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जर्नलिज्म विद पालिटिक्स काकटेल देश के लिए घातक

देश मे जब से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और केन्द्र मे एनडीए गवर्नमेंट ने काम शुरू किया शुरूआत से ही पत्रकारों की एक जमात इन्हे निशाने पर लेती रही है। 2014 - 15 मे असहिष्णुता का मुद्दा सुरसुराने लगा और 2016 तक विकराल रूप धारण कर चुका था। जिसे विपक्ष ने भी क्रिकेट के मैदान मे फील्डर की भांति कैच लपक लिया था कि शायद कुछ बात बन जाए।
 
परंतु देश की जनता सोशल मीडिया पर सक्रिय है और इन्हे बराबर जवाब मिलता रहा। कुछ लोगों की काली करतूत सामने आई। अब जब कर्नाटक मे गौरी लंकेश की हत्या हो गई तब फिर से एक बार असहिष्णुता के मुद्दे का राग अलापा जाने लगा है।
 
हालांकि पंजाब मे सरकार कांग्रेस की है और कानून व सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी भी उनकी बनती है। लेकिन तथाकथित बुद्धिजीवी हर बात मे नरेन्द्र मोदी, भाजपा और संघ को कोसने लगे हैं। इससे ही इनकी मंशा पर आम जनता को शक प्रतीत होने लगा है।
 
अभी प्रेस क्लब आफ इंडिया मे देशद्रोह के आरोपी कन्हैया कुमार और अनिर्बन दिखे। जहाँ कन्हैया कुमार ने फिर से ऊल जलूल वक्तव्य देकर यह साबित किया कि आप रिश्ते की अस्मिता भी तार तार कर देते हैं। वहीं जनता का मानना है कि पत्रकार समूह के बीच इन चंद राजनीतिज्ञ का क्या काम था ? ऐसा प्रतीत हुआ कि निष्पक्ष कहलाने वाले कुछ पत्रकार चंद राजनीतिज्ञ और एक विशेष विचारधारा के प्रति काम करते हैं। जिसे ये बुलंद आवाज कहते हैं असल मे वो आवाज तोते वाली होती है जो राजनीतिक महकमे द्वारा पढ़ाई जाती है और फिर पत्रकारिता के चंद तोते तोतलाने लगते हैं।
 
अगर इन्हे पत्रकार के सम्मान कि इतनी ही फिक्र थी फिर जेएनयू की पूर्व उपाध्यक्ष शहला राशिद ने जब एक पत्रकार का अपमान किया तब पत्रकारिता के सम्मान हेतु जंग लड़ने वालों की बुलंद आवाज कहाँ गिरवीं रख दी गई ? पत्रकारों के आंगन मे ही एक मामूली सी छात्र नेता पत्रकारिता की आवाज को दबाने का काम करती है फिर भी आप अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं तो स्वयं मे चिंतन करना चाहिए। कुलमिलाकर इस पूरे प्रकरण का पत्रकारिता के जहाज मे बैठकर राजनीतिक प्रयोग किया जा रहा है। जिसके परिणाम भविष्य मे देखने को मिलेगे कि आखिर इनके मंसूबे साकार भी होते हैं या नहीं ?

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