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बढ़ते प्रदूषण से युवा भारत को खतरा

प्रदूषण मानव जीवन के लिए खतरे की घंटी है। जिसे स्वयं मानव जन्म दे रहा है। आधुनिकता की दौड़ में बढ़ती जनसंख्या के साथ वाहनों की अधिकता किसी भी शहर को स्मागमय कर देता है। दिल्ली देश की राजधानी है एवं यहीं देश भर के चिंतक, शासन प्रशासन के लोग उठते बैठते हैं। देश के लिए हर नीति की आवाज यहीं से उठती है।
लेकिन अगर कोई सबसे पहले हार रहा है तो वह दिलवालों की दिल्ली है, जो प्रदूषण वालों की प्रदूषण वाली दिल्ली बन गई है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन बहुत पहले हो चुका लेकिन नियंत्रण ना के बराबर हुआ है।

प्रदूषण को कम करने हेतु प्रत्येक नागरिक को इसके प्रति सजग होने की अधिक जरूरत महसूस होती है। अगर हवा प्रदूषित हो जाएगी, तो हमारी सांसो में जहर घुल जाएगा और सांस ना ले पाने की दिक्कत से अनेक मौत हो जाएंगी। दिल्ली जैसे शहर में हाईकोर्ट की टिप्पणी बताती है कि पिछले एक वर्ष में 6000 से अधिक मौत सांस की बीमारी से हुई हैं।

ये खतरे की घंटी सम्पूर्ण देश के लिए राजधानी से बज रही है। इसलिये पर्यावरण की दिशा में भारत को अंग्रेजों से आजादी आंदोलन की तरह काम करने की जरूरत है। जंगल के कम हुए क्षेत्र को सबसे पहले संतुलित करना होगा और औषधि वाले वृक्षारोपण की तरफ ध्यान आकर्षित कर हवा को संजीवनी का रूप देना होगा।

जीवन शुद्ध हवा पानी से ही सबसे ज्यादा निर्भर होता है। बढ़ते प्रदूषण से आम आदमी को शुद्ध जल पीने तक को मुहैया नहीं हो पा रहा है। जल से भी बहुतायत बीमारी का जन्म होता है। लेकिन हमारी सरकार का इस दिशा में काम नगण्य है। सक्षम परिवार वाटर फिल्टर लगवाकर शुद्ध जल पी रहे हैं लेकिन देश की गरीब जनता अशुद्ध जल पीने के लिए मजबूर है एवं अशुद्ध हवा से जीवन 440 बोल्ट के करंट से ज्यादा खतरे में है।

वक्त अभी भी है कि ग्रामीण स्तर से लेकर जनसंख्या नियंत्रण एवं प्रदूषण नियंत्रण के उद्देश्य के साथ स्वच्छता और स्वस्थता हेतु संवाद कायम करना होगा। अन्यथा की स्थिति में भारत की जवानी समय से पहले ही काल के गाल में समा जाएगी। युवा भारत एक दिन इस खतरे से वृद्ध भारत की ओर वृद्धि करने लगेगा। यह मानव जनित ऐसा खतरा है जिसे शीघ्र नियंत्रित नहीं किया जा सकता बल्कि अनवरत प्रयास से हम भविष्य में स्वच्छ माहौल दे सकेगें।

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