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वर्ल्ड रिकार्ड खिचड़ी का पर सवाल दो जून की रोटी का ?

देर आए दुरूस्त आए ! हाँ जी खिचड़ी के मामले में हमारा देश पहले से ही खिचड़ी है। बेशक देश का संविधान ही क्यों ना हो वो भी खिचड़ीमय है। विभिन्न देशों और गुलामी काल के कानून आज भी भारतीयों को दासता की याद दिलाते रहते हैं। खिचड़ी की याद भी बीमारी के वक्त ही आती है। कौन मुंआ खिचड़ी खाना चाहता है। यहाँ लिज्जत लजीज पकवान खाने के आदी लोग खिचड़ी कैसे स्वादिष्ट बनाई जाए, यस भी नहीं जानते।

लेकिन देश में अगर कोई है तो वह बाबा रामदेव हैं। जो योग से लेकर खिचड़ी पकाने तक में महारत हासिल किए हैं और उनकी खिचड़ी सरकार के संग भी गजब की पक रही है। हालांकि बाबा की खिचड़ी बीरबल की खिचड़ी से कमजोर नहीं है। बाबा की खिचड़ी काला धन से शुरू हुई और चुनाव प्रचार के ठेके से लेकर स्वदेशी तक का ठेका ले रखा है। योग को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली ही ऊपर से रही सही बची कुची हमारी खिचड़ी भी अंतर्राष्ट्रीय हो गई। लेकिन साहब गरीब के घर की खिचड़ी अंतर्राष्ट्रीय नहीं है। उसकी खिचड़ी की महक में देशी घी का तड़का भी बामुश्किल ही पड़ोसी को महक सकता है।

उनका तो जब हाजमा खराब हो जाता है और लीवर में वीकनेस आदि आने पर हमारे डाक्टर साहब जब सुझाव देते हैं कि अपने बेटे पप्पू को खिचड़ी ही खिलानी तब एक माँ बाप मूंग की दाल और चावल वही बिना आरओ वाले वाटर के मिक्स कर पकाने लगते हैं। गरीब और अमीर की खिचड़ी में भी फर्क है। उनकी खिचड़ी में आरओ वाटर रहेगा और गरीब की खिचड़ी में हैंडपंप या कुएं का पानी रहेगा। वो गाना था ना "कुआं मं डूब जाऊं" अर्थात गरीब बेचारा कुएं में ही डूब जाए।

वर्तमान सरकार ने यह काम तो बहुत बढ़िया किया कि सर्वधर्म समभाव की खिचड़ी से जन जन को खिचड़ीमय कर दिया कि खिचड़ी खाइए स्वस्थ रहिए। अब देश से दो वक्त की रोटी का सवाल जवाब खत्म हो जाएगा। प्रवक्ता गण बड़ी मुहब्बत से कह सकेंगे कि अरे साहब कौन कहता है रोटी खाने के लिए ?

वो एक प्रवक्ता हैं, लगता है वो अंतर्राष्ट्रीय वाली खिचड़ी खाते रहे होगें। इसलिये वो अपनी जुबान से हर किसी को परास्त करते दिखे, स्वयं कभी पस्त नहीं हुए। अतः ख्याल आता था कि ये प्रवक्ता खाता क्या है ? अब मालूम पड़ा कि सारा खेल खिचड़ी का हो सकता है। अब दो वक्त की रोटी की जगह कहना होगा "एक प्लेट खिचड़ी दे ना सके जो वो सरकार निकम्मी है"। सबसे बड़ी बात ये है कि विपक्ष इस मसले पर चुप्पी साधे है और हमेशा की तरह यह नहीं कहने पा रहा है कि ये तो हमारी योजना थी और मौनमोहन सिंह जी ने पहले ही सुझाव दिया था, लेकिन उस वक्त यही भगवाधारी डंडा चलाने को तैयार थे कि गरीब बेचारे को रोजी रोटी नहीं देते तो खिचड़ी खिलाओगे ?

वैसे मिर्च मसाले आदि का झंझट खत्म है परंतु भय बाबा से लगता है। कहीं वो एकाएक आएं और कह दें कि आयुर्वेद के वर्षों पुराने शोध से हम लाए हैं एकदम शुद्ध स्वदेशी खिचड़ी मसाला और बेचारा गरीब फिर वंचित रह जाएगा, मसाले वाली खिचड़ी खाने से वैसे भी बाबा का स्वदेशी प्रोडक्ट चीनी प्रोडक्ट से मंहगा ही रहता है और डर लगता है चीन इस पर भी बाजी ना मार ले जाए और चिप्स की जगह खिचड़ी का पैकेट बिकने लगे। बाजार है बाजार का क्या ? बाजार ऐसा ही होता है।

खिचड़ी के मामले में हमारा वर्ल्ड रिकार्ड पहले से ही है। सभी देशों से न्यारा देश जिसकी जनसंख्या खिचड़ीमय होकर विस्फोट करती जा रही है और अनेक धर्म जाति के लोग यहाँ रहते ही हैं और फिर फूफा की तरह नाराज साहित्यकार व उपराष्ट्रपति भी असहिष्णुता का राग अलापकर खिचड़ी में तड़का ही तो मारते हैं।

हमारे देश में खिचड़ी जाने कब से पक रही है। किसी ना किसी कोने में, दिन के उजाले में, रात के अंधेरे में एनी टाइम पकती है भारत के अंदर खिचड़ी भले वो चुनावी खिचड़ी क्यों ना हो और भला हो राजनीति के मिमक्रीबाज लालू यादव जी का जो अब तक बोले नहीं हम सारा चारा खा गए और पशुधन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चारा को राष्ट्रीय भोजन क्यों नहीं घोषित किया ? साला हमरी पहचान अंतर्राष्ट्रीय हो जाती और बुढ़ापे में चल निकलती। जो भी पर्यटक आते बिहार में लालू जी से मिलने जरूर जाते। चुनावी खिचड़ी पकाने के लिए नेतागण सारे सिद्धांत भूलकर सबकुछ वर्णशंकर ही तो कर लेते हैं, किन्तु अब भी सवाल एक ही रहेगा दो जून की रोटी का ?

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