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सरकार द्वारा चलाए जा रहे जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम के विरूद्ध बयान

लोकतंत्र में जनसंख्या का महत्व वोटतंत्र की वास्तविक सच्चाई से बहुत अधिक है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी एक नारा चलाया था "जिसकी जितनी भागेदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी"। इस नारे के माध्यम से यूपी के ब्राह्मणों का बहुतायत एकतरफा मत प्राप्त कर पूर्ण बहुमत से सत्तासीन हो गईं। ये प्रादेशिक जातीय कवायद थी।

राष्ट्रीय पटल पर धार्मिक आधार जनसंख्या द्वारा सत्ता पर काबिज होने की भविष्यवाणी की जा रही है। समय समय पर तमाम राजनीतिज्ञ ने चिंता व्यक्त की अथवा भविष्यवाणी द्वारा समाज को यह बताया कि अगर धर्म विशेष की जनसंख्या कम हो गई तो उन पर राज दूसरा धर्म विशेष करेगा। असल में धर्म का नाम लेना साम्प्रदायिक करार दे दिया जाता है। लेकिन जब खुलेआम फरमान अथवा जुबानी फतवा सरीखे वक्तव्य जारी होने लगें तब हिन्दू और मुस्लिम स्पष्ट लिखकर चर्चा की जा सकती है।
अंदरखाने में बहुतायत वैयक्तिक रूप से लोग चर्चा करते हैं कि अगर मुस्लिमों की संख्या ज्यादा हो गई तो एक दिन उनकी ही सरकार बनेगी। इससे बहुत पहले राहुल गांधी ने कहा था कि सिक्ख प्रधानमंत्री हो सकता है तो एक दिन मुस्लिम प्रधानमंत्री भी हो सकता है। हालांकि इस प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा में ही बंटवारा हुआ और पाकिस्तान बन गया।

सुर्खियों पर भरोसा किया जाए तब अनेक बार यह सुनने में आता है कि मुस्लिम इतनी जनसंख्या बढ़ाना चाहते कि एक दिन लोकतंत्र में उनका अपना मुखिया मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पद को सुशोभित करे। हाल ही में आजम खान ने वजीरेआला बनने की ख्वाहिश सामाजिक पटल पर दर्ज कराई थी। कहीं ना कहीं मुस्लिम नेतृत्वकर्ता के मन में शायद इस बात की टीश है कि वे पीएम नहीं बन सके। फिर भी राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मानित पद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद को मिसाइलमैन से लेकर हामिद अंसारी तक की पीढ़ी अब तक सुशोभित कर चुकी है। दिवंगत अब्दुल कलाम तो निर्विवाद रूप से भारत की आम जनमानस के मन में सर्वोच्च प्रिय स्थान आज भी रखते हैं।

देश में अल्पसंख्यक का दर्जा देकर मुस्लिम धर्म की प्रगति के लिए प्रमुखता से कार्य किया जाता है, जिससे अब कहीं उपेक्षित व अपने को गरीब मध्यमवर्गीय समझने वाला हिन्दू निरीह भी महसूस करने लगा कि हमारे लिए कब कैसे और क्या होगा ? बेशक सरकार किसी की भी हो वो कार्य संविधान और कानून के नजरिए से करती है। अपवाद के अलावा हमारा संविधान सभी को समान अवसर प्रदान करता है।

वर्तमान में भगवा राज के नाम से विख्यात नरेन्द्र मोदी की सरकार हो अथवा उत्तर प्रदेश में योगी सरकार हो दोनों ही मुस्लिमों के हित में अच्छा काम कर रहे हैं। बल्कि धार्मिक कुरीत से महिलाओं को आजादी दिलाने के लिए काम किया तथा समर्थन किया।

जिस गुजरात में छठवीं बार भाजपा सरकार बनी। वहीं सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक अन्य राज्यों से ज्यादा मुसलमानों की स्थिति अच्छी है। ये महज उदाहरण भर हैं कि ऐसे सिगूफे जिन लोगों द्वारा फैलाए जा रहे हैं, उनमें कितनी सत्यता और जनसंख्या द्वारा सत्ता के केन्द्र में बात कितनी सही सिद्ध होती है। असल में जनसंख्या विस्फोट से देश को बहुत बड़ा नुकसान है। इसको आम जनता महसूस करने लगी है। जैसे जैसे समाज शिक्षित हो रहा है वैसे वैसे कम से कम हम दो हमारे दो का नारा फलीभूत हो रहा है। अभी हाल ही में जनसंख्या संबंधित आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे। जिनमें पूर्व की अपेक्षा मुस्लिम जनसंख्या की बढ़त के प्रतिशत का आंकड़ा कुछ प्रतिशत कम था।

आजादी के बाद से जिस रफ्तार से जनसंख्या बढ़ी है, उसके समानांतर विकास नहीं हो पाया और साधन संसाधन का अनुपात बिगड़ने से हर परिवार के समस्या की तादाद अधिक हुई है। जिससे रोजगार आदि ना मिलने का बड़ा कारण जनता भी समझने लगी है।

अब अलग बात है कि भाजपा के विधायक बनवारी लाल जनसंख्या वृद्धि की पेशकश करें, किन्तु जनसंख्या वृद्धि के साथ रोजगार की वृद्धि कैसे होगी ? गरीबी कैसे मिटेगी और अपराध किस तरह थमेगें ? इस पर कम अक्ल के राजनीतिक शायद ही कभी चिंतन कर सकें। जनसंख्या बढ़ाने को चीखने चिल्लाने वाले लोग कभी गरीब परिवार को हर समस्या से निजात दिलाने हेतु कोई रोडमैप नहीं तैयार करते। बल्कि ऊल जलूल भाषण देना तथा आम आदमी के मन में बेवजह का भय बेड़ कर बड़ा अपराध करते हैं।
क्या कभी ऐसा नहीं हो सकता कि जिस प्रकार से फिल्मों पर सेंसर बोर्ड कार्यवाही करता कि कुछ तो सुचिता बरकरार रहती है और समाज के सामने वही परोसा जाए जिसका संदेश गलत ना हो। लेकिन हमारे नेता जब जो जी चाहे बड़बड़ा देते हैं और उसका फल इतना बुरा भी होता है कि अक्सर कोमल मन में भय चिंता आदि का अधिग्रहण हो जाता है।

चुनाव के समय तो चुनाव आयोग कुछ रिकार्डिंग वगैरा कराकर माहौल शांत रखने की कोशिश करता है फिर भी ऐसा कुछ हो जाता है कि जांच बैठाकर स्पष्टीकरण मांगना पड़ता है। अब जिस जनसंख्या को कम करने के लिए सरकार द्वारा प्रचार प्रसार किया जा रहा है और संवैधानिक नियम बनाया गया कि तीन बच्चों से अधिक होने पर चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रह जाएंगे और भविष्य में जनसंख्या कम हो सके इस पर चिंतन मनन का समय हो उस विषय पर कोई विधायक ऐसे व्याख्यान दे तो यकीनन यह सरकार द्वारा चलाए जा रहे जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम का उल्लंघन है एवं आम जनता का मानसिक उत्पीड़न है। ऐसे वक्तव्य को अपराध की श्रेणी में लाया जाना आवश्यक है और इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दे पर ऊलजलूल बयान देने वालों की विधायी सदस्यता रद्द करने और भविष्य में ऐसे उग्र भड़काऊ बयान ना देने की लिखित चेतावनी देनी चाहिए।

कोई भी नेता किसी के घर परिवार की आजीविका चलाने नहीं आता और मैन पावर इतना हो गया है कि उसको आजीविका का जमीनी आधार नहीं मिल पा रहा है। जिससे अनेक प्रकार की विकृतियां समाज और सरकार के सामने तैयार हैं और भविष्य में भयावहता की उम्मीद अधिक है। अगर समय रहते संतुलन स्थापित नहीं हुआ। अब हर परिवार राजनीति का लालू यादव परिवार नहीं होता फिर भी सबूत सबके समक्ष है। इसलिये सवाल पीएम और सीएम बनने से ज्यादा देश की जनता के सुख और समृद्धि का है। जनता समझने लगी है और धार्मिक भावनाओं को भड़का कर सत्ता प्राप्त करने वाले नेता भी समय रहते समझ जाएं वरना जनता सिरे से नकारना भी जानती है। इस प्रकार के दूषित वक्तव्य पर हमेशा कार्यवाही के दरवाजे खुले होने चाहिए।



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