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अब और अबू मन्नान नहीं चाहिए तो !

कहते हैं शिक्षा जीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। शिक्षा ही वो अस्त्र शस्त्र है, जिससे जिंदगी में आई हर समस्या का निदान किया जा सकता है। पीढ़ियां शिक्षित होगीं, तो वे कुमार्ग पर नहीं रहेंगी। शिक्षित व्यक्ति भटकता नहीं है। शिक्षित व्यक्ति में अपराधी बनने के अवसर समाप्त हो जाते हैं। किन्तु अब यह अर्द्धसत्य सा महसूस होने लगा है। कहीं ना कहीं शिक्षा की नींव या कमजोर हुई है अथवा अपने मार्ग से भटक सी गई है। अपितु शिक्षा के घर में भ्रामकता और भटकाव का वास हो गया है।
एक शोधार्थी छात्र अबू मन्नान आतंक के रास्ते पर चल पड़ता है। इसके लिए दोष उसके धर्म और परिवार से ज्यादा शिक्षा के धर्म को जाता है। अब शिक्षा का धर्म संस्कारी ढंग से ना निभाकर सरकारी ढंग से निभाया जाता है। जहाँ किताब और कोर्स का नजरिया व्याप्त हो गया है। शिक्षक वेला के समय पर कोर्स पूर्ण कराने एवं उतनी ही जानकारी देते हैं, जितनी कि किताब कहती है। गुरू और शिष्य के रिश्ते में भूमि क्षरण की तरह शनैः शनैः क्षरण हुआ है।

माता-पिता की देखरेख से निकल कर छात्र गुरू की देखरेख में हो जाता है। इस वक्त उसे प्रेरणा की बेहद आवश्यकता होती है। प्रेरक व्यक्तित्व व प्रेरक कहानी से सन्मार्ग पर लगाया जा सकता है। किन्तु कक्षाओं से गणित के सूत्र के अलावा जिंदगी के सूत्र विलुप्त होते जा रहे हैं। युवावस्था में उम्र बढ़ने के साथ बच्चों और अभिभावक के मध्य दूरियां लंबाकार होने लगती हैं। जिसके फलस्वरूप मन में अनेक प्रकल्प घटने से जवानी का खून गलत दिशा में उबाल मारने लगता है।

पिछले वर्ष ऐसे ही जेएनयू से भारत तेरे टुकड़े होगें के नारे सम्पूर्ण देश की दीवारों को चीरती फाड़ती देशभक्त आमजन के सीने पर दर्द दे रहे थे। ये कौन थे ? महज सवाल नहीं जवाब सभी को मालूम है कि इसी मातृभूमि की लहलहाती वो फसलें थीं, जिनसे हर माँ ने देशभक्ति की उम्मीदें ही नहीं पाल रखीं होगीं, बल्कि इस मातृभूमि की एकता अखंडता के रखवाले माना रहा होगा। परंतु युवावस्था के इन बच्चों में ऐसी विषाक्त सोच का जन्म कब और कैसे हुआ व इसकी शुरुआत कब हुई ?

मंथन इस बात पर होना चाहिए कि विश्व का सबसे ज्यादा युवाओं वाले देश के युवा सन्मार्ग से कुमार्ग की ओर क्यों जा रहे हैं ? ऐसी कौन-सी ताकते हैं, जो इन युवाओं को भेड़िये की भांति जाल बिछाकर कबूतर वाला शिकार कर रहे हैं। युवा कबूतर वाला मन दाना चुनकर भूख मिटाने हेतु जाल में फंसता जा रहा है। लेकिन वो चूहा कब मिलेगा, जो इस जाल को कुतर कर आजादी दिला सके और भेड़िया हाथ मलता रह जाए !

देश भर में चंद नाम प्रकाश में हैं, जिन पर देशद्रोह का मामला प्रकाश में आया। वो जगह किसी गाँव में नहीं बल्कि देश की राजधानी में है। तमाम बड़े शहरों एवं बड़े महाविद्यालय व विश्वविद्यालय में ऐसा हो रहा है। बीते एक साल में बनारस से लेकर दिल्ली तक उन्माद से अछूते नहीं रहे, अब अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से एक छात्र का आतंकी बनना युनिवर्सिटी के अंदर के विषाक्त माहौल का दर्पण समाज व सरकार के समक्ष प्रस्तुत हो रहा है। जहाँ जहरीले तत्व सक्रिय हो चुके होगें। जिस छात्र के नाम के आगे डाक्टर लिख जाना चाहिए, उसी के नाम के साथ आतंकी जुड़ गया।

ये बहस का विषय नहीं, अपितु शर्म की बात है। हमारी मातृभूमि के आंचल से कोमल मन के युवा का अपहरण कर लिया जा रहा है और हम उलझ जाएंगे लंबी चौड़ी बहस में। तमाम तरह के लोग हैं, जो मजहब और धर्म के नाम पर स्वसुख प्राप्त कर लेंगे। परंतु इतना नहीं सोच सकते कि आतंकी निर्दोष व मासूमों को सिर्फ मौत के घाट नहीं उतार रहे, बल्कि हमारी सबसे बड़ी हार यह है कि वे हमारे ही बेटे को आतंकी बना ले रहे हैं। उसकी मानसिकता में संक्रमण भरने के लिए जगह हम देशवासियों ने दी। यहाँ की सरकार, यहाँ का सिस्टम दोषी है। ये शासन प्रशासन के लोग सुप्तावस्था में महसूस होने लगे हैं, तनिक भी जागरूक नहीं कि हम इतने सुदृढ हो जाएं कि हमसे हमारा ही सपूत छीनकर कुपूत बनाकर हमें ही कोई चुनौती ना दे सके।

ये आतंकियों की बड़ी कामयाबी कही जाएगी कि लगभग सवा करोड़ भारतीय का स्वांग भरने वालों, लो तुमसे तुम्हारा ही एक अंग उठाकर तुम्हारी ही मौत का मानव बम बनाकर वापस भेज रहे हैं। चूंकि हम भौतिक विकास में उलझे हैं, आए दिन पूंछते हैं कि विकास जन्मा क्या ? देश भर के राजनीतिकों और रूचिकर लोगों ने इस सवाल की झड़ी लगा दी। लेकिन कोई इस बात के लिए चिंतित नहीं दिखाई सुनाई देता कि आने वाली पीढ़ियों का मानसिक विकास कैसे होगा ? इस बात की जिम्मेदारी कौन लेगा ? इसका मंत्रालय होगा या नहीं, बहरहाल भ्रष्टाचार का भय उसमें भी बना रहेगा। फिर भी हमें याद करना होगा कि ये भूमि स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरूषों की मातृभूमि है। अब्दुल हमीद जैसे वीर सैनिक की शहादत से रक्तरंजित मातृभूमि है। ऐसी गौरवशाली धरती से कोई आतंकी बने, इससे पहले ही चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।

असल में समाज और सरकार के रूप में हम मार्ग भटक रहे हैं। इस बात की बहुत बड़ी आवश्यकता है कि मानसिक विकास का क्रम रूकना नहीं चाहिए। परिवार, समाज और स्कूल से संस्कार की शिक्षा इस तरह जारी रहे कि हमारी युवा पीढ़ी सकारात्मक मानसिक विकास के सफर में बढ़ते हुए अनवरत उन्नति करती रहे, ताकि उन पर बुरी ताकतों का प्रभाव नगण्य हो जाए। देश भर के आध्यात्मिक व जागरूक नागरिकों सहित सरकार को भी इस दिशा में चिंतन करना चाहिए। सकारात्मक आध्यात्मिक सोच से समृद्ध समाज ही स्वयं को चंद बुरी ताकतों से बचाकर रक्षित रखे रख सकता है।

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