उत्तरी भारत में फैले स्माॅग ने जो समस्या पैदा कर दी है, वह बहुत बड़"/>

प्रदूषण निवारण का खर्च उठाना राज्य की जिम्मेवाी वायु प्रदूषण की कोई सीमा नहीं

उत्तरी भारत में फैले स्माॅग ने जो समस्या पैदा कर दी है, वह बहुत बड़ी चिंता का कारण होना चाहिए। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली इससे सबसे ज्यादा तबाह हो रहा है। चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा ही इससे त्रस्त है। नमी के साथ प्रदूषित कणों के मिल जाने के कारण यह समस्या पैदा हुई है। ये प्रदूषण मुख्य रूप से वाहनों द्वारा निकल रहे धुंओं से पैदा हो रहा है। इसके अलावा फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुंआ, सड़कों पर उड़ने वाली धूल और कचरा जलाए जाने के कारण भी प्रदूषण के पदार्थ भारी पैमाने पर निकलते हैं। धान फसल की कटाई के बाद खेतों में फसल की खंूटियों के जलाए जाने से भी काफी धुआं निकलता है। जब तापमान नीचे गिरता है तो प्रदूषण के ये सारे कण एक दूसरे से मिलकर भारी होते हैं और जमीन की ओर आने लगते हैं। दिल्ली सहित उत्तर भारत के बड़े भूभाग पर यही हो रहा है। हवा की गति मंे आई कमी और वर्षा के अभाव ने मामले को और भी गंभीर बना दिया है।

इसके कारण हवा की गुणवत्ता बहुत ही खराब हो गई है। सच कहा जाय तो इसने खतरनाक स्तर को प्राप्त कर लिया है। अमेरिका की वातावरण संरक्षण एजेंसी के अनुसार वायु गुणवत्ता सूचकांक को पांच मुख्य प्रदूषकों से तैयार किया जाता है। पहला प्रदूषक है जमीनी स्तर पर पाये जाने वाला ओजोन, दूसरा धूल-कण, तीसरा कार्बन मोनोक्साइड, चैथा सल्फर डाॅक्साइड और पांचवा नाइट्रोजन डायक्साइड। वायु गुणवत्ता सूचकांक को 0 से 500 के अंकों तक के लिए तैयार किया गया है। 0 से 50 तक का सूचकांक मनुष्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। 51 से 100 तक का सूचकांक स्वस्थ व्यक्ति के लिए तो पूरी तरह सुरक्षित है, लेकिन जो पहले से ही अस्वस्थ हैं, उन्हें कुछ परेशानी हो सकती है। 100 से 150 तक का सूचकांक स्वस्थ व्यक्ति के लिए आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है, लेकिन अस्वस्थ व्यक्ति के लिए यह पहले से ज्यादा खतरनाक है। 150 से 200 का सूचकांक स्वस्थ व्यक्ति को भी खतरा पैदा कर सकता है। 200 से 300 का सूचकांक तो स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी बहुत खतरनाक है। 300 से ऊपर का सूचकांक स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी मारक साबित हो सकता है। और यदि 500 से भी ऊपर का सूचकांक आ जाय, तो समझिए यह आपात्कालीन स्थिति है।

स्माॅग के कारण दम घुटने लगता है। इसका कारण होता है आसपास के वातावरण में आॅक्सीजन का अभाव। स्माॅग में मिला प्रदूषण का कण फेफडे़ और श्वास नली में जाकर समस्या पैदा करता है। इसके कारण कफ बनता है और गला भी खराब होने लगता है। स्माॅग में उपस्थ्ति ओजोन फेफड़े की क्रियाशीलता को कम कर देता है। इसके कारण गहरी सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। अस्थमा की बीमारी और भी भयानक होने लगती है। स्वस्थ लोगों को भी अस्थमा की शिकायत होने लगती है। ओजोन के कारण लोग एलर्जी का शिकार होने लगते हैं और उससे अस्थमा के दौरे पड़ने लगते हैं।

प्रदूषण के कण बहुत ही छोटे होते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि श्वसन तंत्र उन्हें फेफडे में जाने के पहले छान नहीं पाते। फेफड़े में जाकर वे फंस जाते हैं और वहां वे परेशानी पैदा करने लगते हैं। इन सबके कारण लोगांे की जिन्दगी छोटी होने लगती है। उनके दैनिक काम काज प्रभावित होने लगते हैं। उनकी उत्पादकता भी गिरने लगती है। बच्चे और वृद्ध लोगों के लिए ये बहुत ही ज्यादा खतरनाक होते हैं।

पंजाब और हरियाणा में धान की जलाई जा रही परालियों को इसके लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। आंशिक रूप से यह सच भी है और जलाने की उस प्रथा को खत्म भी किया जाना चाहिए। परालियों को जलाकर किसान खेतों को जोत देते हैं, जिससे खेतों की उर्वरकता प्रभावित होती है और वातावरण का नुकसान अलग से होता है। लेकिन किसानों को धान की कटाई के बाद गेहृं की बुआई की जल्दी रहती है और पराली जलाने से बेहतर उनके पास कोई विकल्प नहीं है। सरकार चाहे तो बेहतर विकल्प उपलब्ध करा सकती है, पर पंजाब सरकार कहती है कि उसके पास इसके लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। वह केन्द्र सरकार से पैसा मांग चुकी है, लेकिन केन्द्र सरकार कृषि को राज्य का विषय बताकर अपना पल्ला झाड़ चुकी है। पर वह भूल जाती है कि कृषि भले ही प्रदेश का विषय हो, लेकिन पर्यावरण केन्द्र सरकार का विषय है और पर्यावरण का प्रदूषण किसी सीमा से बंध हुआ नहीं होता।



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