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गुजरात का घमासान अपने घर में ही मोदी को मिल रही है शह

गुजरात का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए बहुत ही भारी पड़ रहा है। उनकी पार्टी की जीत आसान नहीं दिख रही है, भले ही खबरिया चैनलों द्वारा किए जा रहे सर्वेक्षणों में भाजपा की भारी जीत की भविष्यवाणियां की जा रही हों। अब तो उन सर्वेक्षणों को मीडिया जगत में भी गंभीरता से नहीं लिया जाता और कहा जाता है कि उनके पीछे पैसे का खेल होता है और जो पार्टियां पैसा खर्च कर सकती हैं और जो चैनलों को वित्तीय फायदा किसी भी तरीके से पहुंचा सकती है, उनके पक्ष में सर्वेक्षण के नतीजे बताए जाते हैं। कभी वे नतीजे सही होते हैं, तो कभी गलत और कभी कभी तो वे नतीजे चुनाव परिणामों को भी पलटने में भूमिका अदा करते हैं। पर अब जब उन सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता समाप्त हो रही है, तो उनके द्वारा नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता भी लगातार कमजोर होती जा रही है।

फिलहाल खबरिया चैनलों के सर्वेक्षणों के नतीजे भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में है, लेकिन पार्टी खुद जीत के प्रति आश्वस्त नहीं है। यही कारण है कि चुनाव के पहले कुछ ऐसा घटित हो रहा है, जो पहले नहीं हुआ करता था। सबसे पहली बात तो है कि चुनाव की तिथियों की घोषणा करने की। पिछले दो दशकों से हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनाव की तारीखें एक साथ घोषित की जाती रही हैं। दोनों राज्यों के चुनावी नतीजे भी एक ही दिन आते रहे हैं। तारीखों की घोषणा और नतीजे आने के बीच की अवधि में दोनों राज्यों में चुनाव की पूरी प्रक्रिया साथ साथ पूरी होती रही है।

लेकिन इस बार हिमाचल प्रदेश के चुनाव की तारीखें तो घोषित कर दी गई, लेकिन गुजरात के चुनाव की तिथि को घोषित होने से रोक कर रखा गया। चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही आदर्श चुनावी आचार संहिता प्रभावी हो जाती है और उसके बाद सरकार किसी तरह की लोकलुभावन नीतिगत या अमली जामा पहनाने वाली घोषणा नहीं कर सकती। गुजरात में इसीलिए चुनाव की तारीखों को रोककर रखा गया, ताकि वहां की प्रदेश और केन्द्र की सरकारें लोगों को कुछ ऐसी सौगात दे सकें, जिनसे मतदाताओं का ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल किया जा सके।

हालांकि निर्वाचन आयोग ने हिमाचल प्रदेश के चुनाव की तारीखों की घोषणा करते समय ही बता दिया था कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावी नतीजे एक दिन ही प्राप्त होंगे। चूंकि हिमाचल प्रदेश में मतगणना की तारीख 18 दिसंबर तय की गई थी। इसलिए यह भी साफ हो गया कि गुजरात में भी मतगणना 18 दिसंबर को ही होगी। इस तरह निर्वाचन आयोग ने एक नया रिकाॅर्ड बना लिया। उसने गुजरात चुनाव में मतगणना की तारीख तो दुनिया को बता दी, लेकिन वह यह नहीं बता पाया कि मतदान कब होंगे और नामांकन पत्र कब दाखिल किए जाएं।

यानी भारतीय जनता पार्टी ने अपनी कमजोरी का परिचय उसी समय दे दिया, जब उसकी केन्द्र और गुजरात की सरकार ने हिमाचल प्रदेश के साथ निर्वाचन आयोग को चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं करने दी। उसने यह काम तो अपने फायदे के लिए किया था, लेकिन इससे उसके पक्ष में माहौल बनना तो दूर, उसकी जीत के प्रति वे भी शंका व्यक्त करने लगे, जो उसे गुजरात में अपराजेय मान रहे थे। इसके कारण कांग्रेस के भी हौसेल बुलंद हुए और उसके नेताओं और कार्यकत्र्ताओं को लगने लगा कि वे चुनाव जीत सकते हैं।

भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के चुनावी तारीखो की घोषणा को विलंबित कर अपने खिलाफ माहौल बनाने का ही काम किया और इससे निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हुए। भाजपा की गुजरात में कमजोरी वहां हो रहे चुनावी अभियानो के दौरान भी देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने गुजरात में रोड शो का आयोजन किया, लेकिन उस आयोजन में लोग उनको देखने के लिए जुटे ही नहीं। रोड शो के दौरान पूरा का पूरा रोड खाली था। उससे जाहिर हो गया कि एक मात्र नरेन्द्र मोदी ही गुजरात में अपनी पार्टी की नैया पार लगा सकते हैं।

फिर तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनावी भाषणों का एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया है। इसमें दो मत नहीं कि अभी भी नरेन्द्र मोदी ही गुजरात में भाजपा को जीत दिलाने की क्षमता रखते हैं और उनके भाषण में अभी भी करिश्मा है, लेकिन सेबी द्वारा वहां के मुख्यमंत्री पर जुर्माना लगाने की घटना मोदी के अभियान को भी कमजोर कर रही है। मोदी का अपना अभियान तो अपनी जगह है ही। भाजपा को जीत दिलाने की सबसे बड़ी गारंटी नरेन्द्र मोदी ही हैं, लेकिन राहुल गांधी की सभाओं में उमड़ रही भीड़ एक अलग कहानी कह रही है। लोग राहुल गांधी की सभाओं मे उमड़ ही नहीं रहे हैं, बल्कि उन्हें ध्यान से सुन भी रहे हैं और उनके भाषणों से लोग प्रभावित होते भी दिखाई दे रहे हैं।

गुजरात चुनाव में जीत के प्रति भारतीय जनता पार्टी कितनी सशंकित है, इसका पता जीएसटी की दरों मंे की गई भारी गिरावट में भी देखा जा सकता है। करीब दो सौ आयटमों को ऊपरी स्लैब से गिराकर नीचे किया गया। यह भी अभूतपूर्व घटना थी, क्योंकि यह साफ तौर पर आदर्श चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन था। जब आचार संहिता प्रभाव में हो तो सरकारें इस तरह का निर्णय नहीं कर सकती और यदि निर्णय लेना अपरिहार्य हो जाता है, तो पहले निर्वाचन आयोग की अनुमति ली जाती है। आयोग भी मामले की अपरिहार्यता को समझते हुए निर्णय लेने की अनुमति आम तौर पर दे ही देता है। लेकिन जीएसटी मामले में सरकार ने आयोग से पूछा तक नहीं। निराशाजनक बात यह भी है कि आयोग ने इस पर किसी तरह की आपत्ति भी नहीं जताई है। लेकिन इससे तो इतना पता चलता ही है कि गुजरात में भारतीय जनता पार्टी जीत के लिए जबर्दस्त जद्दोजहद कर रही है और किसी भी प्रकार का कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती।

जाहिर है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राहुल गांधी ने उनके ही घर में उन्हें भारी शह दे रखी है और वे मात खाने से बचने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। जैसे जैसे मतदान की तारीखें नजदीक आएंगी, मोदी अपने तरकश के सभी तीरों का संधान करेंगे।

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