प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान में प्रायश्चित और यज्ञशाला (कर्म कुटी) पूजन का महत्व

श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में आज से श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठानों की शुरुआत हुई है...

Jan 16, 2024 - 03:17
Jan 16, 2024 - 03:21
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प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान में प्रायश्चित और यज्ञशाला (कर्म कुटी) पूजन का महत्व

अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में आज से श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठानों की शुरुआत हुई है। यह वैदिक परंपराओं के अनुसार शुरु की गयी है। आज प्रायश्चित पूजन और कर्म कुटी (यज्ञशाला) पूजन से शुरू हुई। लेकिन हर किसी के मन में यह जिज्ञासा है कि किसी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की वैदिक परंपरा की शुरुआत प्रायः प्रायश्चित और कर्म कुटी पूजन अर्थात यज्ञ वेदिका पूजन से क्यों शुरू होती है?

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आचार्य सरोजकांत मिश्र बताते हैं कि यह पूजा, जाने अनजाने में जीवन के किसी भी क्षण में होने वाली प्रत्येक गलतियों अथवा पाप का प्रायश्चित है। यह मनसा-वाचा-कर्मणा होना चाहिए। निर्धारित विधि का अनुसरण कर मंत्र शक्ति से इसे पूर्ण किया जाता है। एक तरह से यह प्रक्रिया शरीर, मन और वचन का शुद्धिकरण है।

वैदिक साहित्य में प्रायश्चित का बहुत महत्व है। सामान्य अर्थ में यह किसी गलती की स्वीकारोक्ति के साथ पछतावा है। यही कार्य, प्राण प्रतिष्ठा से पूर्व यजमान करता है। वैदिक परंपरा के मुताबिक वह शारीरिक, आंतरिक, मानसिक और बाह्य तरीकों से पछतावा अर्थात प्रायश्चित करता है। वाह्य प्रायश्चित के लिए 10 विधि स्नान की व्यवस्था है। पंच द्रव्य, औषधीय व भस्म सामग्रियां शामिल कर इसे पूर्ण किया जाता हैं। गोदान, स्वर्ण और अर्थ (धन) दान भी प्रायश्चित पूजन की श्रेणी में आते हैं।

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कर्मकुटी (यज्ञशाला) पूजा की क्या जरूरत?

मूर्ति स्थापना से पूर्व यज्ञशाला पूजन के सवाल का जवाब देते हुए आचार्य सरोजकांत मिश्र कहते हैं कि कर्मकुटी का मतलब, यज्ञशाला पूजन से है। यज्ञशाला शुरू होने से पहले हवन कुंड अथवा वेदिका पूजन की वैदिक व्यवस्था है।

जानें अधिवास

मूर्तियों को तराशने में छीनी हथौड़े का उपयोग होता है। शिल्पकार के औजारों से तैयार हुई मूर्ति को चोटें आती हैं। इन सबको ठीक करने के लिए भी व्यवस्था बनाई गयी है। मूर्ति को एक रात के लिए पानी में रखना जलाधिवास और अनाज में दबाकर रखना धान्याधिवास है। मूर्ति में दोष और पत्थर की गुणवत्ता का भी पता लगाने को मूर्ति को अनुष्ठानिक स्नान कराया जाता है। पंचामृत, सुगंधित फूल व पत्तियों के रस, गाय के सींगों पर डाला गया पानी और गन्ने के रस में मूर्ति को डुबोने या स्नान करने की व्यवस्था शामिल है।

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कार्यक्रमों पर एक नजर-

  • 17 जनवरी को श्रीविग्रह का परिसर भ्रमण। गर्भगृह का शुद्धिकरण।
  • 18 जनवरी से अधिवास प्रारंभ। दोनों समय जलाधिवास, सुगंध और गंधाधिवास भी।
  • 19 जनवरी की प्रातः फल अधिवास और धान्य अधिवास होगा।
  • 20 जनवरी को पुष्प और रत्न अधिवास (सुबह) व घृत अधिवास (शाम)
  • 21 जनवरी को शर्करा, मिष्ठान और मधु अधिवास (सुबह) व औषधि और शैय्या अधिवास (शाम)
  • 22 जनवरी को दोपहर में रामलला के विग्रह की आंखों से हटेगी पट्टी, रामलाला को दिखाया जाएगा दर्पण।

हिन्दुस्थान समाचार

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