बांदा-हमीरपुर एमएलसी सीट पर इनका दावा है सबसे मजूबत

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद अब विधान परिषद चुनाव की घंटी बज चुकी है, कुल 36 एमएलसी सीटों पर आगामी 15 मार्च से चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी...

Mar 13, 2022 - 09:38
Mar 13, 2022 - 09:49
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बांदा-हमीरपुर एमएलसी सीट पर इनका दावा है सबसे मजूबत
युवराज सिंह, पूर्व विधायक, हमीरपुर

- सचिन चतुर्वेदी

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद अब विधान परिषद चुनाव की घंटी बज चुकी है। कुल 36 एमएलसी सीटों पर आगामी 15 मार्च से चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। अभी तक विधान परिषद में भाजपा सदस्यों की संख्या 35 और सपा सदस्यों की संख्या 17 थी। अब दोनों ही पार्टियों का पूरा जोर इसी बात पर रहेगा कि ज्यादा से ज्यादा सीटों पर उनका कब्जा हो जाये। क्योंकि सपा भी 2017 के मुकाबले इस बार मजबूत स्थिति में है।

उधर विधानसभा चुनाव में हारे हुए भाजपा के प्रमुख नेताओं को भी एमएलसी बनाकर सरकार में शामिल होने का मौका दिया जा सकता है। जिनमें पूर्व उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, सुरेश राणा, संगीत सोम, सतीश द्विवेदी, उपेन्द्र तिवारी आदि का नाम प्रमुख है।

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उधर बांदा हमीरपुर एमएलसी सीट की बात करें तो यह सीट भाजपा के हिस्से में जायेगी। और इसी कारण भाजपा से टिकट चाहने वालों की एक लम्बी फेहरिस्त है। लेकिन सबसे ज्यादा जिन नामों पर चर्चा हो रही है, उनमें से हमीरपुर सदर के पूर्व विधायक युवराज सिंह और यहां से पूर्व एमएलसी रमेश मिश्रा का नाम प्रमुख है। हमारे सूत्रों के अनुसार इनके अलावा भी इस टिकट के दावेदार कई चेहरे हैं, जैसे- भाजपा के बांदा जिलाध्यक्ष संजय सिंह, भाजयुमो के नेता अजीत गुप्ता और बांदा जिला पंचायत सदस्य राजभवन उपाध्याय भी कहीं न कहीं भाजपा के उन बड़े नेताओं के सम्पर्क में हैं जो इनका टिकट फाइनल कर सकते हैं।

हालांकि एक नाम तिंदवारी से कांग्रेस के टिकट पर विधायक रह चुके दलजीत सिंह का भी चल रहा है पर दलजीत सिंह पर पिछले दिनों हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप लगाकर शिकायत की गयी है। इस कारण भी दलजीत सिंह का दावा कुछ कमजोर पड़ रहा है।

सूत्र बताते हैं कि दलजीत को पहले तिंदवारी सीट का टिकट देने के नाम पर उन्हें कांग्रेस से इस्तीफा दिलाकर भाजपा में लाया गया था, पर जिसने इस पूरी कवायद को अंजाम दिया, उसकी टिकट के मामले में चल नहीं पाई। और टिकट मिल गया भाजपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष रामकेश निषाद को, जो वर्तमान में तिंदवारी से विधायक चुने जा चुके हैं। दलजीत पर आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का मामला भी सुर्खियों में रहा है, और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों यह बयान भी दिया था, कि उनकी पार्टी में किसी भी प्रकार के दागियों को जगह नहीं दी जायेगी। लेकिन दलजीत जोड़-तोड़ कर किसी प्रकार दल में तो जगह पा गये, पर दिल में जगह मिलने की गुंजाइश कम ही लग रही है।

उधर इस सीट के प्रबल दावेदार रमेश मिश्रा, जो निवर्तमान एमएलसी भी हैं, आजकल बिना शोर किए भाजपा नेताओं को रिझाने में लगे हैं। सुना है कि संगठन में बड़े पैमाने पर अस्वीकार्यता होने के बावजूद उन्हें भारी-भरकम डोनेशन देने के बाद लिया गया। बहुचर्चित बालू माफिया रमेश मिश्रा पर सीबीआई की भी दुधारी तलवार लटक रही है, उससे भी उन्हें बचना है, इसलिए भी उन्हें भाजपा के छाते के नीचे सर छिपाना ज्यादा उपयुक्त लगा। अखिलेश सरकार में रमेश मिश्रा का नाम अवैध खनन में आया, जब वे बालू सिंडिकेट के सरगना व पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति और हमीरपुर की तत्कालीन डीएम बी. चन्द्रकला के साथ मिलकर इस पूरे खेल को अंजाम दे रहे थे। बी. चन्द्रकला ने बिना ई-टेंडरिंग के 49 पट्टे जारी किये थे, जिसमें सबसे अधिक पट्टे रमेश मिश्रा, उनके भाई दिनेश मिश्रा और उनके करीबियों को दिये गये थे। इस मामले में सीबीआई ने रमेश मिश्रा और बी. चन्द्रकला समेत 11 लोगों के खिलाफ मुकद्मा दर्ज किया था। अभी भी सीबीआई की जांच चल रही है, इसी कारण रमेश मिश्रा पनाह लेने के लिए भाजपा की शरण में चले गये हैं।

लेकिन सीबीआई की गिरफ्त में बुरी कदर फंसे रमेश मिश्रा के लिए तो फिलहाल अपनी गर्दन छुड़ाना ही प्राथमिकता है, पर वे एमएलसी बनने का भी मोह त्याग नहीं पा रहे, इस कारण प्रदेश में भाजपा कार्यालय आजकल उनका दूसरा घर बना हुआ है। पर सूत्र बताते हैं कि रमेश मिश्रा के लिए एमएलसी पद की राह उतनी भी आसान नहीं है, जितना लग रही है।

लेकिन सबसे तगड़ा दावा हमीरपुर के पूर्व विधायक युवराज सिंह का माना जा रहा है, जिन्हें पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी के कारण हमीरपुर का टिकट नहीं मिला, अन्यथा वो इस सीट से फिर से विधायक निर्वाचित होते। युवराज सिंह ने जिसे पिछली बार हराया, उन्हीं डॉ. मनोज प्रजापति को चुनाव के ठीक पहले भाजपा में शामिल कराया गया और युवराज सिंह का टिकट काटकर डॉ. मनोज प्रजापति को टिकट दिया गया। हालांकि योगी की आंधी में हमीरपुर की दोनों सीटें फिर से भाजपा ने जीत ली, और डॉ. मनोज दो बार हार का स्वाद चखने के बाद भाजपा की कृपा से विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे।

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लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में बैकडोर पॉलिटिक्स का शिकार बने युवराज सिंह नेपथ्य में चले गये। उनका टिकट कटने से पूरे बुन्देलखण्ड में क्षत्रिय समाज में गुस्से का उबाल आ गया था। क्योंकि युवराज सिंह आखिरी उम्मीद थे, पूरे बुन्देलखण्ड में भाजपा ने इस बार किसी क्षत्रिय को टिकट नहीं दिया था। इसीलिए क्षत्रियों का भड़कना जायज था। पर हमारे विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि युवराज सिंह को योगी बाबा का आशीर्वाद मिल चुका है, और इस बार वो विधान परिषद के रास्ते यहां की जनता का प्रतिनिधित्व करेंगे।

खैर, यही पॉलिटिक्स है, और कहते हैं कि भाजपा की पॉलिटिक्स को समझने में विश्लेषण करने का तरीका चुनाव विश्लेषकों ने बदल लिया है। भाजपा के काम करने के तौर-तरीकों पर बारीक निगाह रखने वाले कुछ लोगों की मानें तो हमारा आंकलन काफी कुछ सही बैठेगा।

उधर विधान परिषद चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। 15 मार्च से प्रक्रिया शुरू हो जायेगी, लेकिन उसके पहले अभी टिकट घोषित होने के आसार दिखाई नहीं दे रहे। मण्डल के चारों जनपदों के बीडीसी सदस्य, नगर पालिका और नगर पंचायत सदस्य, चेयरमैन व ब्लॉक प्रमुख, डीडीसी सदस्य, प्रधान इत्यादियों के मतों से विधान परिषद सदस्य का चुनाव होगा, जिसमें भाजपा का संख्याबल अन्य पर भारी है। इसीलिए माना जा रहा है कि भाजपा से जिसे टिकट मिलेगा, वही यहां से विधान परिषद तक पहुंचेगा।

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