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कैशलेस इकोनॉमी के लिए बड़ी मशक्कत की आवश्यकता

कैशलेस सोसायटी का स्वप्न भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते एक वर्ष पहले देखा और आम जनता की आदत में शामिल कर भारत को लेसकैश की यात्रा की ओर अग्रसर कर ले गए, किन्तु एक वर्ष बीत जाने के बाद तमाम प्रकार के डिजिटल इंडिया कार्यक्रम चलाने के बावजूद भी ग्रामीण और शहरी जनता बड़े प्रतिशत में कैशलेस की आदी नहीं हो सकी। देश के लिए कैशलेस इकोनॉमी सगुन की तरह है। जिससे अर्थव्यवस्था पारदर्शी व सुदृढ हो सकती थी। परंतु इसकी नींव शिक्षा एवं आदत है। साथ ही मजबूत नेटवर्क होना चाहिए। बेशक हम 4जी का प्रयोग कर रहे हैं। फिर भी अभी ग्रामीण स्तर एवं शहर के चारो कोने में हाई स्पीड की प्राब्लम से दो चार होना पड़ता है और गांव में आज भी 4जी ईद का चांद है, बल्कि वहाँ तो 2जी ही बवाले जाम है।

कुछ गाँव को कैशलेस उसी प्रकार से घोषित कर दिया गया। जिस प्रकार से हमारा सिस्टम काम करता रहा है। हमारे देश में शुरूआत से ही समस्या रही कि कुछ लोगों को हस्ताक्षर सिखा कर सम्पूर्ण जिले को शिक्षित घोषित कर दिया। इस प्रकार से देश की अनपढ़ अगूंठा छाप बड़ी आबादी पढ़ी लिखी जमात में उसी प्रकार से शामिल हो गई। जिस प्रकार से भेड़ के झुंड में बकरी शामिल होते हुए भी दूर से पहचान ली जाती है। अतएव केन्द्र की मोदी सरकार और उनकी टीम इंडिया वाली प्रादेशिक सरकार को इस ओर चिंतन करना होगा कि डिजिटल इंडिया के प्रचार प्रसार को लेकर तमाम एनजीओ आदि के द्वारा सिर्फ घपलाघोरी ना हो बल्कि वो प्रधानमंत्री के स्वर्णिम स्वप्न को साकार कर सकें।

नोटबंदी और जीएसटी के साथ कैशलेस इकोनॉमी की बड़ी भूमिका है परंतु अपनी ही योजना में सफल होने के लिए सरकार को जमीनी मशक्कत करने के लिए बड़ी आवश्यकता है।

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