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स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को दुरुस्त करने की जरूरत फोर्टीज की घटना सरकार की विफलता

भारत दुनिया की एक आर्थिक शक्ति बनने का सपना देख रहा है, लेकिन पिछले दिनों फोर्टीज और मेदांता अस्पताल में जो हुआ, उससे इसका सिर शर्म से झुक जाना चाहिए। फोर्टीज मेेें डेंगु के एक मरीज के इलाज पर 16 लाख रुपये खर्च हुए और उसके बावजूद वह मरीज बचाया नहीं जा सका। वैसी ही एक घटना मेदांता अस्पताल में भी हुई।

यह एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हमारे देश के लिए है। हमारे देश में कुल आबादी का 30 फीसदी गरीबी रेखा के नीचे रहती है। गरीबी रेखा के नीचे रहने का मतलब है गांव में 32 रुपये प्रति दिन की कमाई और शहर में 47 रुपये प्रति दिन की कमाई। अन्य 50 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से थोड़ा ही ऊपर रहकर जीवन यापन करता है। यह सोचना भी बहुत कठिन है कि ये लोग किसी तरह की स्वास्थ्य सेवा जरूरत पड़ने पर पाते होंगे।

मध्यवर्ग के लिए भी फोर्टीज जैसे अस्पतालों में इलाज करवाना लगभग असंभव लगता है। वे उतने बड़े खर्च उठा नहीं सकते। यही कारण है कि प्रति वर्ष 6 करोड़ से भी ज्यादा लोग स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

और हम हांकते हैं कि हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा की बहुत ही उन्नत प्रणाली मौजूद है। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हमने जिस तरह से वह प्रणाली विकसित की है, उसके कारण देश की आबादी का 80 फीसदी उस उन्नत प्रणाली का लाभ लेने से वंचित रह जाता है। अनेक काॅर्पोरेट अस्पतालों को सरकार द्वारा नाममात्र की कीमत लेकर जमीन दी गई है। समाज के गरीब लोगों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना उनका कानूनी दायित्व बनता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं रहा है।

लुधियाना में दयानंद मेडिकल काॅलेज और हाॅस्पीटल है। वह एक निजी क्षेत्र का अस्पताल है। पिछले साल उसने एक सर्कुलर निकाला कि आईसीयू में भर्ती के लिए 20 हजार रुपये और वेंटिलेटर के लिए 30 हजार रुपये अग्रिम तौर पर लिए जाएंगे और उसके बाद ही मरीज की भर्ती की जाएगी। यह सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि कोई भी अस्पताल पैसे की कमी के कारण इलाज करने से मना नहीं कर सकता। बहुत हल्ला और हंगामें के बाद ही दयानंनद मेडिकल काॅलेज और अस्पताल ने अपना वह सर्कुलर वापस लिया।

गुड़गांव के फोर्टीज अस्पताल की उस घटना ने उचित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने की सरकार की विफलता को उजागर कर दिया है। जब केन्द्र सरकार स्वास्थ्य सेवा पर सकल घरेलू उत्पाद का मात्र पौन प्रतिशत ही खर्च करती हो, तो इसके अलावा और क्या हो सकता है। अभी जो सरकार की नीति है, उसके अनुसार इसका लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद का ढाई प्रतिशत खर्च करना है।

बीमारी कोई अपनी पसंद से नहीं लेता है। अनेक ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं, जिनके कारण व्यक्ति बीमार पड़ जाता है। ज्यादा मामलों में तो उन परिस्थितियों पर व्यक्तियों का कोई अंकुश ही नहीं रहता। इसलिए समाज को स्वस्थ रखने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है। इस समय सारा जोर व्यक्ति को स्वस्थ बनाए रखने पर होता है। इसलिए बीमारी के कारणों को दूर रखने की जगह व्यक्ति के खानपान पर ज्यादा ध्यान देने को कहा जाता है, लेकिन उस सामाजिक माहौल को बदलने की कोशिश नहीं की जाती, जिसके कारण अनेक किस्म की बीमारियां पैदा होती हैं।

इसलिए स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को पूरी तरह बदले जाने की जरूरत है।



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