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खास एजेंडे वाली पत्रकारिता बेहद खतरनाक

पत्रकारिता कलम और जुबान से होती है और उसी कलम व जुबान में जब संदेह की सोच जन्म लेने लगे तो खास एजेंडे वाली पत्रकारिता का विकराल चेहरा उभरकर मुखरित प्रतीत होने लगता है। जिसे एक मायने में पत्रकारिता के गिरते स्तर की शुरूआत कहा जा सकता है। हाल ही में गुजरात चुनाव का कवरेज कर रहे एक खास चैनल के पत्रकार की भाषा बड़ी जजमेंटल इसलिए प्रतीत हुई कि बिना किसी व्यक्ति विशेष के बयान के वे कह रहे थे कि पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल की रैली में सामान्य वर्ग के एवं मुस्लिम समुदाय के लोग भी आने लगे हैं। इसमें दो बाते हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय के आने की बात उनकी अलग पहचान से पुष्टि की जा सकती फिर भी जिस रैली स्थल पर वह दिख रहे थे। वास्तव में बतौर दर्शक ऐसा नहीं देख सका कि वहाँ कुछ मुस्लिम हो सकते हैं ! सामान्य वर्ग अब जातिवादी आरक्षण का तनिक भी समर्थन करता हुआ इसलिये प्रतीत नहीं होता कि उनकी भी माली हालत बेरोजगारी की वजह से खराब हो चुकी है और सरकारी रोजगार मिल पाना असंभव सा महसूस होने लगा है। जिससे सामान्य वर्ग की जुबान से गरीबी के आधार पर आरक्षण की मांग मुखर होने लगी है और कहीं कहीं युवा आंदोलन करते भी दिखने लगे हैं।

गुजरात में जब पाटीदार आंदोलन प्रकाश में आया तब किसी अन्य जाति, समुदाय व धर्म का तनिक भी समर्थन प्राप्त नहीं था। ऐसा इसलिये कि यह आंदोलन देश और समाज के हित में ना होकर जाति विशेष के हक में था, जैसे कि अन्ना आंदोलन में देश भर से सुर मिले और हाथ खड़े हुए वैसा आंदोलन यह कतई नहीं था। जिसके नेता बनकर हार्दिक पटेल उभरे और गुजरात चुनाव आते ही कांग्रेस के साथ सशर्त चुनाव मैदान में कूद पड़े। कांग्रेस ने उन्हें आरक्षण देने का फार्मूला दिया हुआ है और अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो आरक्षण देने की कवायद शुरू की जाएगी। इस आरक्षण से नुकसान सामान्य वर्ग को होता हुआ साफ दिखता है और शुरूआत से लेकर अब तक सामान्य वर्ग के किसी भी व्यक्ति ने खुले मंच में आकर पाटीदार आंदोलन का समर्थन नहीं किया।

फिर जब एक पत्रकार माइक लेकर राष्ट्रीय चैनल से गुजरात ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश को यह बात परोस रहा हो कि हार्दिक की रैली में सामान्य वर्ग के लोग आने लगे हैं और उसमें मुसलमान भी आने लगे हैं, अलबत्ता यह भी सिद्ध नहीं हो सका कि गुजरात के मुस्लिमों ने पाटीदारों को आरक्षण का समर्थन किया हो, इक्का दुक्का दोस्ती यारी की बात जुदा होती है कि लोग यूं ही चले आते हैं पर यह बात कहना बेहद अनुचित व गैर जरूरी लगता है कि सामान्य वर्ग के लोग रैली में आ रहे हैं। ऐसे ही नरेन्द्र मोदी सी प्लेन से चुनाव प्रचार करने को जब उतरने वाले थे। उससे ठीक पहले साबरमती के किनारे से एक महिला पत्रकार कुछ आम लोगों से इस संबंध में चर्चा करती हुई दिखीं और चर्चा के दौरान लोगों ने मोदी के विकास की तारीफ की तो चैनल पर बैठे एंकर ने कहा कि बीजेपी कार्यकर्ता काफी उत्साह में हैं और यह देश में पहली बार नहीं हो रहा है लेकिन कार्यकर्ता नरेन्द्र मोदी के इस विकास की तारीफ कर रहे हैं, परंतु उनकी रिपोर्टर ने एक बार भी यह नहीं कहा था कि ये लोग बीजेपी के कार्यकर्ता हैं या नहीं फिर भी उस एंकर ने पल भर से कम समय में स्वयं तय कर दिए कि तारीफ करने वाले लोग बीजेपी कार्यकर्ता हैं।

इशारा साफ है कि पार्टी के कार्यकर्ता हैं तो तारीफ करेंगे ही और उनके लहजे से समझ में आ रहा था कि वे कहना चाह रहे थे कि यह कोई बड़ी बात नहीं और मोदी के सी प्लेन व विकास का समर्थन करते प्रतीत नहीं हो रहे थे। आखिर एक पत्रकार की जुबान जताना क्या चाह रही है ? वो एक पत्रकार की ही जुबान है और है तो क्यों और किसके लिए है ? क्या यह मतदान की हेराफेरी का जाल बिछाने वाली व जनता को भ्रमित करने वाली खास एजेंडे की जुबान नहीं दिखती है ? वैसे भी अब जनता पार्टी के आधार पर चैनल्स का वर्गीकरण करने लगी है एवं स्वयं कुछ पत्रकार स्वयं को राष्ट्रवादी पत्रकार कहने लगे तो वहीं पत्रकार स्वयं धर्म के आधार पर सेक्युलरिज्म व कम्युनलिज्म के मध्य एक बड़ी मोटी ताजी लकीर खुद के लिए खींच ली है । स्वयं लोग कहने लगे हैं कि फलाने चैनल कांग्रेस का समर्थन करता है और ढिकाने चैनल बीजेपी का तो कुछ क्षेत्रीय पार्टियों वाले चैनल भी कहे जा रहे हैं और इसी दिशा में कुछ पत्र पत्रिका भी हाथ मारते नजर आते हैं। जब दर्शक ही यह तय करने लगे हैं कि आपकी छवि में किसका कितना असर है तब पत्रकारिता के बड़े तमगेदार प्रेस क्लब वालों को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि आखिर जन साधारण की राय को कब और कैसे बदल पाएंगें ? यह सवाल बदलते दौर में बदलती पत्रकारिता के लिए चांदनुमा दाग बने इससे पहले ही पत्रकारों को पत्रकारिता के लिए स्वयं से कुछ प्रयास करने होगें, भले इसके लिए विपस्यना ही क्यों ना करना पड़े। हकीकत यह कही जा सकती है कि पत्रकार और पत्रकारिता सीधे तौर पर आम जनता से इत्तेफाक रखते हैं। वे जनता के हक की लड़ाई लड़ने वाले होते हैं और देश व समाज को चतुर्दिक समस्याओं से निजात दिलाकर एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण में सहयोगी बनना कि उससे सुख समृद्धि के बुलंद दरवाजे खुल सकें।

परंतु अफसोस है कि समाज की रेटिंग में सुधार हुआ हो या ना हुआ हो किन्तु रेटिंग की सत्ता में काबिज होने हेतु लालायित चैनल वाले पता नहीं कैसी कैसी लाबिंग करने लगे हैं कि वे हर वक्त शहर दर शहर - शो दर शो स्वयं की रेटिंग बताकर खुद को नंबर वन का बादशाह बताते रहते हैं और गौर करने योग्य है कि इन सब में गांव अब भी नदारद है। पत्रकारिता की ऐसी विभक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति जाने हमें किस ओर ले जाएगी कि पत्रकार और पत्रकारिता पर कुछ चंद लोगों या पार्टी आदि का हक नजर आने लगे और आम मजलूम जनता इनसे स्वयं को अलग महसूस करने लगे। जबकि सबसे बड़ा लगाव व जुड़ाव आम जनता से होना चाहिए। आम जनता को प्रिय होने चाहिए, किन्तु अब ऐसा नहीं रह गया है। यह सत्य अब चुभने लगा है और पत्रकारिता के दागदार होने की बात जगजाहिर होने लगी है। अब कलम और जुबान के गिरवी होने की अफवाह पर आम जनता की मुहर लगने लगी है अर्थात सहमति मिलने लगी है। अब सवाल है कि जनता दरबार कहाँ हैं ? यहाँ तो राज नेताओं व आला अधिकारियों से मधुर संबंधों वाली पत्रकारिता पर मुहर लगने लगी है।

इन्ही खबरिया चैनल्स पर तमाम ओपिनियन पोल आते हैं। क्या कभी कोई ईमानदारी से पत्रकारिता के इस स्वरूप का सर्वे कर ओपनियन पोल जारी करने की हिम्मत कर सकता है ? यह सवाल वाजिब है और बदलते दौर में स्वयं के अंदर जनहित में बहुत बड़ा बदलाव लाने की आवश्यकता है। जिससे जनता का पत्रकार और पत्रकारिता पर भरोसा बना रहे।

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