< बुंदेलखण्ड में मनुष्यों और पशुओं का संघर्ष Hindi News - Breaking News, Latest News in Hindi, हिंदी में समाचार, Samachar - Bundelkhand News बुंदेलखण्ड जो लगातार सूखे से ग्रस्त रहा और किसान कर्"/>

बुंदेलखण्ड में मनुष्यों और पशुओं का संघर्ष

बुंदेलखण्ड जो लगातार सूखे से ग्रस्त रहा और किसान कर्ज से लदे रहे। सूबे की योगी सरकार की कर्ज माफी योजना से लघु सीमांत किसानों को थोड़ा लाभ हुआ और राहत मिली। वहीं बड़े किसान कर्ज माफी योजना से वंचित रह गए। जबकि संकटग्रस्त वे भी रहे हैं।

इस वर्ष औसतन वर्षा ठीक ठाक हुई। जिससे अच्छी फसल होने की उम्मीद की जाने लगी। वहीं जिला चित्रकूट में औसत से कम बारिश का मुद्दा साँसद भैरों प्रसाद मिश्र ने पहले भी उठाया था। अब हालात ऐसे हैं कि अन्ना पशु किसानों के सबसे बड़े दुश्मन बनकर सामने आए। एक समय यही पशु किसान मित्र हुआ करते थे। किन्तु बढ़ते मशीनीकरण से पशुओं की उपयोगिता नगण्य होने लगी। वहीं दस पंद्रह वर्ष के सूखे से पशुओं को भूसा चारा आदि की बेहद कमी होने लगी तथा पशु तस्करी पर लगाम लगने से पशु सड़क पर आवारा हो गए।

अब संकट इतना गहरा गया कि खड़ी फसल को अन्ना पशु नुकसान पहुंचाने लगे। जिससे उपजी फसल नष्ट होने लगी। यह पशुओं द्वारा किसानों को सूखे की तरफ ढकेलने का क्रम कहा जाए अथवा पशुओं द्वारा अपना हक लेने की बात कही जाए फिर भी उनका यह हक मनुष्यता को मृत्यु की तरफ ढकेलने वाला है।

ये पशु और मनुष्य का अघोषित संघर्ष व युद्ध कहा जा सकता है। पशु मनुष्यों से अगर भोज्य पदार्थ प्राप्त करते हैं तो बदले में श्रम आदि के माध्यम से मनुष्यता को फलने फूलने के लिए बहुत कुछ प्रदान करते हैं। वहीं गाय का महत्व अत्यधिक है। दुधारू पशु इंसानों को प्रोटीन प्रदान कर संजीवनी सिद्ध होते हैं।

समय के साथ परिवर्तन होने से पशुओं का महत्व मनुष्यों के मध्य कम होने लगा। पूर्व में किसान बैल द्वारा जुताई बुआई की प्रक्रिया अपनाते थे और भूसे आदि की जिम्मेदारी भी किसानों की होती थी अर्थात पशु के पेट के मालिक किसान होते थे। यह काम लेने के बदले की जिम्मेदारी होती थी। शनैः शनैः ट्रैक्टर का उपयोग बढ़ा और बैल की उपयोगिता नगण्य होने से किसानों के खूंटे वीरान होने लगे तो आज सड़कें और खेत इनकी वजह से भरे भरे नजर आते हैं।

जिस प्रकार मनुष्य अपनी भूख से तृप्ति हेतु रोजी रोजगार अपनाता है और पलायन करता है अथवा मार्ग भटक कर अपराध की ओर चल पड़ता है। अन्ना पशुओं के भी यही हाल हैं। किन्तु ये बेजुबान जानवर अपना दर्द कैसे कहें ? बल्कि ये समझने की बात है। अथवा वे स्लाटर हाऊस में काट दिए जाएं। इसके सिवाय कोई विकल्प दिखता नहीं है।

एक बार फिर से खेती की शुरुआत का माध्यम इन्हें शायद ही कोई बनाए। मशीनी युग में शीघ्रता के अभ्यस्त हो चुके लोग धैर्य भी खो चुके हैं। इसलिये अब यह असंभव सी बात है। अब अन्ना जानवर से निजात पाने के लिए संसद की दीवारें कंपकपाने लगी हैं। हाल ही में बुंदेलखण्ड के बांदा साँसद भैरों प्रसाद मिश्र ने किसानों की तरफ से बड़ी भयावह समस्या के रूप में इसे प्रस्तुत कर राष्ट्र का ध्यान आकर्षित किया है।

उन्होंने अपने वक्तव्य में पशु आश्रय योजना को सतही तौर पर शुरू करने की पेशकश की है। इससे पूर्व केन्द्र सरकार व राज्य सरकार ने संयुक्त प्रयास से पशु आश्रय योजना के तहत अन्ना पशुओं के संवर्धन हेतु कार्य किए जाने की नीति बनाई थी। किन्तु धरातल पर इस योजना का लाभ अब तक पशु और किसानों को नहीं मिला। जिससे अब किसान सड़क पर उतरने लगा है। किसान स्वयं की जिम्मेदारी को ना महसूस करते हुए सारा दारोमदार शासन प्रशासन पर थोपते जा रहे हैं और अब सरकार ही कुछ करतब दिखा इस समस्या से निजात दिला सकती है। अन्यथा बुंदेलखण्ड सहित सम्पूर्ण यूपी का किसान अन्ना पशुओं की वजह से भूखों मरेगा फिर भी पशु भूखे ना मरें इस बात की संवेदनशीलता अगर समाज में व्याप्त होती तो यकीनन आज इस भयावहता से किसानों को दो चार नहीं होना पड़ता।

हमें इंसानियत के नाते पशुओं की भूख के बारें में भी सोचना चाहिए। बहरहाल सरकार इस परिप्रेक्ष्य में जरूर कदम उठाए। सनद रहे कि इन हालात पर बन रही योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट ना चढ़ जाए। सपा शासनकाल में भूसे के टेंडर हुए और अगर जाँच कर ली जाए तो बहुत बड़ा भूसा घोटाला जन जन के समक्ष आ जाएगा।

इस प्रकार की समस्या से निपटने के लिए सामाजिक प्रयास बेहतर होते हैं, परंतु समाज अपनी ही जिम्मेदारी से जब मुकरता है तब ऐसी विकराल परिस्थिति प्रकट होती है। समाज व सरकार का संयुक्त इमानदार प्रयास ही संवैधानिक सामाजिक नजरिए से इस समस्या से निजात दिला सकता है अन्यथा कहीं ना कहीं किसी ना किसी का पेट मारा जाना सुनिश्चित है। वो पशु की भूख हो अथवा किसानों की भूख हो, जब अपना प्रमुख अंग दर्द में होगा तो भूख की तृप्ति महसूस नहीं हो सकती है।

बहरहाल बाँदा साँसद का प्रयास किसान हित में बेहतर है फिर भी पशुओं के हित के बारे में सोचना हमारा ही कर्तव्य है, भले पशु आधारधारी, वोटर कार्डधारी और राशनकार्डधारी नहीं हैं, किन्तु इस प्रकार की अहर्ता रखने वाले जनेऊधारियों की तरह पशुओं का भी उतना ही हक है जितना की मनुष्यों का है। अतएव हमें समस्या के मूल पर भी विचार करना होगा तब जाकर कोई योजना हकीकत में साकार हो सकती है।

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