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मसूद पर बैन: खत्म होगी डेडलाइन, ले‎किन चीन ‎का रुख साफ नहीं

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों और संयुक्त राष्ट्र के अन्य सदस्य देशों के समर्थन से भारत आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के हेड मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव बढ़ाएगा। इसके लिए भारत उस दस्तावेज का भी उपयोग कर सकता है, जिसमें अल कायदा की शुरुआत करने वाले ओसामा बिन लादेन के अजहर को सहायता देने का सबूत है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में अकेला चीन अजहर पर प्रतिबंध का 13 मार्च की डेडलाइन से पहले समर्थन करने को लेकर कोई जवाब नहीं दे रहा। अजहर को संयुक्त राष्ट्र की ओर से वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए उसके अल कायदा से संबंधों को स्थापित करने की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र में 2011 में एक दस्तावेज जमा किया गया था, जिसमें अजहर के ओसामा के साथ संबंधों की जानकारी थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2001 में जैश को ओसामा बिन लादेन, उसके आतंकवादी संगठन अल कायदा और अफगानिस्तान में तालिबान से जुड़ा बताया था। सुरक्षा परिषद के दस्तावेजों में इस बात की पु‎ष्टि की गई है कि वह अजहर को जैश का संस्थापक मानती है। इसके बावजूद पिछले कई सालों से अजहर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने में सुरक्षा परिषद नाकाम रही है।

इस मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अक्टूबर 2011 में जैश पर एक दस्तावेज में कहा था कि पाकिस्तान में मौजूद यह कट्टरपंथी संगठन मसूद अजहर ने 1999 में हाइजैक की गई इंडियन एयरलाइंस की उड़ान पर बंधकों के बदले में अपनी रिहाई के बाद बनाया था।

इसके साथ ही सुरक्षा परिषद ने 2011 में यह भी माना था कि अजहर ने जैश की शुरुआत लादेन, तालिबान और कुछ अन्य कट्टरपंथी संगठनों की मदद से की थी। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद का ध्यान इस ओर आकर्षित कर रहा है कि जैश पर संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगाया है, लेकिन उससे संस्थापक को बैन नहीं किया जा रहा।

अजहर पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के बहावलपुर में कौसर कालोनी में रहता है। सुरक्षा परिषद का यह मानना है कि लादेन, अल कायदा और तालिबान के साथ संबंध होने के कारण अजहर पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। जनवरी 2016 में पंजाब के पठानकोट में भारतीय वायु सेना के बेस पर जैश के हमले के बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्र की ओर से अजहर पर प्रतिबंध लगाने को लेकर अपनी कोशिशें तेज कर दी थीं। इसमें भारत को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस का भी समर्थन मिला था, लेकिन चीन ने इसका विरोध किया था। 
 

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