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भारतीय संवैधानिक इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जज मीडिया "/>

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की स्वयत्ता पर नहीं चलाया जुबानी हंटर फिर भी विपक्ष अब्दुल्ला दीवाना

भारतीय संवैधानिक इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जज मीडिया के समक्ष प्रस्तुत होकर जनता की अदालत में पेश हुए हैं। अब तक जनता विभिन्न अपराध में न्याय हेतु इनकेे समक्ष प्रस्तुत होती रही है।

यह अकल्पनीय दृश्य है। असल में जज को भगवान की भूमिका में भारतीय न्यायिक व्यवस्था में माना जाता रहा है। न्यायालय ही वो जगह है, जहाँ अपवाद स्वरूप जन्मा अविश्वास भी विश्वास में ही तब्दील रहा।

एक लंबे अर्से बाद कांग्रेस सत्ता से ना सिर्फ बेदखल हुई, बल्कि लगातार हार का सामना कर रही और लोकसभा में डबल चार के फेर में फंसी कांग्रेस सत्ता वापसी की शुरुआत लोकसभा चुनाव के बाद से कर रही है। इसकी कवायद असहिष्णुता के मुद्दे से बड़ी शुरुआत के रूप में हुई। अब तक सिर्फ पंजाब में सरकार बनाने में सफल व गुजरात बढ़िया प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस बेशक केन्द्र की सत्ता में ना हो, किन्तु देश की अफसरशाही से लेकर साहित्य के क्षेत्र तक उसकी जड़े पीपल के वृक्ष की तरह मजबूत हैं।

चार जजों की नाराजगी का कारण भले चीफ जस्टिस के निर्णयों से असहमति को लेकर हो और यह पूर्णतया सच हो। लेकिन जिस प्रकार से प्रेस कांफ्रेंस हुई, वह बात सोशल मीडिया से लेकर आम जनता को भी पच नहीं रही। जानकारों का मानना है कि इन्हें सर्वप्रथम राष्ट्रपति से मुलाकात मामले की जानकारी देनी चाहिए थी। परंतु इनके द्वारा ऐसा कोई कदम ना उठाकर मीडिया ट्रायल पर आना बड़ी कवायद का हिस्सा मानाा जा रहा है।

तमाम सोशलिस्ट का कहना है कि देश के सबसे बड़े मुद्दे को पीछे धकेलने की बड़ी साजिश का हिस्सा भर है। गुजरात चुनाव के समय कांग्रेस के नेता व वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने राम मंदिर सुनवाई आगामी लोकसभा चुनाव तक टालने की पेशकश कर चुके हैं। जिसे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने अस्वीकार कर दिया था। एक और मामला 1984 सिक्ख दंगो का है। जिसकी पुनः जांच करने हेतु फाइल खोल दी गई है। यह भी कांग्रेस को एक कदम और पीछे धकेलने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। ऐसे अनेक मामले हैं, जो भविष्य में कांग्रेस की सेहत के लिए सही नहीं है।

इन चारों जजों के संबंध कांग्रेस विचारधारा व उनके बड़े नेताओं से मधुर होना बताया जा रहा है। जब कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए कोई और मुद्दा नहीं मिल रहा तब इस तरह के मुद्दे उछालकर ही जनता दिग्भ्रमित किया जा सकता है। यही कारण रहा कि कांग्रेस ने आनन फानन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डाली, जबकि सरकार ने पूरे मुद्दे से किनारा करना ही बेहतर समझा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की स्वयत्ता पर जुबानी हंटर चलाने की कोशिश नहींं की फिर भी जजों के बहाने केन्द्र सरकार को विपक्ष ना सिर्फ घेरने की कोशिश कर रहा है। बल्कि रंगे सिंयार की तरह वही अलाप जारी है कि लोकतंत्र खतरे में है। बिना इमर्जेंसी लागू किए ही लगातार अप्रत्यक्ष इमर्जेंसी लागू होने का जुमला सच साबित करने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि इस प्रकार के सिगूफों का जनता पर ऐसा असर पड़ता दिखता नहीं कि वे कुछ परिवर्तन का मन बना सके। चुनाव भी अभी नजदीक नहीं हैंं, फिर भी आने वाले वर्ष के लिए तैयारी जोरों पर है। वहीं बड़े वकील व पूर्व जस्टिस इन चार जजों पर महाभियोग चलाने की बड़ी बात कहते नजर आए। जजों द्वारा इस प्रकार की प्रेस कांफ्रेंस सुप्रीम कोर्ट की अवमानना व न्याय से भरोसा उठाने जैसाा धतकर्म बताया जा रहा है। असल में यह शुरूआत भर है, सत्ता के तराजू में अभी बहुत कुछ तौलना शेष है कि पलड़ा किसका भारी होगा। सत्ता के खेल में साहित्यकार से लेकर न्याय इंसानी भगवान का कूदना महसूस होना भविष्य के लिए घंटी नहीं घंटा बजने का संकेत है।

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