दर्शन परिषद के 40वें राष्ट्रीय अधिवेशन एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

दर्शन परिषद के 40वें राष्ट्रीय अधिवेशन का उद्घाटन जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय के अष्टावक्र सभागार में संपन्न हुआ...

Mar 20, 2026 - 11:40
Mar 20, 2026 - 11:41
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दर्शन परिषद के 40वें राष्ट्रीय अधिवेशन एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

चित्रकूट। दर्शन परिषद के 40वें राष्ट्रीय अधिवेशन का उद्घाटन जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय के अष्टावक्र सभागार में संपन्न हुआ। इस अवसर पर दर्शनशास्त्र विभाग तथा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान तथा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी शुभारंभ हुआ।

संगोष्ठी का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो शिशिर कुमार पांडेय तथा मुख्य अतिथि प्रो श्याम किशोर सेठ के द्वारा किया गया। इस अवसर पर  कुलपति प्रो शिशिर कुमार पांडेय ने कहा कि समस्त वैश्विक समस्याओं के मूल में अशांति का कारण धर्म के मूल रूप को न समझना है। जिसे विभिन्न भारतीय दार्शनिक संप्रदायों के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है और उसके द्वारा आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने भारतीय धर्म ग्रंथों की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय ग्रन्थों में वैयक्तिक शांति के साथ अंतरराष्ट्रीय शांति की समस्या का भी उत्कृष्ट समाधान है। आवश्यकता इस बात की है कि इस साहित्य को जन-जन तक पहुंचाया जाए। मुख्य अतिथि प्रो एसके सेठ ने कहा कि व्यक्ति अपने दृष्टिकोण को न समझने के कारण भौतिक सुख को वास्तविक सुख मान लेता है और उसे केवल बाहरी सुख की अनुभूति होती है। आंतरिक सुख की अनुभूति के लिए व्यक्ति को स्वयं के अनुभव तथा विचारों को समझना आवश्यक है।

कार्यक्रम में बीज वक्तव्य को प्रस्तुत करते हुए पूर्व कुलपति प्रो रजनीश शुक्ल ने कहा कि मनुष्य जीवन का अंतिम उद्देश्य आत्मा की प्रगति है तथा कामना ही दुख का कारण है। यूरोपीय संघर्ष, सभ्यता और उससे जुड़े हुए पहलुओं से निकले हैं। भारतीय दर्शन ही धर्म की सही व्याख्या करता है जिसके अनुसार धर्म ही शांति का परिचायक है जिसे यथावत भी कहा गया है। उन्होंने तितिक्षा को परिभाषित करते हुए पोषण की अवधारणा के द्वारा धर्म के स्वरूप को स्पष्ट किया तथा बताया कि धर्म ही उत्कृष्ट आचरण को प्रस्तुत करता है तथा इसके द्वारा मानव का कल्याण सुनिश्चित होता है। इस अवसर पर प्रो लोकमान्य मिश्र ने कहा कि वैश्विक शांति को स्थापित करने में दर्शन की महती भूमिका है वर्तमान वैश्विक समस्याओं को उच्चतम आत्मिक मूल्य के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। इस अवसर पर भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद के द्वारा प्रकाशित शोध पत्रिका का संदर्शन का विमोचन भी किया गया तथा दर्शन विभाग के अध्यक्ष डॉ हरिकांत मिश्र के द्वारा लिखित पुस्तक का भी विमोचन किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की कुलसचिव मधुरेंद्र कुमार पर्वत, प्रो सभाजीत मिश्र, प्रो सुभाष चंद्र, प्रो नितीश दुबे, प्रो सूरज गुप्ता, प्रो स्वाती सक्सैना, प्रो आशा सेठ, प्रो एचएस उपाध्याय, प्रो एच एन सिंह, प्रो संजय शुक्ल, प्रो सुचिता शुक्ला, डॉ अमित अग्निहोत्री, डॉ महेंद्र कुमार उपाध्याय, डॉ विनोद कुमार मिश्र, डॉ निहार रंजन मिश्र, डॉ नीतू तिवारी, डॉ रजनीश कुमार सिंह, डॉ दलीप कुमार, डॉ रविकांत मिश्र, डॉ गोपाल कुमार मिश्र सहित विश्वविद्यालय परिवार के समस्त सदस्य उपस्थित रहे। उद्घाटन सत्र के बाद व्याख्यान माला का सत्र शुरू हुआ। इसमें पांच विद्वानों ने अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में पांच देशों के दस विद्वानों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। संगोष्ठी में अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान लखनऊ के निदेशक डॉ राकेश सिंह और अरूणेश मिश्र मौजूद रहे। सायंकाल सांस्कृतिक संध्या कार्यक्रम का उद्घाटन जिले के पुलिस कप्तान डॉ अरुण कुमार सिंह ने किया। संचालन कार्यक्रम संयोजक डॉ हरिकांत मिश्र ने किया।

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