कालिंजर किला बना प्रदेश का पहला राष्ट्रीय भू-धरोहर स्थल
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने बांदा जिले के ऐतिहासिक कालिंजर किले की पहाड़ी को राष्ट्रीय भू-धरोहर स्थल घोषित किया है। यह उत्तर प्रदेश का पहला...
बांदा की ऐतिहासिक कालिंजर किले की पहाड़ी अब राष्ट्रीय भू-धरोहर स्थल, जीएसआई ने घोषित किया
भू-विज्ञानियों ने बताया – 2.5 अरब वर्ष पुरानी ग्रेनाइट पर 1.2 अरब वर्ष पुरानी कैमूर बलुआ की परतें, पृथ्वी के इतिहास का विशाल अभिलेखागार
ईपरकियन अनकन्फॉर्मिटी की अनूठी घटना भी संजोए है कालिंजर, मिलने लगा वैश्विक ध्यान
बांदा (उप्र)। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने बांदा जिले के ऐतिहासिक कालिंजर किले की पहाड़ी को राष्ट्रीय भू-धरोहर स्थल घोषित किया है। यह उत्तर प्रदेश का पहला भू-धरोहर स्थल बना है। जीएसआई के अपर महानिदेशक राजिंदर कुमार ने समारोह में बताया कि कालिंजर क्षेत्र में “एपार्कियन अनकॉन्फॉर्मिटी” नामक दुर्लभ भूवैज्ञानिक घटना देखने को मिलती है। यहाँ नीचे की ओर बुंदेलखंड ग्रेनाइट की लगभग 2.5 अरब वर्ष पुरानी चट्टानें हैं, जिनके ऊपर विंध्य पर्वत श्रेणी का करीब 1.2 अरब वर्ष पुराना कैमूर बलुआ पत्थर जमा हुआ है। इन दोनों चट्टानी परतों के बीच पृथ्वी के इतिहास का करीब 130 करोड़ वर्ष का एक कालखंड गायब है, जो भूवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत रोचक और अद्वितीय माना जाता है।
इस प्रकार कालिंजर की पहाड़ी पृथ्वी के प्राचीन इतिहास का विशाल अभिलेखागार है। यहाँ की भू-रचना और स्थानीय पत्थरों से निर्मित किले की दीवारें क्षेत्र की अनूठी भू-सांस्कृतिक विरासत का परिचायक हैं। GSI के अनुसार, इस भू-विरासत पहचान से क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। जीएसआई ने किले के परिसर में सूचना पट्टिकाओं (इन्फो बोर्ड) की व्यवस्था कर पर्यटकों को स्थल के भू-वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व की जानकारी देने का प्रावधान किया है। साथ ही खजुराहो और चित्रकूट से कालिंजर को जोड़ने वाला एक पर्यटन चक्र (टूरिज्म सर्किट) विकसित करने की योजना है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा।
भू-विज्ञानियों का मानना है कि कालिंजर जैसी एपार्कियन अनकन्फॉर्मिटी वाली जगहें अध्ययन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह पृथ्वी की प्राचीन प्लेट-प्रक्रियाओं और भू-परतों के क्रम को समझने में मदद देती हैं। राष्ट्रीय भू-धरोहर के रूप में मान्यता मिलने से कालिंजर में शोध और शैक्षिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। पॉलिसी सिफारिशें: राज्य सरकार को स्थल की रक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए भू-पर्यटन योजनाएँ बनानी चाहिए। इसके तहत गाइडेड टूर, शैक्षिक सूचना केंद्र और संरक्षण के उपाय अपनाए जाएँ। भू-धरोहर को सांस्कृतिक पर्यटन के साथ जोड़कर व्यापक विकास नीतियों में शामिल करने से बुंदेलखंड क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक उत्थान को भी बल मिलेगा।
साभार - हिन्दुस्तान डिजिटल
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