गुजरात में पाटीदारों के आरक्षण के चले आंदोलन के नेता हार्दिक पट"/>

पाटीदार को आरक्षण संभव नहीं झूठे आश्वासन देना गलत

गुजरात में पाटीदारों के आरक्षण के चले आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल से आखिरकार कांग्रेस का समझौता हो ही गया। श्री पटेल का कहना है कि कांग्रेस ने आंदोलनकारियों की मांग मान ली है और यदि कांग्रेस की सरकार बनी, तो पाटीदारों को आरक्षण मिल जाएगा। लेकिन क्या वाकई यह संभव है? केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली, जो कानून के भी जानकार हैं, का कहना है कि ऐसा संभव ही नहीं है। आरक्षण से संबंधित आंदोलनों, मांगों, सरकार के आदेशों और न्यायालयो के निर्णयो के बारे मे जो जानकारी रखते हैं, उन्हें भी यह पता है कि वर्तमान संवैधानिक प्रावधानो के तहत पाटीदारों को आरक्षण मिलना संभव ही नहीं है।अदालतों ने एक बार नहीं, बल्कि अनेक बार आरक्षण की 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन करने वाले सरकारी आदेशों को निरस्त कर दिया है। अदालत ने आर्थिक आधार पर आरक्षण को भी खारिज कर दिया है। और अदालत में संपन्न जातियों को ओबीसी श्रेणी में आरक्षण देने के सरकार के आदेश को भी असंवैधानिक घोषित कर दिया है।

खुद हार्दिक पटेल और उनके नजदीकी सलाहकारों को भी पता होगा कि उन्हें आरक्षण नहीं मिल सकता और वे सिर्फ अपना चेहरा छिपाने के लिए यह दावा कर रहे हैं कि आंदोलनकारियों की मांगे पूरी हो जाएगी अथवा कांग्रेस ने उनकी मांग मान ली है। दरअसल आरक्षण की मांग करने वाले अब अनेक लोग इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि किन लोगों के लिए संविधान ने आरक्षण की व्यवस्था की है। 1990 के पहले मंडल आयोग को लागू करने की मांग करते हुए ओबीसी नेता और आंदोलनकारी यह कहते हुए उसकी मांग करते थे कि आरक्षण उनका संवैधानिक अधिकार है और वह उनको मिलना ही चाहिए। लेकिन जाट, मराठा, पटेल और कापूज, जो पिछले कुछ सालों से आरक्षण की मांग कर रहे हैं, उनको पता है कि आरक्षण उनका संवैधानिक अधिकार नहीं है, इसलिए वे यह दावा भी नहीं करते कि आरक्षण उनका संवैधानिक अधिकार है।

इसके बावजूद वे आंदोलन करते हैं और सार्वजनिक जीवन को अस्त व्यस्त कर सरकार पर दबाव बनाते हैं। चुनावी हार जीत की तस्वीर पेश कर भी वे सत्तारूढ़ पार्टियों को दबाव में लाने की कोशिश करते हैं। सरकारें उनके दबाव में आकर कुछ आदेश भी पारित कर देती हैं, लेकिन अदालत में जाकर वह आदेश अपनी वैधता खो देता है और इस तरह इन संपन्न किसान जातियो का आरक्षण पाने का सपना चकनाचूर हो जाता है।

गुजरात में पाटीदारों को आरक्षण देने का जो फाॅर्मूला है, उसके अनुसार पाटीदार सहित उन सभी जातियों के लिए, जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है, 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन कर आरक्षण का प्रावधान किया जाएगा। वैसे आंदोलनकारियों की मांग थी कि उन्हें ओबीसी की सूची के अंतर्गत आरक्षण दिया जाय। कांग्रेस इस तरह की मांगों को मानने के लिए कुख्यात रही है और इस तरह की मांग मानने के कारण ही उसका पतन भी हुआ है। इसका कारण यह है कि जो पहले से ओबीसी में हैं, उनका हक संपन्न जातियों को उनकी सूची में डालने से मारा जाता है। राजस्थान में यही हुआ है। जाटों को ओबीसी में कांग्रेस सरकार ने ही डाला था और उसके कारण वहां के ओबीसी की सीटों पर जाटों का कब्जा हो जाता है और अन्य कमजोर वर्गो को नुकसान हो जाता है। जाटों को ओबीसी बनाने का नतीजा यह हुआ है कि पहले से ओबीसी में शामिल गुज्जर एसटी में शामिल होने के लिए आंदोलन करने लगे।

बहरहाल कांग्रेस ने गुजरात में इस बार समझदारी दिखाई और पाटीदारों को ओबीसी में शामिल करने की मांग को सीधे नकार दिया। यदि कांग्रेस ऐसा नहीं करती, तो वह मतदान के पहले ही चुनाव हार जाती, क्योंकि बहुसंख्यक ओबीसी उसके खिलाफ हो जाते। कांग्रेस के लिए यह अच्छी बात है कि उसे अब समझ में आ गया है कि ओबीसी से छेड़छाड़ करना नुकसानदायक होता है, इसलिए उसने पाटीदारों को 50 फीसदी की सीमा को तोड़ते हुए आरक्षण देने का वायदा किया है।

लेकिन इस वायदे को भी पूरा नहीं किया जा सकता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सीमा तय कर दी है कि 50 फीसदी के अंदर ही आरक्षण दिए जाए। इसी आधार पर पिछले दिनों राजस्थान में गुज्जरों व कुछ अन्य घुमंतू जातियों को दिए गए आरक्षण को निरस्त कर दिया गया है। तमिलनाडु में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण है, लेकिन वह इसलिए संभव हुआ है क्योंकि वहां के आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूचि का संरक्षण प्राप्त है। गौरतलब हो कि 9वीं अनुसूची में डाले गए कानून की समीक्षा अदालत नहीं कर सकती, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह अधिकार एक आदेश के तहत प्राप्त कर लिया है और कहा है कि यदि कोई कानून संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बना हो, तो उसको भी न्यायालय निरस्त कर सकता है, भले ही वह नौवीं अनुसूची द्वारा संरक्षित हो।

फिलहाल तमिलनाडु का आरक्षण कानून सुरक्षित है और शायद 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण की सीमा करने से संविधान के मूल ढांचे पर असर नहीं पड़ता, इसलिए कांग्रेस ने कहा है कि वह गुजरात में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने वाले कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची से संरक्षित कर देगी। लेकिन यह कांग्रेस को और हार्दिक को भी पता होगा कि संविधान की नौवीं अनुसूची में किसी कानून को डालने के लिए संविधान का संशोधन करना पड़ता है और कांग्रेस के पास न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा में इतने सांसद हैं, जो संविधान को संशोधित कर दें। कांग्रेस क्या, सत्तारूढ़ भाजपा के पास भी इतने सांसद नहीं हैं कि वह संविधान में बदलाव बिना विपक्ष की सहायता से करे।

यानी कांग्रेस का यह वायदा कि यदि उसकी सरकार गुजरात में बनी, तो वह पाटीदारों व अन्य अनारक्षित जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर देंगे, वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के तहत संभव ही नहीं है और संवैधानिक प्रावधानों को बदलने की क्षमता कांग्रेस गुजरात विधानसभा का चुनाव जीतकर प्राप्त कर लेगी, ऐसी बात सोचना भी समझ से परे है।



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