मुलायम सिंह यादव ने भाई शिवपाल सिंह यादव के साथ नई पा"/>

पुत्रमोह में मुलायम का दांव

मुलायम सिंह यादव ने भाई शिवपाल सिंह यादव के साथ नई पार्टी बनाने की सम्भावना को दर किनार कर बेटे अखिलेश यादव को आर्शीवाद देने का दांप एक बार फिर खेला है वहीं उनके साथ जुडे़ समर्थको को खुश करने के लिये उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे अखिलेश यादव के फैसले से सहमत नहीं हूँ। लेकिन वह मेरा बेटा है तो उसको मेरा आर्शीवाद स्वाभाविक हैं।

विधान सभा चुनाव के पहले पिछले साल सितम्बर में सपा के शीर्ष परिवार में कलहर सातह पर आ गई थी। तब अखिलेश यादव को प्रदेश अघ्यक्ष के पद से हटाकर चाचा शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। लेकिन नहले पर दहला मरते हुए इस साल जनवरी में अखिलेश यादव को पार्टी की बैठक बुलाकर पिता मुलायम सिंह के यादव को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा कर खुद को पार्टी का सुप्रीमों घोषित कर दिया था। इसके बाद चाचा शिवपाल यादव का कद भी छोटा कर दिया था। अखिलेश बाद में अपने बूते चुनाव में उतरे।

मुलायम ने पार्टी के प्रत्याशियों का प्रचार नही किया। इधर शिवपाल यादव ने भी नई पार्टी बनाने के संकेत दिया था। लेकिन विधान सभा चुनाव में दोनो गुट धराशायी हुये तब से शिवपाल इस बात का बराबर राग अलापते रहे कि पार्टी  की कमान मुलायम सिंह यादव को मिलनी चाहिये लेकिन अखिलेश के इरादे में कोई बदलाव नही आया। मुलायम सिंह यादव भी पिछले एक साल से तटस्थ बने रहें हालांकि शिवपाल सिंह मुलायम के सहारे अखिलेश को सबक सिखाने की जुगत में रहे पर मुलायम बेटे के खिलाफ जाकर कोई भी बड़ा कदम उठाने से हिचकिचाते रहे हैं।

लोहिया ट्रस्ट में परिवर्तन के बाद मुलायम ने जन पत्रकारों को बातचीत के लिये बुलाया तो इस बात के कयास लगाये जाने लगे कि मुलायम नई पार्टी का गठन कर सकते है। परन्तु नई पार्टी के गठन को विराम लगाते हुए उन्होंने शिवपाल यादव के मंसूबों पर पानी फेर दिया। बेटे को आर्शीवाद देने की बात कहकर एक बार फिर उनमें पुत्र मोह जाग उठा। उन्होंने इस इस मौके पर पार्टी को मजबूत करने की अपील भी की। मुलायम के इस दांव ने एक बार फिर छोटे भाई शिवपाल को चित्त कर दिया है।

प्रदेश में यादव समुदाय भी अखिलेश को अपना नेता स्वीकार कर चुका है। मुलायम के सभी करीबी नेता आजम खान, अहमद हसन से लेकर रामगोविन्द चैधरी, नरेश अग्रवाल और किरण नंद भी अखिलेश के पाले में आ चुके हे। आज सपा संरक्षक द्वारा कोई बड़ा राजनैतिक फैसला न लिये जाने से शिवपाल यादव का सियासी कद और छोटा हो गया। यहां वजह है कि शिवपाल के समर्थन भी धीरे-धीरे अखिलेश के खेमे में पहुंच रहे है।

मुलायम द्वारा कड़ा फैसला न लिये जाने से यह भी कहा जा रहा है कि मुलायम पुत्र मोह में भाई शिवपाल को राजनीति में ठिकाने लगाने जा रहे है। इसी राजनीति के तहत ही उन्होंने नई पार्टी बनाने का इरादा छोड़कर तटस्थ बने रहने का निर्णय लिया। अब इस दांव के नतीजे क्या होगें यह तो आने वाला कल क्या होगा।

 



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