छात्रों के लिए रास्ता तैयार करता है मेड ईजी

इंजीनियरिंग करने के बाद स्टूडेंट सोचते हैं कि डिग्री हासिल करने के बाद अब क्या करें? आप्शन बहुत होते हैं पर उस तक पहुंचना कैसे है, इसके लिए रास्ता बनाना मेड ईजी का टास्क है।

छात्रों के लिए रास्ता तैयार करता है मेड ईजी

मेड ईजी भारत का एक बड़ा एजुकेशनल ग्रुप है जो आईईएस, आईएएस और पीएसयू परीक्षाओं में सफलता का पर्याय है। यह लगभग दो दशक पुराना है जिसने लगातार अपनी प्रतिष्ठा को बरकरार रखा है। मेड ईजी ने नए बेंचमार्क स्थापित किये और हजारों इंजीनियरिंग स्नातकों को सफल भागीदार के रूप में स्थापित किया।

बुन्देलखण्ड के महोबा से ताल्लुक रखने वाले बालेन्द्र सिंह ही वो शख्सियत हैं, जिन्हें मेड ईजी की स्थापना का श्रेय जाता है। शिक्षा जगत में खासकर प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार अव्वल रहने वाले और टाॅप रैंक धारकों में से सबसे अधिक संख्या में नाम दर्ज कराने वाली इस संस्था के संस्थापक बालेन्द्र सिंह महोबा में जन्म लेकर पले-बढ़े और आज इस मुकाम को हासिल किया। उन्होने देश में न सिर्फ अपने माता-पिता, गांव, जनपद को गौरवान्वित किया बल्कि समूचे बुन्देलखण्ड का मस्तक ऊंचा किया है। बुन्देलखण्ड में एक कहावत प्रचलित है, ‘सौ दण्डी में एक बुन्देलखण्डी’ बालेन्द्र सिंह ने इसे चरितार्थ किया है। 

ई.सी.ई. परीक्षा को तीन बार उत्तीर्ण करने के बाद बालेन्द्र गेट में भी चयनित हुए थे। लेकिन उन्होंने इस्तीफा देकर 2001 में अपने माता-पिता का सपना पूरा करने की उम्मीद के साथ तथा समाज में अपना योगदान देने के लिए मेड ईजी एजुकेशनल ग्रुप की स्थापना की। इस संस्थान के बाद उन्होंने सिविल सर्विस के लिए कोचिंग संस्थान शुरू किया जो नेक्स्ट आईएएस की तैयारी में मदद करता है। मेड ईजी के नाम से तीन स्कूल भी स्थापित हुए, जिसमें एक दिल्ली और दो गुड़गांव में हैं। तीनों ही इण्टर कालेज सी.बी.एस.ई. बोर्ड से सम्बन्धित हैं। गुड़गांव का जो स्कूल है, उन्होनें इसका करिकुलम ऐसा डिजाइन किया कि आगे चलकर बच्चे को किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी न करनी पड़े। बल्कि वह दूसरों को नौकरी देने में सक्षम होगा। मेड ईजी का अपना सोलर प्लान्ट भी है जो ग्रामीण एनर्जी का उत्पादन करके राजस्थान और मध्यप्रदेश सरकार को सेल करता है।

बालेन्द्र सिंह ने अपने दो दशक के कठिन परिश्रम से इंजीनियरिंग स्नातकों के भविष्य एवं भारत के कुशल अधिकारियों में बदलने के अपने अनुभवों को बुन्देलखण्ड न्यूज से साझा किया और इन्हें सफलता मिलती गई। साथ ही मेड ईजी संस्था भी सफलता की सीढ़ी चढ़ती चली गई। उनकी सफल यात्रा में उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जैसे शिक्षा उत्कृष्टता, उद्योग पुरस्कार, आई.एफ.एस. के लिए सर्वश्रेष्ठ उद्यमी को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा पुरस्कार इत्यादि शामिल हैं।

बालेन्द्र सिंह बताते हैं कि वो छात्रों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करने में किसी तरह की कसर नहीं छोड़ते हैं। छात्रों की तैयारी अच्छे ढंग से हो, इसके लिए मेड ईजी का अपना प्रकाशन सेक्टर भी है, जो 150 से ज्यादा तरह की बुक्स प्रकाशित करता है। इसे लिखने वाले जाने-माने टीचर्स एवं प्रशासनिक सेवाओं से रिटायर्ड हैं या फिर आईआईटी, एनआईटी जैसी संस्थाओं के प्रोफेसर हैं। इसमें टेस्टबुक, कम्पटीशन एग्जाम, इंजीनियरिंग एग्जाम और साइंस की बुक्स भी शामिल हैं। 

बालेन्द्र कहते हैं,

"मेड ईजी का अपना आनलाइन पोर्टल भी है। जो बच्चे दिल्ली में आकर संस्था/काॅलेज में पढ़ाई नहीं कर सकते, वह आनलाइन हमारी सेवाएं लेते हैं। हमारा एक चैरिटेबिल ट्रस्ट भी है जो ‘मेड ईजी फार यू’ के नाम से है। जो बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनकी यह संस्था मदद करती है। इसी तरह आईआईटी रूढ़की कैम्पस में डीफ एण्ड डम्ब बच्चों के लिए ‘अनश्रुति’ के नाम से स्कूल स्थापित किया है, जिसमें बच्चों को आर्थिक-भौतिक मदद दी जाती है। मेड ईजी फार यू ने ‘कपड़ा किताब बैंक’ की भी शुरुआत की है। इसमें जो स्टूडेंट सिलेक्ट हो जाते हैं वह अपनी किताबें व ड्रेस डोनेट कर सकते हैं। यह किताबें और कपड़े कमजोर वर्ग के बच्चों को निःशुल्क मुहैय्या कराये जाते हैं। इसी तरह हम अब आर्गेनिक फार्मिंग भी शुरू कर रहे हैं, जिसमें संस्कार गार्डन नई शुरुआत है, जिसे हमने स्कूल से जोड़ा है। इससे बच्चों को जोड़ने के लिए हम बच्चों को सिखाते है कि शुद्ध वातावरण कितना महत्वपूर्ण है। इसके लिए बच्चों से उनके जन्म दिन पर एक पेड़ लगवाया जाता है। इस पेड़ की वह बच्चा स्वयं देखभाल करता है, जब तक वह स्कूल में रहता है। जब वह बच्चा बड़ा होगा तब तक पेड़ भी बड़ा हो जायेगा। तब बच्चे को उस पेड़ से भावनात्मक लगाव हो जायेगा। प्लांटेशन के लिए अलग से जमीन ली गई है। क्योंकि आने वाले 20 वर्षो में पेयजल एक बड़ी समस्या बनने वाली है। इसीलिए बच्चों के मन में वृक्षारोपण के प्रति धारणा को मजबूत बनाना होगा।"

एक कर्मयोग की शुरूआत
अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित एमई, ईएएसवाई की टेस्ट उद्यमी प्रकोष्ठ और प्रतिस्पर्धी परीक्षा शीर्ष में पहुंचाने वाली संस्था के कर्मयोगी बालेन्द्र सिंह अपने बारे में बताते हैं कि आईआईटी में इंजीनियरिंग करने के बाद कैम्पस से दो जाॅब आफर मिले। जाॅब किया और इसी दौरान आईईएस की तैयारी की। आईईएस में तीन बार सेलेक्शन हुआ। आईईएस की जाॅब की लेकिन कुछ ही दिनों बाद मुझे पछतावा हुआ कि इस जाॅब में रहकर मैं समाज के लिए कुछ नहीं कर पाऊंगा। मैं समाज और देश के लिए कुछ अलग करना चाहता था। अन्ततः मैंने इस्तीफा देकर अपना आगे स्टार्टअप शुरू किया। 

डिग्री हासिल करने के बाद मेड ईजी कैसे रास्ता बनाता है?
उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग करने के बाद स्टूडेंट सोचते हैं कि डिग्री हासिल करने के बाद अब क्या करें? आप्शन बहुत होते हैं पर उस तक पहुंचना कैसे है, इसके लिए रास्ता बनाना मेड ईजी का पहला टास्क था। इसलिए पहले उन बच्चों को ट्रेंड किया, जिनमें नाॅलेज कम था ताकि उन्हें कम्पटीशन में किसी तरह की कमी न हो। वह बताते हैं कि आईईएस में हर साल 500 रिक्तियां आती हैं। उसमें 90-92 फीसदी सेलेक्शन मेड ईजी से लेते हैं। पिछले वर्ष में संस्था से 297 छात्र सेलेक्ट हुए हैं। इसके अलावा पब्लिक सेक्टर और रिसर्च सेन्टर में भी मेड ईजी के सेलेक्शन होते हैं। इसके अलावा राज्यों में भी जो रिक्तियां होती हैं, उनमें मेड ईजी से सेलेक्शन होते हैं।

मेड ईजी की सफलता के राज
सफलता के दो सूत्र हैं, ईमानदारी और कठिन परिश्रम। किसी भी क्षेत्र में जाना है तो उस क्षेत्र की आपको पूरी जानकारी हो। उससे आप अलग क्या कर सकते हो। आपकी टीम बहुत अच्छी हो। मेड ईजी में हमने वर्क प्रोफेशनली और एथिक्स के साथ किया। यहां बेस्ट टीचर हैं, आईआईटी के प्रोफेसर हैं और सिविल सर्विस के रिटायर्ड आफिसर्स हैं। उनका अपना अनुभव, एक्सपोजर और टैलेन्ट मेड ईजी की सफलता का एक बड़ा कारण है।

बालेन्द्र का स्ट्रगल
ऐसा नहीं है कि बालेन्द्र सिंह ने कोई स्ट्रगल नहीं किया और उन्हें यह सफलता थोड़े ही प्रयास से मिली बल्कि इसके लिए उनका एक लम्बा संघर्ष का अनुभव है। प्रारम्भिक शिक्षा हिन्दी मीडियम होने के बाद आईआईटी, जेईई में चयन हुआ और आईआईटी, बीएचयू से इंजीनियरिंग करने का मौका मिला। पहले आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इस वजह से किसी बड़े स्तर पर अपनी संस्था शुरू नहीं कर सकते थे, फिर भी उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया। सारा काम स्वयं करने की प्रवृत्ति थी। इसीलिए दीवारों में पोस्टर चिपकाने के लिए भी उन्होंने कोई परहेज नहीं किया। वहां से प्लानिंग हुई कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। अगर कोई काम जरूरी है तो उसे स्वयं कर लेना चाहिए। शुरूआत में अच्छे लोगों को साथ जोड़ना और उनको विश्वास दिलाना कि यह ग्रुप अच्छा कैरियर दे सकता है। इसके लिए बालेन्द्र सिंह ने काफी मेहनत की। वो बताते हैं कि हमने जिन लोगों को जोड़ा उन्हें इस बात का अहसास भी दिलाया कि यह आपकी संस्था है, सिर्फ मेरा नहीं उनका भी इसमें हक है। फाइनेंस, पेमेन्ट तो एक दूसरी बात है। उन्हें अपनेपन का अहसास दिलाना बहुत जरूरी होता है और इसमें हम सफल भी हुए। जो लोग यहां काम करते हैं, अगर उनको कोई परेशानी होती है तो उनको अपना परिवार मानकर साॅल्व करते हैं। यही वजह है कि वह लोग अपना शत-प्रतिशत काम समय से करते हैं। सफलता पाने के लिए आप में उपरोक्त सभी बातें होनी चाहिए। मेड ईजी में हमेशा एक रिसर्च टीम है, जिसमें 8-10 लोग हैं। जो नई बुक्स, नया पढ़ाने का ढंग, स्टूडेंट के लिए नया मैथड आदि क्या ला सकते हैं, इस बारे में रिसर्च होता रहता है।

यादगार अनुभव
बुन्देलखण्ड न्यूज से अपने अनुभव को साझा करते हुए बालेन्द्र अपने कठिन संघर्ष को याद करते हुए बताते हैं कि शुरूआत में दिसम्बर का महीना था। आईआईटी दिल्ली के कैम्पस के पास मैं रात को 12 बजे अपने कोचिंग का पोस्टर चिपका रहा था, तभी एक व्यक्ति वहां आया और मुझसे पूछने लगा कि 2000 पोस्टर लगवाना है कितने पैसे लोगे? उस समय मुझे लगा कि इस समय भले ही मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। लेकिन आने वाले टाइम में इसका जवाब जरूर मिल जायेगा। इसी तरह कई अन्य लोगों ने भी मुझे स्ट्रीटबाॅय समझ कर पोस्टर चिपकाने की बात कही, लेकिन मैने उस समय किसी का बुरा नहीं माना। बल्कि यह मेरे लिए एक आत्म संतुष्टि थी कि जो आज मैं कर रहा हूं वह दूसरों से अलग है। कभी भी कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। वह एक और घटना को याद करते हुए बताते हैं कि एक दिन मैं कालेज से घर आया, पिता जी किसान हैं। खेत में कटाई चल रही थी, मैं भी खेत गया और कटाई में उनके साथ लग गया, तब मेरे हाथ में छाले पड़ गये। जब मैं वापस स्कूल गया तो दोस्त हाथ देखकर कहने लगे कि तुम्हें किसने पीटा है? वह कहते हैं कि अगर आप जमीन से जुड़े हैं तभी आप दूसरों का दर्द समझ सकते हैं। मैने खुद एग्जाम लिखा है तो समझ सकता हूँ स्टूडेंट की रिक्वायरमेंट व उम्मीद क्या है?

भविष्य की उड़ान
बालेन्द्र सिंह चाहते हैं कि उनकी जन्म स्थली महोबा में भी दो स्कूल हों, एक छात्रों और दूसरा छात्राओं के लिए। वह स्कूल जो इनके लिए नई दिशा लेकर आये। फिलहाॅल अभी यहां के स्कूल पुराने पैटर्न पर चल रहे हैं, जो किताबों में लिखा है वही बच्चों को रटा रहे हैं। जबकि दिल्ली में टेक्नोलाॅजिकल एडवांसमेंट बहुत ज्यादा हो रही है। दिल्ली में टेक्नोलाॅजी, थ्रीडी एनीमेशन और ग्राफिक्स पर पढ़ाई हो रही है। जिसे बच्चे अच्छी तरह से समझ पा रहे हैं। छोटी जगहों पर भी ये नयी दिशा लेकर जाते हैं ताकि उन बच्चों को भी इनोवेटिव तरह से पढ़ायें। बच्चों के अन्दर शुरू से ही काॅम्पटेटिव इन्वायरमेण्ट फेस करने का काॅन्फिडेन्स हो। सरकारी स्कूल के बच्चे भी नई टेक्नोलाॅजी आनलाइन सर्विस, मोबाइल एप्लीकेशन आदि यूज करके पढ़ाई कर पायें, उस पर हमारी रिसर्च टीम काम कर रही है। ये मेरे ड्रीम प्रोजेक्ट हैं।