दशरथ घाट : भगवान राम ने इसी स्थल पर अपने पिता का किया था पिंडदान

पौराणिक एवं ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल दशरथ घाट उपेक्षा का शिकार हो रहा है...

Jan 31, 2024 - 00:24
Jan 31, 2024 - 00:30
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दशरथ घाट : भगवान राम ने इसी स्थल पर अपने पिता का किया था पिंडदान

ब्राह्मी लिपि के शिला लेख व शैल चित्रो को सहेजन की जहमत नहीं उठा रहा पुरातत्व विभाग

मऊ (चित्रकूट)। पौराणिक एवं ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल दशरथ घाट उपेक्षा का शिकार हो रहा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि ऐसी मान्यता है भगवान श्री राम अपने वनवास काल में यहां ठहरे हुए थे। यही पर उन्हें अपने पिता दशरथ के देहावसान की सूचना मिली। भगवान राम ने इसी स्थल पर अपने पिता का पिंडदान किया था। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस स्थल पर आज तक न तो सड़क बन पाई है और न ही बिजली पहुंच पाई है।

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ये स्थल मऊ से लगभग 18 किमी की दूरी पर नेवरा देवरा ग्राम पंचायत में स्थित है। जहां पहुंचने के लिए खंडेहा से आगे नेवरा मार्ग से होते हुए पगडंडियों के सहारे पहुंचा जा सकता है। पहुंच मार्ग दुर्लभ होने से बहुत कम ही श्रद्धालु यहां तक पहुंच पाते हैं। मंदिर के महंत भगवान दास ने बताया कि आश्रम का इतिहास लगभग सौ वर्षों का है। जब मंदिर में अयोध्या के संत बाबा रामलखन दास तपस्या के लिए पहुंचे। बताते हैं कि बाबा रामलखन दास सिद्ध संत थे। जिनकी ख्याति चारों ओर फैल गई थी। बाबा रामलखन दास ने दशरथ घाट पर आम श्रद्धालुओं एवं संतो के लिए तमाम जरूरी व्यवस्थाएं कराई। लगभग दो-तीन दशक पहले बाबा रामलखन दास पर एक डकैत ने जानलेवा हमला कर दिया लेकिन उन्होंने उदारता एवं करुणा का परिचय देते हुए उस हमलावर का नाम नहीं बताया और प्राणोत्सर्ग कर दिए। परिसर में बाबा रामलखन दास जी महाराज की आज भी समाधि है। जहां लोग श्रद्धाभाव से अपना सिर झुकाते हैं। 
दशरथ घाट परिसर पर बड़ी-बड़ी चट्टानों पर गुप्तोत्तर काल (600 ई. से 900 ई) के स्थापत्य एवं कुछ स्थापत्य के नीचे ब्राह्मी लिपि के शिलालेख मिलते हैं।

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ऐसी मान्यता है कि ये स्थापत्य एवं शिलालेख चंदेलकालीन साम्राज्य के प्रारंभिक अवस्था के दौरान की है। पत्थरों पर की नक्काशी चित्रकूट के अन्य प्राचीन स्थलों से मेल खाती है। जिस कारण इसे चंदेलों से जोड़ा जाता है। खासबात यह भी है कि चित्रकूट का यही एक मात्र ऐसा स्थल है जहां ब्राह्मी लिपि के लगभग आधा दर्जन शिलालेख मौजूद हैं। इतिहासविद प्रो संतोष चतुर्वेदी कहते हैं की लगभग डेढ़ दो दशक पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक टीम प्रख्यात पुरातत्वविद एवं प्रोफेसर जेएन पांडेय के नेतृत्व में यहां दौरा कर चुकी है। मौजूदा शिलालेखों का अध्ययन किया जा चुका है। यद्यपि इन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। परिसर में अनेक शिवलिंग, लेटी हुई विष्णु प्रतिमा, सरस्वती प्रतिमा, गंगा प्रतिमा सहित कई नक्काशीदार चित्र चट्टानों में उकेरे गए हैं। घने वृक्षों से घिरा यह ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल अपने समुचित विकास के लिए इंतजार कर रहा है।

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पुरातात्विक स्थल होने के बावजूद भी पुरातत्व विभाग की घोर अनदेखी इस स्थल में देखी जा सकती है। जिस कारण यहां के पुरातात्विक महत्व की चीजें अनदेखी का शिकार हो रहीं हैं। मंदिर के नियमित श्रद्धालु ईश्वरदीन त्रिपाठी ने कहा कि परिसर में मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था हो। पहुंच मार्ग की बहुत जरूरत है। बिजली की महती आवश्यकता है। नेवरा गांव के निवासी मुकेश पांडेय, बब्बू प्रसाद विश्वकर्मा ने मांग की है कि शासन यहां के सौंदर्यीकरण के साथ पहुंच मार्ग बनवाए। ताकि लोगों को दिक्कत न हो।

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