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सामाजिक विकृतियां खत्म होते ही नशे जैसी बुराई का अंत हो सकता है

अक्सर समाज के किसी कोने से शराब बंदी की आवाज उठती रहती है। यहाँ तक की किसी प्रकार का नशा ऐसा दुर्व्यसन है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति को मानसिक शारीरिक हानि का सामना करना पड़ता है। नशे से अनेक प्रकार की बीमारी जनित होती हैं। देश के गुजरात और बिहार जैसे राज्य में शराब बंदी लागू है। गुजरात अहिंसा की भूमि मानी जाती है। बल्कि सम्पूर्ण देश ही अहिंसा के पथ पर चलने वाला है। असल में समाज से नशे की बंदी महत्वपूर्ण है। लेकिन इससे पहले विचार करना होगा कि आखिर लोग नशे की तरफ मुड़ क्यों जाते हैं ? ये महज सवाल नहीं बल्कि जवाब भी समाज में व्याप्त तमाम प्रकार की विसंगतियां व विकृतियां हैं।

नशे को अंगीकार करने का एक बड़ा कारण अवसाद है। जो परिवार व रिश्तों के बीच से ज्यादातर युवाओं और बुजुर्गों को गृहण में ले लेता है। फिर इस अवसाद से क्षणिक आजादी हेतु लोगों की उंगलियों में सिगरेट फंसी नजर आती, जो यकीनन जिंदगी को फंसाती जाती है। वहीं हथेलियों में वाइन का पैग नजर आने लगता है। प्रत्येक नशाखोर इस तथ्य से वाकिफ है कि वो जो कुछ भी कर रहा है। उससे मानसिक शारीरिक नुकसान है। यहाँ तक कि असमय मृत्यु के गाल में समा जाएगा। फिर भी नशा करता है तो चिंता का विषय सिर्फ सरकार का नहीं बल्कि समाज का अधिक है। समाज में कहाँ और किससे कितनी चूक हो रही है कि प्रेम व संवेदना के अभाव में इंसान अपनी ही मृत्यु से भयभीत नजर नहीं आता। स्वयं को नशे के जरिए मृत्यु का उपहार स्वीकार करने को तैयार दिखता है।

इसलिये समाज को बड़ी मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता महसूस होती है। जिस दिन तमाम प्रकार की विकृतियां दूर हो जाएंगी। उस दिन सरकारी फरमान वाली बंदी की आवश्यकता नहीं रह जाएगी बल्कि मानसिक सहमति से नशा छूट जाएगा या इस ओर किसी को सोचने की जरूरत नहीं रह जाएगी। नशे की बंदी वो बेडियां भी बन सकती हैं जो मानसिक आघात को जन्म देगी। अभी बहरहाल जिंदगी में कुछ तो आशाएं रहती हैं। भले जरिया नशा हो। सामाजिक संवाद और संवेदना की बेहद कमी के चलते नशे का प्रदूषण व्याप्त है। अतएव समाज सामूहिक प्रयास से ऐसी लत से निजात पा सकता है। परंतु सामाजिक कर्णधारों का चिंतन इस ओर हो सके तब ऐसा संभव हो सकता। फिर भी इस प्रयास में वर्षों व्यतीत हो सकते हैं।

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