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वित्तमंत्री ने कहा था शैडो इकोनॉमी, जानिए इसके खतरे

पिछले दिनों नोटबंदी को सम्पूर्ण सफल बताते हुए वित्तमंत्री अरूण जेटली ने शैडो इकोनॉमी शब्द का प्रयोग करते हुए कांग्रेस पर बड़ा हमला बोला था। उस कांग्रेस पर जिसे आजादी के बाद से देश में सबसे अधिक वर्ष शासन करने का गौरव हासिल है।

लेकिन वित्तमंत्री की यह बात हर भारतीय को हिला देने वाली है कि कांग्रेस "शैडो इकोनॉमी" अर्थात काला धन के साथ सफेद धन की पैरोकार थी। जिसके छीटे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री प्रख्यात अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह पर भी पड़ते हैं। जिन्हें देश का एक पक्ष आज भी बेहद शालीन एवं योग्य व्यक्ति मानता है। सर्वविदित है कि पीएम नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा इस उद्देश्य के साथ की थी कि देश से जाली नोट और काले धन का प्रचलन खत्म हो जाएगा।

इस उद्देश्य को लेकर बीजेपी आज भी अपनी बात पर अडिग है तो वहीं कांग्रेस "ब्लैक डे" मनाने की फिराक में है और बीजेपी "एंटी ब्लैकमनी डे" मनाना चाहती है। स्पष्ट है कि इमर्जेंसी के बाद अगर सबसे ज्यादा कुछ चर्चित है तो वह नोटबंदी है। देश की प्रमुख दो पार्टियों के बीच राजनीतिक रार में 8 नवंबर का दिन पूरे एक साल बाद किसके पक्ष में होगा जबकि जीएसटी भी लागू हो चुकी है, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।

किन्तु शैडो इकोनॉमी जैसी बात किसी भी देश के लिए बड़ी घातक है। अगर ये सच है फिर ऐसे में प्रत्येक भारतीय का हृदय विह्वल हो उठेगा कि चुनावी जीत के लिए शासन सत्ता पर बैठी पार्टी ने राष्ट्र को सशक्त बनाने से एक कदम पीछे क्यों रखा ?

आजादी के बाद से लगातार धर्म जाति और महजब के नाम पर बंटा यह देश अब जाकर अर्थव्यवस्था को लेकर चर्चा में है। जहाँ सिर्फ और सिर्फ धार्मिक कट्टरता और वर्चस्व की जंग हुआ करती थी वहाँ अब ये जंग बेशक किसी पुल में पिलर की भांति अब भी जड़ी हुई है लेकिन विकास और अर्थव्यवस्था खासे चर्चा का विषय बने हुए हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में घर घर टेलीविजन, मोबाइल और सोशल मीडिया जैसा प्लेटफार्म होने की वजह से जनता भी संसद से सड़क तक के "हाल ए बयां" को बखूबी महसूस करती है। जनता नोटबंदी और जीएसटी को लेकर बहुत ज्यादा अनभिज्ञ नहीं है। उसे अपना हित अहित बखूबी समझ में आता है और ये भारत की जनता ही है, जिसने बड़े धैर्य के साथ कांग्रेस को देश में शासन करने के लिए बार बार मौका देती रही और वो जनता शायद रफ्ता रफ्ता रफ्तार से नोटबंदी व जीएसटी के क्रियान्वयन को बखूबी महसूस कर रही है।

अलबत्ता इसके बाद के हर चुनाव में बीजेपी फायदे में रही है, इसलिए यह कहा जा रहा है कि हल्की फुल्की नाराजगी के साथ भी अवसर की बात आने पर वो कहीं ना कहीं दो बड़े निर्णय के साथ बीजेपी के पक्ष में खड़ी नजर आ जाती है।

किसी भी देश के लिए शैडो इकोनॉमी बड़ा घाटे का सौदा है जबकि अर्थशास्त्री पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने स्वयं संसद भवन में भी कुछ ऐसा ही इशारा किए थे कि इस प्रकार के धन से ही मंदी के समय भारत में मंदी का असर नहीं रहा अर्थात शैडो इकोनॉमी कांग्रेस की अपनी पसंद कही जा सकती है लेकिन यह ऐसी इकोनॉमी थी जो तमाम अमीरजादों को अत्यधिक प्रकाश में लाती रही और गरीब आर्थिक प्रगित में पर्दे के पीछे जाता रहा फिर भी कहते रहे कि हम प्रगतिशील हैं। जैसे 8 नवंबर समीप आएगा वैसे वैसे बहुत कुछ अंदर से बाहर निकलकर आएगा, जैसे कि पिछले एक साल से राहुल गांधी के नोटबंदी वाले 4000₹ खर्च नहीं हुए और यह भी चर्चा का विषय है कि आखिर राजनीतिक नौटंकी सिर्फ नौटंकी होती है जोकि उन्हें एटीएम तक ले गई थी वरना अब उनका चपरासी भी एटीएम पर नहीं दिखता है।

खैर शैडो इकोनॉमी को लेकर कांग्रेस बैकफुट पर आती प्रतीत होती है। फिर भी ब्लैक डे मनाने जैसी वाली बात "चोरी की चोरी ऊपर से सीना जोरी" जैसी कहावत को अवश्य चरितार्थ करती हैं। किन्तु इस वर्ष के अंतिम दिन जन जन के लिए बेहद दिलचस्प व ज्ञान भरे रहेंगे। देखने योग्य होगा कि कौन किसको घेर पाता है फिर आने वाला नया वर्ष भारत की जनता के समक्ष बहुत कुछ नया लेकर आएगा।

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