बाँदा : खाकी की साख पर फिर सवाल : युवक के अपहरण और 20 लाख की अवैध वसूली के मामले में थानाध्यक्ष समेत 7 पर मुकदमे का आदेश
कानून की रखवाली करने वाली पुलिस जब खुद ही कानून तोड़ने लगे, तो व्यवस्था की सच्चाई सामने आ जाती है। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से ऐसा...
बांदा। कानून की रखवाली करने वाली पुलिस जब खुद ही कानून तोड़ने लगे, तो व्यवस्था की सच्चाई सामने आ जाती है। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से ऐसा ही एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें पुलिस की खाकी एक बार फिर दागदार हुई है। युवक के अपहरण, अवैध वसूली और फर्जी मुकदमे में जेल भेजने के आरोप में तत्कालीन थानाध्यक्ष अतर्रा समेत सात पुलिसकर्मियों के खिलाफ अदालत ने मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं।
मामला बबेरू थाना क्षेत्र के ग्राम हरदौली निवासी कमालुद्दीन पुत्र हाजी ताहिर से जुड़ा है। पीड़ित ने न्यायालय में दिए गए प्रार्थना पत्र में बताया कि 24 सितंबर 2023 को वह अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी से फतेहपुर गया था। उसी दौरान सादी वर्दी में पहुंचे कुछ पुलिसकर्मियों ने हथियारों के बल पर उसकी गाड़ी रुकवाई और जबरन उसे अपनी निजी गाड़ी में बैठाकर बांदा के अतर्रा थाने ले गए।
आरोप है कि थाने के पास स्थित पुलिस कॉलोनी में उसे 24 से 26 सितंबर 2023 तक अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया। इस दौरान पुलिसकर्मियों ने उसे झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी दी और जेल से बचाने के बदले 20 लाख रुपये की मांग की।
कमालुद्दीन का कहना है कि परिवार ने कर्ज लेकर किसी तरह 20 लाख रुपये की रकम पुलिस को दी। इसके बाद जब पुलिस को उसके बैंक खाते में तीन लाख से अधिक की राशि होने की जानकारी मिली, तो दो लाख रुपये और मांगे गए। रकम न दे पाने पर पुलिस ने उसे 2 किलो 250 ग्राम गांजा और एक अवैध तमंचे के साथ दिखाकर जेल भेज दिया। इस मामले में उसे करीब 15 दिन तक जेल में रहना पड़ा।
जमानत पर रिहा होने के बाद पीड़ित ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को पत्र भेजकर न्याय की गुहार लगाई। डीजीपी के निर्देश पर कराई गई जांच में तत्कालीन क्षेत्राधिकारी गवेंद्र पाल ने थाना प्रभारी अतर्रा अरविंद कुमार, सिपाही सुधीर कुमार चौरसिया, महेश्वर प्रसाद, अंकित वर्मा, अरमान अली और अखिलेश कुमार पांडे को दोषी पाया।
इसके बाद तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल ने सभी आरोपित पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। हालांकि, विभागीय कार्रवाई के बावजूद उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। बाद में पुलिसकर्मियों की बर्खास्तगी की संस्तुति के लिए अपर पुलिस अधीक्षक की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया गया।
पीड़ित का यह भी आरोप है कि वर्ष 2021 में उसने बउवा उर्फ रघुनाथ सिंह नामक व्यक्ति को चक्की लगवाने के लिए ढाई लाख रुपये दिए थे, जो कथित रूप से पुलिस का मुखबिर था। पैसे वापस मांगने पर उसे फंसाने की साजिश रची गई।
जांच में यह भी सामने आया कि पुलिसकर्मी बिना किसी जीडी एंट्री के फतेहपुर गए थे और उनकी मोबाइल लोकेशन भी वहीं पाई गई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के बाद दोबारा हुई जांच में भी सभी आरोप सही पाए गए।
आखिरकार पीड़ित ने न्यायालय की शरण ली। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश / विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावित क्षेत्र) बांदा, गगन कुमार भारती ने प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध पाए जाने पर थाना अतर्रा के थानाध्यक्ष को निर्देश दिए कि आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ सुसंगत धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना कराई जाए।
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