और... विकलांगता हार गई

और... विकलांगता हार गई

देश की आजादी के बाद सन् 1950 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में एक ऐसे सन्त का जन्म हुआ जिन्हें आज हम सभी जगदगुरू रामभद्राचार्य के नाम से जानते हैं। माता शचि देवी और पिता पं. राजदेव मिश्र के घर पर जन्में गिरिधर मिश्र आज अपनी अलौकिक ज्ञान व विलक्षण प्रतिभा के कारण विश्व भर में जाने जाते हैं। विश्व भर के लाखों अनुयायी उन्हें भगवततुल्य मानते हैं। बचपन में ही अपनी नेत्र ज्योति को खो चुके स्वामी रामभद्राचार्य ने अध्ययन के लिए कभी भी ब्रेल लिपि का प्रयोग नहीं किया। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का समालोचनात्मक संस्करण ‘तुलसी पीठ संस्करण’ के नाम से सम्पादित करने पर स्वामी रामभद्राचार्य को अनेक विवादों का सामना भी करना पड़ा था। उन पर श्रीरामचरित मानस को विकृत करने का आरोप भी लगाया गया था। परन्तु बाद में उनके द्वारा खेद प्रकट करने पर यह विवाद शान्त हुआ। भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट में जगदगुरू रामभद्राचार्य द्वारा विश्व के पहले विकलांग विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। यह विश्वविद्यालय आज उन्हीं के प्रयासों से केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने की प्रक्रिया में है। जगद्गुरू रामभद्राचार्य इस विश्वविद्यालय के आजीवन कुलाधिपति भी हैं।

22 भाषाओं के जानकार व संस्कृत, हिन्दी, अवधी, मैथिली सहित कई भाषाओं में आशुकवि और रचनाकार जगद्गुरू रामभद्राचार्य भारत के विभिन्न शहरों और विदेशों में भी ‘रामकथा’ कहते हैं। वे रामायण और भागवत के प्रसिद्ध कथाकार है। उनके कथा के कार्यक्रम अनेक टीवी चैनलों में प्रसारित होते रहते हैं। उन्होंने डेढ़ सौ से ज्यादा पुस्तकों और ग्रंथों की रचना की हैं। 

उन्होंने विकलांगता को कभी अभिशाप नहीं माना, बल्कि अपने उत्कृष्ट कार्यों से विकलांगता को हमेशा हराने में लगे रहे। यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि उन्होंने विकलांगता को हराकर अपना एक अलग स्थान बनाया है। नवंबर 2017 में ‘बुन्देलखण्ड कनेक्ट’ ने जब उनसे बातचीत की तो अपने उसी स्वाभाविक अन्दाज में उन्होंने हमारे सभी प्रश्नों के जवाब दिए। 

अध्ययन या रचना के लिए आपने कभी ब्रेल लिपि का का इस्तेमाल नहीं किया। एक बार सुनकर सब कुछ आपको कंठस्थ हो जाता है। क्या आप इसे आप ईश्वरीय शक्ति मानते हैं ?
"हाँ, मैं इसे ईश्वरीय कृपा मानता हूँ।"
चरण कमल बन्दऊ हरी राई
जाकी कृपा गिरी लांघै
अन्धे को सब कुछ दरसाई

क्या कभी ऐसा लगा कि नेत्र ज्योति ठीक होती तो और भी अधिक ज्ञान ले सकते थे? या बचपन में हुई दुर्घटना को अभिशाप नहीं बल्कि अपने लिए वरदान मानते हैं?
"नहीं, नेत्र होते तो शायद अच्छा न कर पाता, मैं तो इसे वरदान ही मानता हूँ। यह मेरे लिए परमेश्वर का प्रसाद है। मैंने कभी भी दृष्टिहीनता को अभिशाप नहीं माना। मैंने कभी भी विकलांगता में मिलने वाली सरकारी छूट का लाभ भी नहीं लिया और न ही आज तक विकलांगता पेंशन या छात्रवृत्ति ली।"

राष्ट्रपति चुनाव के पूर्व ही बिहार में एक प्रवचन के दौरान रामनाथ कोविन्द से भेंट पर आपने उनके राष्ट्रपति बनने की पहले ही भविष्यवाणी की थी, क्या ये सही है?
"हाँ, सह सही है, मैंने भविष्यवाणी की थी। और देखिये, आज वे राष्ट्रपति हैं।"

विश्वविद्यालय बनाने के लिए आपने बहुत संघर्ष किया। उस समय के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से भी आपके कुछ मतभेद हुए थे। क्या दिग्विजय सिंह आपके आरएसएस से रिश्तों को लेकर आपका सहयोग नहीं कर रहे थे या कोई और बात थी?
"संघर्ष तो काफी करना पड़ा और दिग्गी राजा ने भी मेरे साथ विश्वासघात किया था। उन्होंने मुझे 5 वर्ष तक अन्धकार में रखा, नहीं तो 2001 में बना यह विकलांग विश्वविद्यालय 1998 में ही बनकर तैयार हो गया होता।"

आपने कई पुस्तकें व ग्रन्थ लिखे हैं, उनमें से प्रमुख कौन-कौन से हैं, और वर्तमान में क्या कुछ विशेष लिख रहे हैं?
"इस समय मैं पाणिनी अष्टाध्यायी पर लिख रहा हूँ। यह लगभग आठ हजार पेज का ग्रन्थ है। अब तो यह लगभग पूरा हो गया है। आपको बता दूं कि मैं भारत का पहला व्यक्ति हूँ जिसने पाणिनी अष्टाध्यायी पर पूरा काम किया है। इसके पहले पतंजलि में तीन हजार पृष्ठों का काम हुआ है। इसके अलावा मैंने प्रस्थानन्तर पर तीनों प्रस्थानन लिखे हैं, ब्रहमसूत्र, भगवत गीता और उपनिषद पर संस्कृत भाष्य सम्मलित हैं।"

सन्यासी बनने पर परिवार की क्या प्रतिक्रिया रही?
"बहुत अच्छी प्रतिक्रिया रही। मेरे घर के लोग स्वार्थी नहीं हैं। उन्हें तो बल्कि अच्छा लगा कि मैं धर्म और समाज के लिए कुछ अच्छा करने जा रहा हूँ।"

बुन्देलखण्ड में रहकर आपने बहुत काम किया है। क्या लगता है, इससे दशा और दिशा बदलेगी?
"यह तो बुन्देलखण्ड जाने, मैंने विश्वविद्यालय की स्थापना की तो यहीं के हजारों छात्रों ने शिक्षा ग्रहण की और रोजगार भी पाया। इसके अतिरिक्त निरन्तर मैं बुन्देलखण्ड के विकास के लिए चिन्तित हूँ और मेरे द्वारा जो सम्भव है, बुन्देलखण्ड के लिए करूंगा।"

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आपको अपने नवरत्नों में शामिल किया, आपने क्या किया?
"मैंने पाँच गाँव गोद लिए थे। इनमें अपेक्षाकृत विकास हुआ है, आधे से ज्यादा में शौचालयों का निर्माण हो चुका है। आगे भी लगातार मैं प्रयासरत हूँ।"

बुन्देलखण्ड कनेक्ट के पाठकों के लिए क्या सन्देश है?
"काम करते रहना चाहिये। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। काम न होने से तमाम चीजें दिमाग में घूमती हैं इसलिए मनुष्य को काम में लगे रहना चाहिये।"