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गोधरा काण्डः 11 को मिली फाँसी की सजा उम्र कैद में बदली

15 साल पहले 2002 में साबरमती एक्सप्रेस के कोच-एस- 6 में आग लगारक 59 कार सेवकों को पेट्रोल डालकार जिंदा फूंकने वाले 31 आरोपियों में से 11 को एसआईटी कोर्ट द्वारा दिये गये मैत की सजा को बदलते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया है। साथ ही जिन 20 आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी उसे कोर्ट ने बरकार रखा है।

गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डिब्बे में 27 फरवरी 2002 में आग के हवाले किया गयाथ। इस घटना में 59 लोगों की मौत के बाद गुजरात में दंगे भड़क गये थे। इस घटना में जितने लोग भी पकडे़ गये उन पर ‘पोटा’ लगाया गया था और गुजरात सरकार ने जांच के लिए एक आयोग की नियुक्ति की थी। सितम्बर 2004 में यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिटायर्ड जज यूसी बनर्जी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था। जिसने 2005 में अपनी शुरूआती रिपोर्ट में बताया कि ट्रेन ने लगी आग महज एक दुर्घटना थी। लेकिन 2006 में गुजरात हाईकोर्ट न यूसी बनर्जी के कमेठी के गठन को असंवैधानिक बता दिया।

इसी वर्ष नानावटी आयोग ने गोधरा काण्ड की जांच की रिपोर्ट सौंपी। जिसमें कहा गया कि 5-6 कोच को भीड़ ने पेट्रोल डालकर जलाया था। इस तरह इंसाफ की लडाई साल दर साल लम्बी खीचती चली गई। फरवरी 2011 में विशेष अदालत ने गोधरा काण्ड मे 31 लोगों को दोषी माना इनमें 11 को सजा-ए-मौत की सजा और 63 अन्य को रिहा कर दिया गया। 20 लोगों को उम्र कैद की सजा दी गई थी।

सभी आरोपी फैसले के खिलाफ गुजरात हाईकोर्ट गये। आज फैसले की आ गई हालांकि हैरानी की बात है कि गोधरा काण्ड के कुछ दोषी ऐसे भी है। जो अभी तक कानून की गिरफ्त से फरार है। जिन लोगों को कोर्ट ने इस मामले में रिहा किया। उनमें मुख्य आरोपी मौलाना उमरजी, गोधरा म्यूनिसिपैलिटी के तत्कालीन प्रेसीडेन्ट मो. हुसैन, कलोता, मो. अंसगी और उत्तर प्रदेश के गंगापुर के रहने वाले नानुमियां चौधरी शामिल है।



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