वसंत चाहिए तो प्रकृति को बचाइए

इस पर्व के संदेश बिल्कुल सीधे व सरल हैं फिर भी हम लोग प्रकृति के इन संदेशों व संकेतों को समझ नहीं पा रहे हैं..

वसंत चाहिए तो प्रकृति को बचाइए

@राकेश कुमार अग्रवाल 

आज वसंत पंचमी है। साहित्यकारों, प्रकृति पोषकों ने इस ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा है। यह ऋतु दरअसल उल्लास की द्योतक है। जब मौसम खुशगवार होता है।  प्रकृति वासंती चूनर ओढे खिलखिलाती नजर आती है।

चटख धूप में कंपकंपाती सर्दी से निजात मिलती है। चारों ओर हरा भरा नजर आता है। फूलों की न्यारी छटा देखते ही बनती है। यह पर्व एक ओर जहां प्रकृति पर्व है वहीं दूसरी ओर मां सरस्वती के जन्मोत्सव का पर्व भी है। जिन्हें शिक्षा और संगीत की देवी माना जाता है।  

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इस पर्व के संदेश बिल्कुल सीधे व सरल हैं फिर भी हम लोग प्रकृति के इन संदेशों व संकेतों को समझ नहीं पा रहे हैं। यदि हम यह मानें कि इस कायनात को ईश्वर, अल्लाह रूपी किसी सत्ता ने गढा है। तो इंसानों को गढने के पहले उसने सबसे पहले प्रकृति को बनाया है जिसमें पानी, हवा, मिट्टी, पहाड, पेड - पौधे रचे।  

प्राकृतिक संरचनाएं वक्त के साथ नए नए रूप और आकार लेती गईं। पानी की महत्ता को समझते हुए पृथ्वी के 72 फीसदी भूभाग पर पानी उपलब्ध कराया गया। जो जनजीवन की अनिवार्य जरूरत के साथ जल मार्ग का माध्यम बना। इंसानी जिंदगी में पानी जन्म से लेकर मौत तक ही नहीं वरन हिंदुओं में तो पितृ विसर्जन व श्राद्ध तक यानी इंसान की मृत्यु के बाद भी पानी का नाता खत्म नहीं होता है।

गंगा को मां का दर्जा देना व नदियों के प्रति श्रद्धा का जो भारतीय दर्शन है उसके पीछे यही भावना थी कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त चीजों की न केवल हम महत्ता को स्वीकार करें बल्कि उनके प्रति दैनंदिन अपना धन्यवाद भी ज्ञापित करें।

 

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आज भी घर परिवारों में बडे बुजुर्ग सुबह बिस्तर से उठते ही जमीन को हाथों से छूकर उसी हाथ को अपने सिर माथे पर लगाते हैं। जब भी दो पहलवान दंगल के लिए अखाडे में उतरते हैं तो अपने बदन पर अखाडे की माटी को शरीर पर लगाना नहीं भूलते। यह दरअसल इस धरा से इस माटी से एकाकार होने जैसा है।

यह उनकी धरती मां के प्रति कृतज्ञता है। हिंदुओं के ज्यादातर प्रमुख मंदिर और तीर्थ स्थल पहाडों पर हैं। इसके पीछे की मंशा भी बिल्कुल  स्पष्ट थी कि  जिन पहाडों, पर्वतों पर देवी देवता विराजमान होंगे  वहां पर खनन नहीं होगा। श्रद्धालु उन पहाडों का स्वयं संरक्षण करेंगे दूसरा देवी देवताओं के दर्शन के बहाने वे प्रकृति के करीब आएंगे।

पहाडों पर आने के बाद उन्हें अपने बौनेपन का एहसास होगा कि विशालकाय प्रकृति के सामने मनुष्य एक अदना सा जीव है। पेड पौधों की महत्ता को समझने के लिए हर घर के आंगन में तुलसी को जगह दी गई।  

जिसकी न केवल प्रतिदिन पूजा होती थी बल्कि भोग, प्रसाद, व चरणामृत में तुलसी की पत्ती का उपयोग अनिवार्य रूप से प्रयोग होता आया है। आँवला नवमी, बरगदही अमावस्या, हरियाली तीज व कार्तिक पूर्णिमा समेत ऐसे कितने ही पर्व हैं जिनमें पेड पौधों की पूजा की जाती है, नदी तालाबों में स्नान किया जाता है। 

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पेडों में मन्नत का धागा बांधा जाता है। पेड -  पौधों - वनस्पतियों से आरोग्य का पूरा शास्त्र और चिकित्सा विधा भारत ने पूरी दुनिया को दी है। पेड पौधों वनस्पतियों, पहाडों, नदियों  को जब तक इंसानों ने पूजा मतलब उसकी कद्र की तब तक आबोहवा भी स्वच्छ रही और जलवायु भी बेहतर बनी रही। 
 
जब से प्रकृति प्रदत्त चीजों को हमने धन्नासेठ बनने, करोडपति बनने का माध्यम बनाया तब से प्रकृति का सिस्टम ही गडबडा गया।  हमने पहाडों को नहीं  बख्शा।  पहाडी व पठारी बुंदेलखंड की सभी पहाडियां क्रशर और खनन उद्योग के चलते जमींदोज हो गई हैं। उ

त्तराखंड के पहाड बुरी तरह कराह रहे हैं। बालू के नाम पर नदियों की कोख छलनी कर दी गई है। जंगल के जंगल साफ कर दिए गए हैं।  उसकी जगह कंकरीट के जंगलों ने ले ली है।  जानवरों एवं पक्षियों पर संकट है।  

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जानवरों एवं पक्षियों की तमाम प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं एवं बहुतेरी प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। जब पेड पौधे और जंगल ही न बचेंगे तो पशु पक्षियों का विलुप्त होना स्वभाविक है। आप खुद ही गौर करिए कि कब से आपने अपने इर्द गिर्द तितली उडते नहीं देखी।

कब से आपने कौवे की कांव कांव नहीं सुनी, कब से आपने गिद्धों को मंडराते नहीं देखा।  कब से आपने मेंढक की टर्र टर्र नहीं सुनी, कब से आपके आँगन में केंचुए नहीं आए। माफ करिए यदि आप प्रकृति के मूल स्वरूप को ही अपनी कामनाओं और लालसाओं की भेंट चढा देंगे तो आपको झींगुर, चिलचट्टा और तितली तो नजर नहीं आएंगे अलबत्ता टिड्डियों से जरूर आपका सामना हो जाएगा।

कवियों की कविताओं एवं कहानीकारों की कहानियों में भले वसंत बगरो हो लेकिन हकीकत में अब वसंत देखने के लिए आपको राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन या कश्मीर के ट्यूलिप गार्डन में ही जाना पडेगा।  

प्रकृति से जुडिए, उसे सहेजिए, उसको संभालिए, उसको बचाइए, उसको पल्लवित और पुष्पवित करिए। उसका दोहन कर के उसको इतना न उजाड दीजिए कि आने वाली पीढी के लिए पहाडों की जगह खाइयां बचें, जंगल की जगह ठूंठ बचें, नदियों और पानी की जगह उसके अवशेष बचें। ऐसे में सब कुछ तो होगा लेकिन वसंत न होगा। 

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