डॉक्टरों की टीम ने मरीज के गले से निकाली 1 किलो 100 ग्राम की गांठ, बचाई जान

रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज, बांदा में डॉक्टरों की टीम ने एक जटिल ऑपरेशन कर 18 वर्षीय युवक के गले से...

Dec 27, 2024 - 19:04
Dec 27, 2024 - 19:17
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डॉक्टरों की टीम ने मरीज के गले से निकाली 1 किलो 100 ग्राम की गांठ, बचाई जान

बांदा। रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज, बांदा में डॉक्टरों की टीम ने एक जटिल ऑपरेशन कर 18 वर्षीय युवक के गले से 1 किलो 100 ग्राम की गांठ निकालकर उसकी जान बचाई। यह ऑपरेशन न केवल मरीज और उसके परिवार के लिए राहतभरा रहा, बल्कि मेडिकल कॉलेज के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि साबित हुआ।

8 साल से पीड़ित था मरीज

भरौली ओरन जनपद बांदा के निवासी अंतिम (18 वर्ष), पुत्र मुन्नीलाल, पिछले आठ वर्षों से घेंघा रोग से पीड़ित थे। स्थानीय स्तर पर इलाज के बावजूद बीमारी का समाधान नहीं हो पा रहा था। बीते महीने, अंतिम ने रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभाग में डॉक्टर शंकर कबीर से संपर्क किया। डॉक्टर कबीर ने उनकी जांच कर ऑपरेशन की सलाह दी।

जटिल ऑपरेशन में मिला नया जीवन

पिछले हफ्ते डॉक्टर शंकर कबीर और उनकी टीम ने चार घंटे लंबे ऑपरेशन में अंतिम के गले से बड़ी गांठ को सफलतापूर्वक निकाल दिया। ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति स्थिर है और वह अभी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की निगरानी में भर्ती है। डॉक्टरों के अनुसार, 2-4 दिनों के बाद उसे छुट्टी दे दी जाएगी।

सफलता पर मिली बधाई

रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉक्टर एस. के. कौशल ने इस ऑपरेशन की सफलता के लिए डॉक्टर शंकर कबीर और उनकी टीम को बधाई दी। डॉक्टर कबीर ने बताया कि इस ऑपरेशन का खर्च केवल सरकारी सहायता के तहत आया, जिससे मरीज के परिवार को आर्थिक बोझ नहीं झेलना पड़ा।

बीमारी से बचाव के उपाय

डॉक्टर शंकर कबीर ने बताया कि यह बीमारी मुख्य रूप से शरीर में आयोडीन की कमी के कारण होती है। इससे बचाव के लिए आयोडीन युक्त नमक का सेवन करने की सलाह दी गई है।

डॉक्टरों और टीम की मेहनत

इस ऑपरेशन में डॉक्टर शंकर कबीर के साथ डॉक्टर नरेंद्र कुमार, डॉक्टर अखिल (एनेस्थीसिया विभाग), डॉक्टर प्रिया दीक्षित, डॉक्टर आशुतोष, डॉक्टर सेडविनो, डॉक्टर अरविंद, डॉक्टर नरेंद्र कुमार और पैरामेडिकल टीम के पूजा, चित्रा, प्रिया, अवधेश कुमार सहित अन्य सदस्य शामिल रहे।

रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज के इस सफल ऑपरेशन ने यह साबित किया है कि अब बांदा के मरीजों को बड़े शहरों में जाने की आवश्यकता नहीं है। स्थानीय स्तर पर ही उन्हें बेहतर इलाज मिल रहा है।

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