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जिंदगी की जंग न हारने पाये भविष्य

गरीबी से अभिशापित, मात्र पांच साल का मासूम ‘भविष्य’ क्या जिंदगी की जंग हार जायेगा? जिसके जीवन के लिए पिता ने अपना घर-द्वार पत्नी का जेवर बेच दिया और ‘भीख’ भी मांगी, फिर भी मासूम घुट-घुट कर मर रहा है। जिसकी दयनीय हालत देखकर धर्म की दीवारें भी टूट गईं और हिन्दू-मुसलमान दोनों ने झोली फैलाकर सड़क में भीख मांगकर हजारों रूपये जमा किया, फिर भी ब्लड कैंसर की बीमारी से जूझ रहा मासूम का जीवन खतरे में है?

यह एक ऐसे मासूम की कहानी है जो तोतली भाषा में लोगों से खुद बताता है कि मुझे ब्लड कैंसर है? लेकिन उसे यह नहीं पता कि इस बीमारी से होता क्या है? इतना जरूर वह मासूमियत के साथ पूछता है, ”अंकल, क्या मैं ठीक हो जाऊंगा? मैं जीना चाहता हूँ“। जब यह बच्चा इस तरह के सवाल पूछता है तो हर किसी की आँखें भर आती हैं और दिल दहल जाता है।

जी हाँ, यह मार्मिक कहानी है, पाँच साल के मासूम ‘भविष्य सेन’ की। इसका पिता दमोह जिले के हटा के ककराई वार्ड का रहने वाला है, जो बीते दो साल से अपने बच्चों की बीमारी से परेशान है। पिता मनोज सेन हटा की एक गुमटी में सैलून चलाता है। रोजाना सौ से दो सौ रुपये कमाता है, जिससे बमुश्किल परिवार का गुजारा ही हो पाता था। जब से बेटे को कैंसर हुआ तब से सब कुछ गड़बड़ हो गया। कच्चा सा मकान गिरवी चला गया तो पत्नी के जेवर भी एक-एक करके बिक गये। इसके बाद भी बेटे की बीमारी ठीक नहीं हुई। मनोज ने अपनी  हैसियत से ज्यादा खर्च करके भोपाल और जबलपुर में अपने बेटे का इलाज कराया और जो भी उसके पास जमा पूंजी थी, खर्च कर दी। यहां तक कि अपने बेटे के इलाज के लिए ‘भीख’ मांगने से भी परहेज नहीं किया। जिन जनप्रतिनिधियों को मदद करनी चाहिये वे आगे नहीं आये। प्रशासनिक अफसरों ने भी मनोज और उसके बेटे का दर्द नहीं जाना। फिर भी मनोज ने हिम्मत नही हारी। आँखो में भले ही आंसू हो लेकिन बेटे की जिंदगी के लिए वह आज भी मदद की गुहार लगा रहा है।

अपने जिगर के टुकड़े को इस गम्भीर बीमारी से जूझते देख भविष्य की मां बबली सेन के पास रोने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। वह दिन-रात बेटे की जिंदगी को लेकर सिसकती रहती है। गरीबी और लाचारी समेत अपनी किस्मत को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पाती। लेकिन जहां भी उसे उम्मीद की किरण दिखाई देती है, वहाँ वह हाथ फैलाकर कहती है, ”मेरे बेटे की जिंदगी बचा लो“। यह भविष्य की सिसकियां व मां के आंसू ही हैं, जिनकी वजह से धर्म की दीवारें दरकने लगीं। हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोगों ने एक साथ सामने आकर सड़क पर झोली फैलाकर लोगों से मदद मांगी तो छोटी सी बस्ती में हर किसी ने मदद का हाथ बढ़ाया और धीरे-धीरे 50 हजार की रकम जमा करके बेबस पिता के हाथों में रख दी, लेकिन यह रकम भी ब्लड कैंसर जैसी बीमारी के लिए छोटी पड़ गई।

मनोज की माने तो वह पिछले दो वर्षों से जिले के कलेक्टर से लेकर तमाम उच्चाधिकारियों की ड्योढ़ी पर दस्तक दे चुका है, नेताओं के सामने भी गिडगिड़ा चुका है। लेकिन कोई भी उसके बेटे की जान बचाने को सामने नहीं आया और इसी वजह से पांच वर्षीय मासूम जिंदगी की जंग हारने वाला है। हालांकि अभी हाल ही में आये एडीएम सीपी पटेल ने जब भविष्य की मार्मिक कहानी सुनी तो उनका दिल पसीज उठा और वह कहने लगे कि इस बच्चे की मदद के लिए एक अभियान चलाया जाना चाहिये, ताकि भविष्य जिंदगी की जंग हारने न पाये।

बहरहाल इस मासूम की अपील और उसके पिता के रूंधे गले से निकलने वाले शब्दों को जो भी सुनता है उसका दिल झकझोर उठता है। लाजिमी है लोगों का अंदर तक हिल जाना, लेकिन सवाल सिस्टम से है। जब सूबे के मुख्यमंत्री की मंशा साफ है कि राज्य में गरीबी की वजह से कोई मौत न हो, सरकार गरीबों के इलाज के लिए पैसा भी बांट रही है। फिर आखिर भविष्य जैसे मासूम के पास सरकारी सहायता क्यों नहीं पहुच पाती? यह सवाल हमेशा कचोटता रहेगा।



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