सच्चे शिष्यों को बस यूं ही मिल जाते हैं, गुरु

जो लोग गुरु को खोजते हैं, वो कभी भी गुरु को प्राप्त नहीं कर पाते। बल्कि होता तो ये है कि एक सच्चा गुरु ही अपने सच्चे शिष्य को खोज लेता है..

सच्चे शिष्यों को बस यूं ही मिल जाते हैं, गुरु
सच्चे शिष्यों को बस यूं ही मिल जाते हैं, गुरु..

सचिन चतुर्वेदी, प्रधान सम्पादक

जो लोग गुरु को खोजते हैं, वो कभी भी गुरु को प्राप्त नहीं कर पाते। बल्कि होता तो ये है कि एक सच्चा गुरु ही अपने सच्चे शिष्य को खोज लेता है। गुरु एक शिष्य की आंतरिक पुकार है, जब भी शिष्य योग्य होगा और उसे गुरु की आवश्यकता होगी, गुरु स्वतः उपस्थित होंगे। आज गुरुपूर्णिमा है, अपने देश में गुरुपूर्णिमा का विशेष महत्व है।

जो भाग्यशाली थे, उन लोगों के पास गुरु हैं, आज उन सब ने अपने-अपने गुरु का पूजन किया। एक भगवान की भांति उन्हें उच्च स्थान पर बैठाकर उन्हें फूलमाला पहनाकर, उनका पूजन किया और यही तो हमारी गौरवशाली परम्परा है। गुरु का स्थान भारतीय संस्कृति में उच्चतम स्थान पर बताया गया है।

क्योंकि किसी व्यक्ति के जीवन में पग-पग पर पड़ने वाली बाधाओं का निवारण एक गुरु ही कर सकता है। गुरु कोई भी हो सकता है, बस जिसे आत्मा स्वीकार कर ले, वही गुरु है। यानि अन्दर से आवाज़ आये, तो समझो वही गुरु है। गुरु को वैसे नहीं खोजा जा सकता, जैसा लोग सोचते हैं, बल्कि गुरु स्वयं ही अपने योग्य शिष्य को खोज लेते हैं। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध वैसा नहीं है जैसा कि स्कूल या कॉलेज में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच होता है।

बल्कि गुरु और शिष्य का सम्बन्ध तो आत्मिक होता है, एक गुरु अपने शिष्य की किसी भी बात पर अप्रसन्न नहीं हो सकता, क्योंकि उसे तो पता है कि शिष्य को अभी भी ये सीखना बाकी है। गुरु तो निखारने पर विश्वास रखता है, बिना रुके, बिना थके और बिना अप्रसन्न हुए। एक सच्चा गुरु जब तक अपने शिष्य को उसके बिना पूंछे जीवन की हर कठिनाई के समाधान का रास्ता नहीं बता देता, उसे भी चैन नहीं पड़ता।

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बहुत से लोग आज भी उधेड़बुन में हैं कि असली वाले गुरु को कैसे प्राप्त करें? लेकिन इस सवाल के जवाब के पहले अपने आप से भी एक सवाल करना पड़ेगा कि क्या आप में एक शिष्य की योग्यता है? यदि आप योग्य हैं तो आपको गुरु भी मिल ही जायेंगे, और उन्हें खोजना नहीं पड़ेगा।

सच्चे शिष्यों को बस यूं ही मिल जाते हैं, गुरु..

हमारा ब्रह्माण्ड कुछ निश्चित नियमों के आधार पर चलता है तथा उनमें से एक नियम ये भी है कि आपकी तीव्र इच्छा आपको इच्छित के पास स्वतः ले जाती है, उसी प्रकार जिसकी इच्छा की जा रही है, वो स्वयं ही इच्छा करने वाले के पास पहुंच जाती है। यानि देखा जाये तो दोनों ही अपनी-अपनी दूरी तय करते हैं। एक गुरु को भी एक सच्चे शिष्य की उतनी ही आवश्यकता है, जितना एक शिष्य को गुरु की।

सच्चा गुरु कौन है, इस पर स्वामी चिन्मयानंद कहते थे, ”केवल आप ही इसे जान सकेंगे, आपको स्वतः एक सुखद अनुभूति होगी, और आपको ज्ञात होगा कि आपने अपने गुरु को पा लिया है। गुरु को पाने का अनुभव इतना निजी होता है कि इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। बस मन के भीतर एक घंटी बजती है और आपको पता लग जाता है।“

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लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्हें गुरु ही नहीं मिला, लेकिन उन्होने वो सब पाया जो वो पाना चाहते थे। ऐसा ही एक उदाहरण हैं महात्मा बुद्धमहात्मा बुद्ध को तो वैसे भी भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, जब उन्हें एक सच्चे गुरु की आवश्यकता हुई तो काफी खोजने पर भी उन्हें गुरु की प्राप्ति नहीं हो पाई, जो उनकी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके। बाहरी दुनिया में खोजते-खोजते बुद्ध ने जब अपने अन्दर खोजना प्रारम्भ किया तो वो बुद्धत्व को प्राप्त हुए। 

कहा जाये तो गुरु एक माध्यम है, सीधा व सरल माध्यम है, आपकी जिज्ञासा को शान्त करने का। पर जब तक गुरु न मिले तो अपने अन्दर भी एक बार खोज कर देख लेना चाहिये। क्या पता, आपको गुरु का भी पता चल जाये और आपकी जिज्ञासा का समाधान भी हो जाये।

इसीलिए जिनको गुरु अभी भी नहीं मिले वो प्रारम्भ कर दें अपनी यात्रा, गुरु के खोज की। अगर आप सच्चे शिष्य बनने के योग्य हैं तो आपके गुरु भी आपको खोजने निकल पड़े होंगे, इस बात का विश्वास रखिये....

गुरु पूर्णिमा की आप सभी को हादिक बधाई।

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