उत्तर प्रदेश में चुनाव की दस्तक होते ही सियासतबाजों की निगाहें बुन्देलखण्ड पर फिर टिक गई हंै। पृथक राज्य को लेकर राजनीति एक बार फिर गरमा रही है। विधानसभा चुनाव में मुददा तलाशने के लिए राजनीतिक दलों से लेकर बुन्देलखण्ड की बात करने वाले भी सियासी पांसा फेंक रहे है। अलग राज्य के मुददे पर फिलहाल जनता मौन है, इसे वह राजनीतिक स्टंट मानती है। पिछले पखवारे पृथक बुन्देलखण्ड राज्य के लिए बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी ने चित्रकूट रामघाट के मंदाकिनी तट से महन्त दिव्य जीवन दास से आशीर्वाद लेकर चित्रकूट से झाँसी तक की संकल्प यात्रा राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय पाण्डेय के नेतृत्व में शुरू की। वहीं बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा (गोस्वामी गुट) ने बुन्देलखण्ड काॅलेज झाँसी में बुन्देलखण्ड राज्य की आवश्यकता और महत्व पर सेमिनार कर अलग राज्य के मुददे को फिर हवा दे दी। मोर्चा के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. बाबूलाल तिवारी ने अपने उद्गार में कहा, ”भरपूर प्रतिभा का धनी बुन्देलखण्ड, आर्थिक विषमता का शिकार होकर अपनी बदहाली का रोना रो रहा है। यह बदहाली तब तक दूर नहीं हो सकती, जब तक अलग बुन्देलखण्ड राज्य का गठन न हो जाये। बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण यहाँ के युवाओं के लिए द्वितीय स्वतन्त्रता संग्राम की तरह है और इस आन्दोलन में युवाओं को अग्रिम पंक्ति में आकर संघर्ष करना होगा।“ केन्द्रीय अध्यक्ष मुकुन्द किशोर गोस्वामी ने कहा, ”जिसकी निष्ठा बुन्देलखण्ड राज्य के साथ हो, उसी को वोट देने का संकल्प लें। वोट की ताकत ही पृथक राज्य बना सकती है।“

इससे पूर्व बाँदा जनपद के गिरवाँ में भाजपा के केन्द्रीय मंत्री सन्तोष गंगवार ने पिछड़ा वर्ग सम्मेलन में बुन्देलखण्ड राज्य की वकालत कर चुनावी मुददा तलाशने की कोशिश कर सोचने को मजबूर कर दिया। इतना ही नहीं काँग्रेस के राहुल गाँधी से लेकर राजबब्बर तक ने अपनी खाट रैली में अलग राज्य की मांग पर मोहर लगाई थी। बसपा भी इससे इतर नही है तो फिर क्या कारण है कि बुन्देलखण्ड राज्य बनाने में सियासी मोहरे सजाये जा रहे हंै? एक समय सबसे समृद्ध होने के बावजूद आज बुन्देलखण्ड अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है, आज भी यह अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। अंग्रेजी हुकूमत के समय तो यह अलग प्रदेश था परन्तु आजादी के बाद से ही कभी एक में तो कभी किसी और चक्की में यह लगातार पिसता जा रहा है। आखिर क्यों हो रहा है ऐसा? कारण सिर्फ एक है कि इस्तेमाल करो और फेंक दो। राजनीतिज्ञों ने बुन्देलखण्ड पर बयानबाजी के कई कीर्तिमान तो स्थापित किए पर इसके लिए किया कुछ नहीं। उत्तर प्रदेश के झाँसी, बाँदा, हमीरपुर, चित्रकूट, महोबा, ललितपुर और जालौन के अतिरिक्त मध्य प्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, पन्ना और दमोह सहित 13 जनपद आते हैं। जहां रूक-रूक कर अलग राज्य का आन्दोलन अंगड़ाई लेता है। दरअसल बुन्देलों का पृथक राज्य के लिए संघर्ष नया नहीं है। अलग राज्य की मांग को लेकर बुन्देले वीरों ने कई बार आन्दोलन चलाए व मांग उठाई लेकिन हर बार वो छले गये और मांग नक्कार खाने की तूती बनकर रह गई, जिसे देखने और सुनने वाला कोई नहीं। चाहे 2014 का लोकसभा चुनाव हो या एमपी और यूपी के विधानसभा चुनाव, हर बार चुनावी दस्तक फिर अलग राज्य के मुद्दे को हवा देती है। ऐसे में बुन्देलों को गम्भीरता से विचार करना होगा।

पृथक राज्य की लड़ाई सन् 1989 में स्व. शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में झाँसी की एक आईस फैक्ट्री में मशाल जलाकर शुरू हुई। इसके बाद बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा को विठ्ठल भाई पटेल ने हवा दी। बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा के केन्द्रीय उपाध्यक्ष कैप्टन सूर्य प्रकाश मिश्रा बताते हैं, ”फिल्म अभिनेता से नेता बने राजा बुन्देला ने मोर्चा को खण्ड-खण्ड से जोड़ने के लिए लम्बी पदयात्रा कर आन्दोलन की अलख जगाई थी, लेकिन बुन्देला की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने जल्दी ही हिलोरंे मारना शुरू कर दिया और परिणामस्वरूप बुन्देला राजनीतिक दलों की कठपुतली बन गये। बुन्देलखण्ड राज्य बनने से निश्चय ही यहाँ के लोगों को नया आयाम मिलेगा। राज्य बनेगा, तभी विकास होगा, लेकिन इसमें कोई राजनीतिक स्वार्थ न हो, तब।“ वक़्त ने करवट ली और मुक्ति मोर्चा 2014 में विघटित हो गया। हरि मोहन विश्वकर्मा हो या मुकुन्द किशोर गोस्वामी, दोनों ही अपने को मोर्चा का अध्यक्ष बताते हंै। सूत्रांे की माने तो चुनाव आयोग में आज भी मोर्चा के अध्यक्ष राजा बुन्देला हंै। दोनो अध्यक्षों की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष कै. मिश्रा ने जहाँ बाँदा में आन्दोलन का बिगुल फूंक रखा है, वहीं चित्रकूट में अजीत सिंह ने मशाल जला रखी है। बुन्देलखण्ड की अलख जलाने वालों ने 30 साल तक लम्बा संघर्ष किया। उसी बीच देश में कई छोटे राज्य तो बन गये पर बुन्देलखण्ड राज्य के लिए संघर्ष आज भी जारी है। बुन्देलखण्ड राज्य के प्रभावी समर्थक और पूर्व बूटा अध्यक्ष प्रो. राजीव रतन द्विवेदी की माने तो अपार प्राकृतिक और खनिज सम्पदा के बावजूद विकास की होड़ में पिछड़ गये बुन्देलखण्ड राज्य के लिए नये तरीके से शुरूआत होनी चाहिए, वरना 1940 से चली आ रही बुन्देलखण्ड राज्य बनाने की मांग पूरी नहीं हो सकती। चुनाव के वक्त राजनीतिक दलांे द्वारा चुनावी घोषणापत्र चुनावी स्टंट होता है, जनता इसे बखूबी समझती है। बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा के अलावा भी तमाम राज्य निर्माण समर्थक संगठन जैसे, बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण सेना, बुन्देलखण्ड विकास सेना, अधिकार सेना, क्रान्ति सेना, नवनिर्माण सेना, किसान मोर्चा, किसान पंचायत, व्यापार मंडल, कर्मचारी संगठन के साथ-साथ छात्र संगठन भी इस लड़ाई में कूदे। बुन्देलखण्ड विकास सेना के प्रमुख हरीश कपूर टीटू के नेतृत्व में सन् 2010 में एक हजार सैनिकों ने बुन्देलखण्ड राज्य के लिए लखनऊ में गोमती तट पर सामूहिक रूप से मुण्डन कराया और प्रदर्शन करते हुए संकल्प लिया कि जब तक बुन्देलखण्ड राज्य नहीं बन जाता तब तक खून की अन्तिम बूंद तक संघर्ष करते रहेंगे। हरीश कहते हैं, ”देर हुई तो रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा।“

सरकार जिस तरह बुन्देलखण्ड की उपेक्षा कर रही है, वह चुनावी बयार में उसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। साफ शब्दांे में यदि इसे बयां किया जाये तो बुन्देलखण्ड आज हर मामले में हाशिये पर है। भले ही राजनीति के नुमाइन्दे सरेआम इन हालातों पर टीका-टिप्पणी करने से बचते हांे, लेकिन दबी ज़ुबां से इसे ख़ारिज नहीं करते। वर्ष 2008 में काँग्रेस के तत्कालीन विधायक झाँसी से प्रदीप जैन आदित्य, उरई से विनोद चतुर्वेदी और बाँदा से विवेक कुमार सिंह ने विधानसभा में बुन्देलखण्ड राज्य के लिए संकल्प प्रस्तुत कर हंगामा काटा था, जिसे राजनीतिक दलों ने चुनावी स्टंट करार दिया था। इतना ही नहीं, नवम्बर 2011 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बांटने की वकालत कर बुन्देलखण्ड में वाह-वाही लूटी थी, वहीं भाजपा की केन्द्रीय मंत्री उमा भारती बुन्देलखण्ड राज्य की प्रबल समर्थक रही हैं। बुन्देलखण्ड में जब-जब भी चुनाव आता है, नेता गरजते हैं। जनवरी 2008 की एक रैली के दौरान उत्तर प्रदेश की तत्कालीन बसपा सरकार पर निशाना साधते हुए काँग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था, ”राज्य सरकार की लापरवाहियों की वजह से बुन्देलखण्ड की जनता केन्द्र सरकार की योजनाओं से मरहूम है।“ इसी प्रकार फरवरी 2012 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी एक चुनावी रैली के दौरान कहा, ”बुन्देलखण्ड के विकास के लिए हमने केन्द्र सरकार से 80 हजार करोड़ रूपये की मांग की थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।“ यानि जो भी आया सिर्फ गरजा, बरसा कोई नहीं, यहाँ तक कि भगवान भी नहीं।

चैपालों और चाय की दुकानों का चकल्लस शबाब पर होता है। चर्चा होती है कि अपना अलग राज्य होगा? अपनी सरकार होगी? अपने सुनने-सुनाने वाला विधायक होगा, नफा-नुकसान आँखों के सामने होगा। होगा भी या नहीं? चकल्लस चैकड़ी का पेंच यहीं पर अटक जाता है। अलग बुन्देलखण्ड के मंसूबांे और सपनों की बमुश्किल राजनीति और चुनावी दांव-पेंच के रहस्यों पर बहस तेज हो गई है। बुन्देलखण्ड लोकतांत्रिक सेना के रवीन्द्र नाथ का मानना है कि बुन्देलखण्ड को नई दिशा और दशा देने के लिए कदम से कदम मिला कर चलने का प्रण लेना होगा। सपा के नेता व समाजसेवी शोभाराम कश्यप साफ कहते हैं, ”बुन्देलखण्ड प्रत्येक दशा से मजबूत है, लेकिन यहाँ पर प्राकृतिक संसाधनांे की लूट हो रही है। गरीब पहाड़ों और नदियांे के किनारे रात गुजार रहा है। बुन्देलखण्ड पैकेज अधिकारियांे के खाने-कमाने का साधन है, अब राज्य की पहल होनी चाहिए।“ चाय की चुस्की में वरिष्ठ अधिवक्ता बी.एम. गुप्ता, पूर्व प्राचार्य बाबूलाल गुप्ता और बीना गुप्ता अस्त होते अंधेरे में बुन्देलखण्ड राज्य पर बाशिंदो के लिए सुखद पहलू तो मानते हैं पर अलग राज्य के मुद्दांे पर नेताओं की घोषणा और वादांे का हवा-हवाई मानते हैं। बिगुल बजा बुन्देलखण्ड का, जाग उठी तरुणाई है
उठो जवानों तिलक लगाने, क्रान्ति द्वार पर आई है
इस नारे के साथ ही बुन्देलखण्ड का सत्याग्रह आन्दोलन की लहरें अब तेजी से हिलोरें मारने लगी हैं। बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. बाबूलाल तिवारी की राजनीतिक महत्वांकाक्षा का हिस्सा बन चुका बुन्देलखण्ड राज्य एक बार फिर बुन्देलखण्ड के विकास की आवाज उठाने लगा है। छात्र जीवन से संघर्ष की मशाल लेकर चलने वाले बाबूलाल तिवारी, बीकेडी के कार्यवाहक प्राचार्य से पूर्व काॅलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष भी रहे हैं। बसपा कोटे से शिक्षक स्नातक का जुझारू चुनाव लड़ चुके तिवारी अलग राज्य के लिए सत्याग्रह आन्दोलन की शुरूआत महारानी झाँसी के किले की प्राचीर के नीचे सर्द हवाओं के बीच कर चुके हंै, जहाँ तमाम सामाजिक संगठन सहित बार एसोसिएशन ने मंाग रूपी एजेन्डा पारित कर जनता के बीच जाने का संकल्प किया है। सत्याग्रह आन्दोलन में केन्द्रीय अध्यक्ष मुकुन्द किशोर गोस्वामी, कुंवर विक्रम सिंह, रवीन्द्र करेले, प्रीति मिश्रा, वन्दना कुशवाहा, अनिल पाठक सहित दिनेश भार्गव, मनीष रावत (ललितपुर), प्रद्युम्न दीक्षित (जालौन), देव प्रताप जूदेव (मऊरानीपुर), अमित सेंगर, सनी ठाकुर, नीरज सोनी सहित शहंशाह (बाँदा) ने भी अपनी उपस्थिति का डंका बजाया है।

बुन्देलखण्ड राज्य पाने के लिए बुन्देलियों को कीमत चुकानी पडे़गी? केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान ही उत्तराखण्ड अस्तित्व में आया था। जिसे देख कर लगा था कि केन्द्र में मोदी सरकार अलग राज्य का सपना साकार करेगी, लेकिन फिलहाल भाजपा इस मांग को धार नहीं दे पायी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता अशोक त्रिपाठी जीतू, बुन्देलखण्ड राज्य की मांग को जायज ठहराते हुए कहते हंै, ”बुन्देलखण्ड की खनिज सम्पदा का लूट कर कंगाल बनाया जा रहा है। प्राकृतिक सम्पदाओं को दोहन से रोकने और अलग राज्य के लिए एक विधा पर काम करना होगा।“ 2011 में विधानसभा चुनाव के पूर्व, तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने छोटे राज्यांे का मुद्दा उठाकर सनसनी फैलाई थी। हालांकि बसपा अपने बयान पर आज भी कायम है। वहीं एक ओर सपा, प्रदेश को बांटने की कभी पक्षधर नहीं रही। छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष बसपा नेता प्रदीप निगम लाला साफ कहते हैं, ”बुन्देलखण्ड के लिए छात्र जीवन से संघर्ष किया है। बसपा बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण में मील का पत्थर साबित होगी।“ काँग्रेस के कद्दावर नेता किशन गुप्ता का मानना है कि बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण में काँग्रेस अहम भूमिका निभायेगी और बुन्देलखण्ड को विशेष पैकेज कांग्रेस की ही देन है। बहरहाल इसमें जरा भी शंका नहीं कि विधानसभा चुनाव में बुन्देलखण्ड राज्य सियासी मुद्दा बन सकता है। ललितपुर भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रदीप चैबे कहते हैं, ”अलग राज्य से यूपी-एमपी में फैले इस पिछड़े क्षेत्र का विकास होगा। यहां के लिए अलग बजट होगा। बुन्देलखण्ड में खनिज सम्पदा की भरमार है, इसका राजस्व राज्य सरकार के खजाने में चला जाता है। राज्य बनने पर यह बजट पूरा का पूरा यहीं खर्च होगा।“

बन्दूक से बुन्देलखण्ड जब राजनीतिक दलांे की जुबान पर ताला था तब 2004 में खरेला के बादशाह सिंह ने इंसाफ सेना की स्थापना बन्दूक के दम पर बुन्देलखण्ड लेने की हुंकार भर, सरकार को सदमें में डाल दिया था। इस इंसाफ सेना के केन्द्रीय अध्यक्ष चित्रकूट के तेजतर्रार युवा संत स्वामी दिव्यानन्द थे। बताया जाता है कि इंसाफ सेना के 12 हजार लोगों के पास वैध शस्त्र लाइसेंस थे तब जिला और गांव स्तर तक इकाईयां गठित हुई थीं। बकौल बादशाह सिंह, जब तक अलग बुन्देलखण्ड राज्य नहीं बनाया जाता तब तक न कोई पद लूंगा, न चुनाव लडूंगा और न ही नेताआंे की डेªस बन चुका कुर्ता-पायजामा ही पहनूंगा। बहरहाल बादशाह बसपा से चुनाव जीत मंत्री भी बने, लेकिन मांग नक्कारखाने की तूूती बन गई। फिलहाल बादशाह काँग्रेस के साथ आ गये हंै। ऐसे ही बुन्देलखण्ड पृथक राज्य संघर्ष समिति के संयोजक तथा पूर्व सांसद गंगाचरण राजपूत, जो अपने तीखे तेवरांे के लिए जाने जाते हैं, उनकी रणनीति में टेªन रोको, रास्ता जाम करो से लेकर उग्र तेवर शामिल रहा। बुन्देलखण्ड विकास सेना के हरीश कपूर टीटू के संघर्ष की चर्चा, सुर्खियों में रही। बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण मोर्चा बनाकर काम करने वाले भानू सहाय आज काँग्रेस के बैनर तले अलग राज्य की मांग के प्रबल समर्थक हैं। आजादी के बाद बना था बुन्देलखण्ड राज्य महाराजा छत्रसाल के समय बुन्देलखण्ड में 44 परगना और 11665 गाँव थे। करीब 2 करोड़ की लगान राजस्व के रूप में प्राप्त होती थी। 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के साथ देशी राज्यों को अंग्रेजों ने संधियों से मुक्त कर दिया। तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल पर बुन्देलखण्ड क्षेत्र के 35 राजा-रजवाड़ों ने विलय के समय राज्य निर्माण की सन्धि पर केन्द्र सरकार से समझौता किया था और उसी समझौते के फलस्वरूप 12 मार्च 1948 को इस क्षेत्र की देशी रियासतों का विलय किया गया। तब संयुक्त राज्य विंध्य प्रदेश का निर्माण हुआ। इसकी दो इकाईया बनाई गई बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड। बुन्देलखण्ड राज्य की राजधानी छतरपुर जनपद के अन्तर्गत आने वाले नौगांव को बनाई गई और मुख्यमंत्री कामता प्रसाद सक्सेना। लेकिन यह गठन राजनीतिक कारणों से ज्यादा न ठहर सका। बुन्देलखण्ड की भोली जनता को छला गया और दो माह बाद ही इसका नाम विंध्य प्रदेश हो गया और राजधानी रीवा हो गई। बाद में इसे भी समाप्त कर इसका नाम मध्य भारत करके राजधानी नागपुर बना दी गई।

बुन्देलखण्ड की वीरता और त्याग को विघटित करने के उद्देश्य से बुन्देलखण्ड को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बांट दिया गया। सन् 1956 में गठित प्रथम राज्य पुर्नगठन आयोग के सदस्य के.एम. पाणिक्कर ने बुन्देलखण्ड को अलग राज्य बनाये जाने की प्रबल वकालत करते हुए कहा कि बुन्देलखण्ड को यदि अलग राज्य नहीं बनाया गया तो यह क्षेत्र उड़ीसा के कालाहांडी से भी बदतर स्थिति में होगा। आजादी के पहले था बुन्देलखण्ड एजेन्सी 1802 की बेसिन सन्धि के परिणामस्वरूप मराठों द्वारा अंग्रजों को बुन्देलखण्ड के कई हिस्से सौंप दिये गये थे। तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध के समापन पर सन् 1818 में पुणे में पेशवा ने बुन्देलखण्ड पर अपने समस्त अधिकार अंग्रेजों को सौंप दिये थे। सन् 1811 में अंग्रेजों ने एक एजेंसी का निर्माण किया जिसे बुन्देलखण्ड एजेंसी कहा गया। इसके अन्तर्गत आने वाली सभी रियासतों पर नियन्त्रण करने के लिए एक राजनीतिक एजेन्ट की नियुक्ति भी की गई और इसका मुख्यालय बाँदा बनाया गया। 1818 में मुख्यालय कालपी स्थानान्तरित किया गया, 1824 में हमीरपुर लेकिन 1832 में इसे वापस बाँदा ले आया गया। बुन्देलखण्ड एजेंसी पूर्व दिशा में जहाँ बघेलखण्ड से घिरा था, वहीं उत्तर में संयुक्त प्रान्त, पश्चिम में ललितपुर और दक्षिण में मध्य प्रान्त से घिरा था। उस समय इसकी हद में 8 सलामी रियासतें थीं, वहीं 10 गैर सलामी रियासतें थीं साथ ही 5 जागीरें भी थीं। बुन्देलखण्ड एजेन्सी की बड़ी रियासतों में दतिया और ओरछा की गिनती होती थी, जिन्हें 15 तोपों की सलामी मिलती थी तो अजयगढ़, बाओनी, बिजावर, चरखारी, पन्ना और समथर रियासतों को 11-11 तोपों की सलामी दी जाती थी।

9 राज्यों में है बुन्देलखण्ड से कम आबादी बुन्देलखण्ड राज्य की मांग सिर्फ इस आधार पर खारिज नहीं की जा सकती कि यहाँ क्षेत्रफल और जनसंख्या कम है। पूरे देश में 9 राज्य ऐसे हैं जहाँ की आबादी बुन्देलखण्ड की आबादी से भी कम है। जम्मू एवं कश्मीर, उत्तराखण्ड, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और गोवा जैसे राज्य क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से बुन्देलखण्ड से पीछे हैं। उत्तराखण्ड के 13 जनपदों की आबादी मात्र 1,01,16,752 है और क्षेत्रफल 53,484 वर्ग किलोमीटर है। हिमाचल प्रदेश का क्षेत्रफल 55,673 वर्ग किलोमीटर है और 12 जनपद हैं। त्रिपुरा में सिर्फ 36,71,000 आबादी और 4 जिले हैं, क्षेत्रफल 10,493 वर्ग किलोमीटर है। मेघालय की आबादी मात्र 29,64,000 है और 7 जिले हैं। मणिपुर की जनसंख्या 27,21,756 है, क्षेत्रफल सिर्फ 22,327 वर्ग किलोमीटर और 9 जिले हैं। मिजोरम की आबादी 10,91,000 है और 8 जिले हैं। सिक्किम में 6,07,688 आबादी और 7096 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल मेें राज्य बना हुआ है।

बुन्देलखण्ड की आबादी और क्षेत्रफल

जनपद क्षेत्रफल (वर्ग किमी) जनसंख्या
बाँदा 4408 1799410
चित्रकूट 3216 991730
महोबा 3144 875958
हमीरपुर 4021 1104285
जालौन 4565 1689974