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दोहरी चुनौती से रूबरू नई मोदी सरकार, प्रचंड बहुमत के बाद अब उम्मीदों का पहाड़

अर्थव्यवस्था को पुन: तीव्र विकास के पथ पर अग्रसर करना और युवाओं के लिए रोजगार सृजन करना प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटी नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। उद्योग-कारोबार को गतिशील करने के लिए मोदी सरकार को आम जनता की उपभोग और क्रयशक्ति बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ना होगा। अर्थव्यवस्था के लिए आर्थिक तथा वित्तीय नीतियों में निरंतरता जरूरी होगी। ऐसे में ऋण बाजार के दबाव को दूर करना मोदी सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के एजेंडे में शामिल होना चाहिए। सरकार को ऐसी नीति भी बनानी होगी और उसे सुचारु तरीके से कार्यान्वित करना होगा ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मुहैया कराया जा सके...

रोजगार के मोर्चे पर भी चिंताजनक तस्वीर है। श्रम मंत्रलय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 2017-18 में बेरोजगारी दर कुल उपलब्ध कार्यबल का 6.1 फीसद रही, जो 45 साल में सर्वाधिक है। अर्थव्यवस्था के समक्ष इन्हीं स्थितियों से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नेपांच जून को दो कैबिनेट समितियों का गठन किया। इन समितियों को रोजगार सृजन व निवेश बढ़ाने के उपाय तलाशने का जिम्मा सौंपा गया है। पहली समिति विकास दर व निवेश बढ़ाने पर काम करेगी और दूसरी समिति रोजगार तथा कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करेगी।

 

 

मोदी सरकार को ऐसी रणनीति अपनानी होगी, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं की खपत की आकांक्षाओं और वित्तीय बचतों के बीच संतुलन बना रहे। आरबीआइ द्वारा ब्याज दरों में और कटौती करने तथा अर्थव्यवस्था में और अधिक नकदी का प्रवाह बढ़ाने की जरूरत है। रोजगार सृजन के मोर्चे पर जहां मनरेगा जैसी योजनाएं प्रभावी होंगी, वहीं स्वरोजगार और उद्यमिता के लिए मुद्रा योजना को और गतिशील करना होगा। सरकारी क्षेत्र में रिक्त पदों की पूर्ति हेतु शीघ्रतापूर्वक कदम उठाने होंगे। साथ ही कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करना होगा।

 

 

किसानों की खराब हालत भी स्पष्ट दिखाई दे रही है, लिहाजा सरकार को कृषि तथा किसानों के कल्याण के लिए नए रणनीतिक कदम उठाने होंगे। जरूरी होगा कि सरकार निजी क्षेत्र को कृषि के साथ जोड़ने की कार्ययोजना बनाए। साथ ही खाद्य प्रसंस्करण का दायरा भी बढ़ाया जाए। मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में कई अहम सुधार किए हैं, जिन्हें अब तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है। अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में पेट्रोलियम उत्पादों को लाना जरूरी दिखाई दे रहा है। जीएसटी के तहत चार की जगह तीन स्लैब किया जाना उपयुक्त होगा।

भले ही इस वक्त विभिन्न आर्थिक चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं, लेकिन देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञों का मत है कि नई मोदी सरकार के लिए इन चुनौतियों का सामना करना आसान इसलिए होगा, क्योंकि आम चुनाव में मिली प्रचंड जीत के बाद इस सरकार में समयानुकूल और साहसिक फैसले लेने की बहुत गुंजाइश है। अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि भले ही वर्ष 2018-19 में भारत की विकास दर कुछ गिरी है, लेकिन नई सरकार द्वारा आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों से भारत विकास की डगर पर तेजी से आगे बढ़ता नजर आ सकता है। अर्थविशषज्ञों का यह भी कहना है कि बेहतर निवेश व निजी खपत के दम पर अगले तीन साल तक भारत 2018-19 की घटी हुई विकास दर की दशा को बदलते हुए दुनिया की सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था बनने की संभावना रखता है।

 

 

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