बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान आल्हा

बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान आल्हा

बुन्देलखण्ड की वीर वसुन्धरा में जन्म लेने वाले आल्हा का नाम किसने नहीं सुना। क्षत्रियों के नैतिक नियमों में केवल वीरता ही नहीं थी बल्कि अपने स्वामी और अपनी राजा के लिए जान देना भी उसका एक अंग था। आल्हा और ऊदल की जिंदगी इसकी सबसे अच्छी मिसाल है। सच्चा क्षत्रिय क्या होता है और उसे क्या होना चाहिये।  बड़ी खूबसूरती से इन दोनों भाईयों ने दिखा दिया है।

आल्हा और ऊदल के शौर्य और वीरता की कहानी एक चंदेली कवि ने उन्हीं  के जमाने में गाया और उसको इस सूबे में जो लोकप्रियता प्राप्त है वह शायद रामायण को भी न हो। यह कविता आल्हा के नाम से ही प्रसिद्ध है। आठ-नौ शताब्दी गुजर जाने के बाद भी उनकी दिलचस्पी और सर्वप्रियता में अंतर नहीं आया। आल्हा गाने को बुन्देलखण्ड में बड़ा रिवाज है।  ग्रामीण क्षेत्रों में लोग हजारों की संख्या में आल्हा सुनने को जमा होते है।

राजा परमालदेव चंदेल खानदान का आखिरी राजा था। तेरहवी शताब्दी के आरम्भ में यह परिवार समाप्त हो गया। महोबा जो एक मामूली जिला है उस जमाने मंे चंदेलों की राजधानी थी। महोबा की सल्तमत दिल्ली और कन्नौज के निशाने पर थी। आल्हा और ऊदल इसी राजा परमाल देव के दरबार में सम्मानित सदस्य थें यह दोनों भाई अभी बच्चे ही थे कि उनके पिता जसराज की एक लड़ाई में मौत हो गईं। राजा को अनाथों पर तरस आया और उन्हें राजमहल ले आये और मोहब्बत के साथ अपनी रानी मलिनहा के सुपुर्द कर दिया। रानी ने उन दोनों की परवरिश पुत्रों की तरह किया। दोनों भाई बड़े होकर बहादुरी में सारी दुनियां में मशहूर हुए। इन्हीं दोनों वीरों की वजह से महोबा का नाम रोशन हुआ। उनकी वीरता के कारण ही आसपास के सैकड़ों राजा चंदेलों के अधीन हो गए। आल्हा का मामा माहिल एक काले दिल का मन में द्वेष पालने वाला व्यक्ति था। इन दोनों भाईयों की वीरता और लोकप्रियता उसके हृदय में कांटे की तरह चुभने लगी।

उसने राजा परमाल के सामने आल्हा के खिलाफ विषवमन शुरू किया। जिसे राजा अपने जिगर का टुकड़ा मानता था उसी से नफरत करने लगा और नौबत यहां तक आ गई कि आल्हा को महोबा छोड़कर जाना पड़ा। आल्हा के जाने पर भाई ऊदल और उनकी मां भी महोबा छोड़कर चले गये। दोनों भाईयों की वीरता को देखकर हर राजा उन्हें शरण देनों को तैयार थे लेकिन दोनों भाई राजा जयचंद्र के यहां कन्नौज पहुंच गये। जयचन्द्र ने आल्हा को अपना सेनापति बना दिया। आल्हा-ऊदल के चले जाने पर महोबा आसपास के राजाओं ने बगावत का झंडा बुलन्द कर दिया। इसी बीच दिल्ली के राजा पृथ्वीराजा चैहान कुछ सेना कहीं से युद्ध करके वापस आ रही थी। महोबा में पड़ाव किया तभी चंदेल सैनिकों और चैहान सैनिकों के बीच अनबन हो गई। दोनों सेनेाओं के बीच युद्ध हुआ।

हालांकि इस युद्ध में पृथ्वीराज चैहान की सेना लौट गई। बाद में पृथ्वीराजा की सेना ने फिर महोबा में आक्रमण किया। इस भयानक युद्ध में चंदेलों की सेना के पैर उखड़ने लगे। तब राजा परमाल को आल्हा ऊदल की याद आई। जगनाभाट को कन्नौज रवाना किया गया। महोबा की खबर पाकर आल्हा ऊदल महोबा वापस आ गये और पृथ्वीराजा की सेना से खूब लड़े दोनों फौजों के बीच युद्ध में अनेक वीर हताहत हुए। अठारह दिन तक मारकाट होती रही। इस घमासान लड़ाई में ऊदल भी शहीद हो गया। तीन लाख आदमियों में सिर्फ तीन लोग जिंदा बचे एक पृथ्वीराज चैहान दूसरा चंदा भाट और तीसरा आल्हा।

पृथ्वीराज के शब्द भेदी वाण से ऊदल की मौत हुई। ऊदल की मौत से आल्हा समझ गया कि इस धरती से जाने का समय आ गया। उसने अपने गुरू गोरखनाथ का दिया हुआ विजुरिया नामक दिव्याश्त्र हाथ में लिया और पृथ्वीराज चैहान को मारने निकल पड़े। आल्हा को अपनी ओर आता देखकर पृथ्वीराज के सेनापति चंदरवरदाई ने कहा कि  आल्हा के सामान कोई दूसरा वीर नहीं है यदि जिंदा रहना चाहते हो तो आल्हा के सामने हथियार मत उठाना। पृथ्वीराज ने आल्हा के सामने हाथ जोड़ लिये इसी समय वहां गुरू गोरखनाथ आ गए और आल्हा को सा शरीर अपने साथ ले गए। बैरागढ़ अकोढ़ी गांव जालौन और मैहर में मां शारदा के मंदिर में आज भी सुबह पुजारियों को दरवाजें खोलने पर फूल चढ़े हुए मिलते है। कहते है आल्हा इन मंदिरों में फूल चढ़ाने आता है।