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों अत्रि व अंगिरा सहित महर्षि बाल्मीकि, शरभंग, अगस्त, पतंजलि, शाण्डिल्य और भुषुण्डि जैसे तपस्वी महात्माओं की इस साधनास्थली में आज भी उनकी दिव्य आध्यात्मिक शक्ति को संजोये कुछ एक आश्रम दिखाई पड़ते हैं।  

धर्म व पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण चित्रकूट क्षेत्र की तरफ सरकार का ध्यान आकृष्ट करा इस प्राचीनतम तीर्थ के सम्यक् विकास की संभावनायें जगाने के लिए 7 सितंबर से चित्रकूट के अगूढ़ रहस्यों को खोजने निकला ‘अ हेरिटेज जर्नी विद संतोष बंसल’ यात्रादल सातवें दिन शरभंग आश्रम पहुंच गया। यात्रा के संयोजक संतोष बंसल को मिली जानकारी के अनुसार गौतम कुल में उत्पन्न अणिमा आदि समस्त सिद्धियों तथा आध्यात्मिक शक्तियों से सम्पन्न, वेदों के ज्ञाता परम तपस्वी शरभंग ऋषि की यह तपोभूमि चित्रकूट के सबसे सुंदर, प्राकृतिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों में से एक है। 

शरभंग ऋषि नित्य अग्निहोत्र करने वाले अग्निहोत्री याज्ञिक ऋषि, योग विद्या के पारंगत महायोगी और ब्रह्मविद्या के उपासक थे। शरभंग अपनी इच्छा से ही मृत्यु को वरण करने की शक्ति के स्वामी थे, तपसाधना के बल पर इन्हांने काल पर भी विजय प्राप्त कर ली थी। योगविद्या तथा आध्यात्मिक शक्तियों के बल पर वह देवताओं से वार्तालाप तथा सत्संग आदि करने में समर्थ थे।

वाल्मीकि कृत रामायण के अनुसार अपने आश्रम आये श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का शरभंग जी ने स्वागत सत्कार किया। जिस समय राम शरभंग मुनि के आश्रम पहुंचे थे उस समय देवराज इंद्र भी वहां आये हुए थे और राम को आते देख वापस लौट गए थे। 
शरभंग आश्रम से कुछ दूर सुतीक्ष्ण आश्रम है। सुतीक्ष्ण अगस्त्य मुनि के शिष्य थे। एक बार अगस्त मुनि सुतीक्ष्ण को आश्रम तथा भगवान् शालिग्राम की पूजा अर्चना का दायित्व सौंप तीर्थ यात्रा पर चले गए। उन दिनों आश्रम के इर्द गिर्द पकी जामुनों से लदे पेड़ों को देखकर छोटी उम्र के सुतीक्ष्ण का मन जामुन खाने का हुआ और वह अपनी मंडली के साथ शालिग्राम की बटिया उछाल पेड़ों से जामुन गिरा खाने लगे। इस क्रम में शालिग्राम की बटिया कहीं गुम हो गयी तो सुतीक्ष्ण शालिग्राम की बटिया की जगह जामुन रखकर उसे ही शालिग्राम की तरह पूजने लगे। जब अगस्त ऋषि वापस लौटे और खुद पूजा अर्चना करने बैठे तो शालिग्राम की जगह जामुन देख सुतीक्ष्ण से पूंछतांछ की तो सुतीक्ष्ण ने बहाना बनाते हुए कह दिया कि रोज रोज नहलाने और चन्दन लगाने से शालिग्राम पिलपिले हो गए होंगे। सुतीक्ष्ण की इस बात पर नाराज हो अगस्त मुनि ने उन्हें आश्रम से निकालते हुए कहा कि अब भगवान् को लेकर ही आश्रम में प्रवेश करना। गुरुदेव के आदेश का पालन करते हुए सुतीक्ष्ण अगस्त मुनि के आश्रम से निकलकर चित्रकूट में जिस जगह रहकर भगवान् की प्राप्ति के लिए तपस्या कर रहे थे यह वही स्थान है। सुतीक्ष्ण जहां तपस्या करते हुए भगवान राम के आने की प्रतीक्षा करते थे वह स्थान आज सुतीक्ष्ण आश्रम के नाम से जाना जाता है।

रावण के सेनापति का राम ने विराध कुण्ड में किया था वध
धारकुण्डी चित्रकूट तीर्थ का सर्वाधिक आकर्षक, मनोहारी तथा प्राकृतिक सुषमा सम्पन्न संत आश्रम है। धारकुण्डी आश्रम परिसर में ही एक छोटा लेकिन दिव्य जलाशय है जनश्रुति के अनुसार यह वही अघमर्षण कूप है जहाँ पाण्डवों के वनवास काल में चित्रकूट प्रवास के दौरान यक्ष युधिष्ठिर संवाद हुआ था। 

इसके बाद यात्रा दल दुर्गा सप्तशती के रचयिता ऋषि मार्कंडेय के आश्रम से होते हुए अयोध्या नरेश व भगवान् राम की पीढ़ी से 10 पीढ़ी पूर्व उनके पूर्वज महाराज अम्बरीश की साधनास्थली अमरावती पहुंचा। घनघोर जंगल के मध्य स्थित यह साधनास्थली प्रकृति की अनुपम धरोहर है। पर्वतों के मध्य से होकर प्रवाहित हो रही नदी के किनारे ऊंचे ऊंचे वृक्षों और लताओं से सुशोभित कोलाहल और प्रदूषण से मुक्त यह स्थान साधना हेतु सर्वथा उपयुक्त है। 

इंद्र के दरबार की अप्सरा रम्भा पर अतिशय आसक्त होने पर तुम्बरू नामक गन्धर्व को कुबेर ने राक्षस होने का श्राप दिया था। श्राप के प्रभाव से तुम्बरू राक्षस बन विराध के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अतुलित बलशाली यह राक्षस रावण का सेनापति था और दण्डवन तक फैले रावण के साम्राज्य की सीमा पर तैनात था। विराध इतना दुस्साहसिक था कि उसने वनवास में आये राम और लक्ष्मण के बीच चल रही सीता का अपहरण कर लिया और राम को युद्ध के लिए ललकारा। मध्यप्रदेश के रक्सेलवा नामक स्थान पर राम और विराध के मध्य शुरू हुआ युद्ध चैदह दिनों तक चलता रहा। इस युद्ध के दौरान राम ने विराध को लगभग 80 किलोमीटर पीछे खदेड़ते हुए जिस स्थान में उसका वध किया वह स्थल विराध कुंड के नाम से जाना जाता है। 

राघव प्रपात, चर सोमनाथ मंदिर और लव जन्म स्थली
यात्रा संयोजक संतोष बंसल के नेतृत्व में आगे बढ़ते हुए यात्रा दल चित्रकूट-कर्वी से 12 कि.मी. पूर्व कर्वी-मानिकपुर रोड के मध्यवर्ती ग्राम चर में वाल्मीकि नदी के तट पर एक पहाड़ी पर बने भगवान सोमनाथ शिव जी के भव्य प्राचीन मन्दिर पहुंच गया।

चित्रकूट के जिला मुख्यालय कर्वी से मात्र 14 किलोमीटर दूर गुंता और केवई नदी के बीच बसा गहोरा की राजधानी रहा यह इलाका इतना सुव्यवस्थित और सुन्दर था कि इसे देखने के लिए अरब और फारस के यात्री आया करते थे। व्याघ्रदेव ने सौराष्ट्र के सोमनाथ मन्दिर की तर्ज में चर के इस ‘सोमनाथ मन्दिर’ का निर्माण कराया था। परन्तु वर्तमान में मंदिर परिसर में लोगों द्वारा अवैध निर्माण कराया जा रहा है जिससे ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों को समेटे इस स्थान के नष्ट हो जाने की पूरी संभावना है। सोमनाथ मंदिर की अद्भुत शिल्पकला का अवलोकन कर यात्रा दल बाल्मीकि आश्रम पहुंचा। आदि कवि और रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि चित्रकूट में निवास करते थे। आनंद रामायण के अनुसार वनवास पूरा होने पर राम का राज्याभिषेक होने के बाद जब सीता का निर्वसन हुआ तो लक्ष्मण दासियों, सखियों और तुलसीदल के साथ सीता जी को रथ में बैठाकर दक्षिण मार्ग से गंगा, यमुना और मन्दाकिनी नदी को पारकर चित्रकूट में बाल्मीकि आश्रम में छोड़ गए थे। सीता जी ने इसी स्थान में लव को जन्म दिया था। 

दानवों का भी साधना स्थल रहा है बरहा कोटरा
तत उत्थाय ते सर्वे स्प्रष्टा नध्यः शिवं जलम। पन्थान म्रशिभिर्जुशतम चित्रकूटस्य तं ययुः।।
चित्रकूट सिर्फ देवी देवताओं और ऋषि मुनियों की ही तपस्थली नहीं है बल्कि सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए दानव भी यहां तपस्या किया करते थे। महाभारत काल में दैत्यराज बाणासुर की राजधानी रहा यह क्षेत्र असुरों का आराधना स्थल रहा है। 
कोटरा गाँव के इर्दगिर्द कई छोटी छोटी पहाड़ियों में से एक है सुगरिया पथरी। इस पहाडी में हजारों वर्ष पूर्व आदिमानवों के बनाये गए शैल चित्र बिखरे पड़े हैं। इन शैलचित्रों में युद्धरत योद्धाओं, विभिन्न प्रकार के आयुधों और जानवरों के आखेट के चित्रों की भरमार है। 

दशरथ घाट और लौरी का किला
भरद्वाज मुनि की आज्ञा से राम जब प्रयाग से चित्रकूट की ओर चले तो  चित्रकूट पहुंचने से पहले विन्ध्य पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित करका पहाड़ की प्राकृतिक गुफाओं, कल कल बहती जल धाराओं ने राम के कदम रोक लिए। राम को यह स्थान इतना भाया कि वह सीता और लखन के साथ यहीं ठहर गए। करका की इस पहाड़ी में आज भी वह गुफा देखी जा सकती है जिसमें राम और सीता ने कुछ दिन निवास किया था।

संवत 1631 में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गयी रामचरित मानस के किये दर्शन
चित्रकूट क्षेत्र के लुप्तप्राय बारहवें दिन रामचरित मानस की रचना कर भगवान् राम के पावन चरित्र को विश्व व्यापी बनाने वाले संत गोस्वामी तुलसी दास की जन्मस्थली राजापुर कस्बा यात्रा पहुंची। यात्रा दल ने तुलसीदास की हस्तलिखित रामचरित मानस के दर्शन किए। संवत सोलह सौ इकतीस में 77 वर्ष की उम्र में तुलसी दास ने हनुमान की प्रेरणा से राम के चरित्रों को दुनिया के सामने रखने के लिए एक ग्रन्थ लिखने का निश्चय किया और दो वर्ष सात माह और छब्बीस दिनों की मेहनत राम चरित मानस के रूप में अगहन शुक्ल सप्तमी संवत सोलह सौ तैंतीस में दुनिया के सामने आई। तुलसी के इस ग्रन्थ ने राम को घर घर पहुंचा दिया। काशी में राम चरित मानस की रचना पूरी करने के बाद तुलसी अपनी जन्म भूमि राजापुर लौट आये और यहीं रहकर राम का गुणगान करने लगे।
7 सितम्बर से प्रारम्भ हुई यात्रा 12 दिनों में लगभग 1 हजार किलोमीटर का सफर पूरा कर चित्रकूट क्षेत्र के पचास से भी अधिक पौराणिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक सुषमा से भरपूर स्थलों का भ्रमण कर वहां की जानकारियाँ जुटाने के बाद यात्रा संयोजक संतोष बंसल के नेतृत्व में रामघाट पहुँची और वहां चित्रकूट के क्षेत्रपाल मत्तगयेंद्र महादेव का दर्शन कर उनका आशीर्वाद लेकर यहीं यात्रा का समापन हो गया।