इतिहास और पूर्वज' बदले नहीं जा सकते और न ही सांस्कृत"/>

बुन्देलखण्ड के चित्रकूट में मिले हजारो वर्ष पुरानी सभ्यता के साक्ष्य

इतिहास और पूर्वज' बदले नहीं जा सकते और न ही सांस्कृतिक विरासत और धरोहरों के महत्व को कम किया जा सकता है। बुन्देलखण्ड के चित्रकूट जिले में राजापुर नगर से महज कुछ किमी की दूरी पर पुरातत्व विभाग द्वारा किये जा रहे उत्खनन कार्य से ऊपर लिखी पंक्तियां सही साबित हो रही हैं । इस उत्खनन के दौरान कई सभ्यताओं के होने के सबूत प्राप्त हुए हैं। खुदाई कर रही टीम के विशेषज्ञ मानते हैं कि यहाँ कई प्रकार की उन्नत सभ्यताएं निवास करती थी जिसके हमे सबूत भी प्राप्त हुए हैं ।

उत्खनन कर रही टीम का नेतृत्व कर रहे डॉ अवनीश चंद्र मिश्र का मानना है कि अगर यही उत्खनन कार्य दो तीन दशक पहले हुआ होता तो कहीं अधिक साक्ष्य सही रूप में मिलते लेकिन खेती का क्षेत्र होने के कारण अधिकांश सामग्री नष्ट हो गई या तो मिट्टी के बहाव में बह गई है । फिलहाल हम प्रयास कर रहे हैं कि जो कुछ भी यहाँ बचा है वो उसे सही रूप में निकाला जा सके ।

धर्मनगरी चित्रकूट में पुरातत्व विभाग द्वारा चलाये जा रहे उत्खनन में अभी तक आश्चर्यजनक परिणाम सामने आये हैं । शुरुआत में ताम्रपाषाणकाल और काली चमकीली मिटटी के समय के कई साक्ष्य मिलने के बाद खुदाई कर रही टीम को रविवार को पुरापाषाणकाल के भी कई साक्ष्य प्राप्त हुए । जानकारी के लिए आपको बता दें कि ये उत्खनन कार्य चित्रकूट जिले के राजापुर तहसील से कुछ दूरी पर स्थित कलवलिया गाँव के संडवावीर टीले पर चल रहा है । जहाँ से रविवार को टीम ने पुरापाषाणकाल के खुरचनी और पत्थर की बनी कुल्हाड़ी प्राप्त की । इसके साथ ही मिट्टी की मटकी भी टीम को प्राप्त हुई है ।

टीम का नेतृत्व कर रहे शकुंतला देवी पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अवनीश चन्द्र मिश्र ने बताया कि अभी तक ताम्र पाषाणकालीन कई वस्तुएं प्राप्त हो चुकीं हैं। धीरे धीरे कई और सभ्यताओं के साक्ष्य प्राप्त हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसी स्थान से लोमड़ी की आकृति वाला मिटटी का खिलौना प्राप्त हुआ । एक छोटी मटकी भी मिली है जिसके अंदर मिटटी भरी हुई है । दोनों की जाँच के बाद कई और महत्वपूर्ण राज सामने आ सकते हैं । इस मटकी में अनाज के साक्ष्य भी मिल सकते हैं । हमे जले कंडे ,जानवरो की जली हड्डियो के अवशेष भी मिले हैं । मिटटी के कुछ जले बर्तन भी मिले हैं जिससे यह आभास होता है कि यहाँ रहने वाले लोग जानवरो को भूनकर खाया करते थे ।

इस स्थान का पता लगाने वाले पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा रामनरेश पाल ने बताया कि हमारी टीम को उरदाइन मंदिर के पास नव पाषाणकाल की संस्कृति के चिह्न भी दिखे हैं । साथ ही समोगरी मंदिर के पास चंदेलकालीन संस्कृति के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं । फ़िलहाल अभी तक की खुदाई में हमें कई महत्वपूर्ण वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। जिनमे खूबसूरत थालियां , औजार , अनाज का पात्र , आयरन एरो हेड , मिटटी की प्ले डिस्क ,माला के स्टोन बीड , लोहे की खुर्पी , लोहे के बणाग्र ,एक मिटटी की खूबसूरत मटकी सहित सैकड़ों वस्तुएं अब तक प्राप्त हो चुकी हैं । यहाँ से प्राप्त आभूषण और मिटटी के बर्तनों से स्पष्ट है कि यहाँ एक सम्पन्न सभ्यता निवास करती थी ।

रविवार शाम पुलिस अधीक्षक चित्रकूट प्रताप गोपेन्द्र भी कलवलिया साइट पहुंचे जहां पिछले कई दिनों से लगातार उत्खनन कार्य चल रहा है । उन्होंने टीम के सदस्यों से मुलाकात करके सारी जानकारी प्राप्त की । एसपी प्रताप गोपेन्द्र ने कहा कि ये खोज ऐतिहासिकता के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है और इससे बुन्देलखण्ड के पर्यटन और शोध को काफी लाभ मिलेगा ।

पिछले दस दिनों से लगातार गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली राजापुर से महज कुछ दूरी पर स्थित कलवलिया गांव के संदवावीर टीले पर पुरातत्व विभाग और शकुंतला देवी मिश्र पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ की टीम द्वारा उत्खनन कार्य किया जा रहा है । इस दौरान टीम को सैकड़ो-हजारों वर्ष पुरानी कई सभ्यताओं के साक्ष्य मिले हैं ।

अभी तक पुरापाषाणकाल ,नवपाषाणकाल ,उत्तरी काली चमकीली मिट्टी युग और ताम्रपाषाणकाल के समय के औजार और बर्तन प्राप्त हुए हैं । फिलहाल उत्खनन कार्य जारी है और आने वाले दिनों में अभी और भी चौंकाने वाले परिणाम सामने आ सकते हैं । जानकारी के लिए आपको बता दें कि ये बुन्देलखण्ड का पहला उत्खनन कार्य है जहाँ से इतनी बड़ी संख्या में एक साथ कई सभ्यताओं के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं ।

रिपोर्टिंग के दौरान उन विभूतियों से भी मुलाकात हुई जो इस महान कार्य में लगे हैं । आज मुख्य रूप से डॉ. अवनीश चंद्र मिश्र जी और क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी रामनरेश पाल जी से मेरी मुलाकात हुई और इस कार्य के बारे में लंबी बातचीत हुई । उन्होंने कहा कि ये एक बड़ा कार्य है जो लगातार जारी रहेगा । फिलहाल अभी प्रथम चरण का कार्य चल रहा है और अभी ज्यादा कुछ नही कहा जा सकता लेकिन इतना स्पष्ट है कि यहाँ एक सम्पन्न सभ्यता से जुड़े लोग निवास करते थे जिन्हें कई तकनीको का बेहतर ज्ञान था ।

उनका कहना था कि फिलहाल पूरी टीम कड़ी मेहनत कर रही है । ये पूरा कार्य बहुत बारीक होता इसलिए इसमें काफी अनुभवी और जानकार मजदूर लगते हैं । हमारी टीम में 76 वर्षीय बुजुर्ग गोकुल हैं जिन्हें ऐसे उत्खननों का लंबा अनुभव है । कई बड़े इतिहासकारों के साथ विभिन्न जगहों पर काम करने का इन्हें 35 वर्षो से अधिक का वर्षो का अनुभव है । बेलन घाटी ,झूंसी ,अधवा घाटी,कोलडीहवा ,महगड़ा आदि स्थानों पर खुदाई करने का इन्हें अनुभव है ।

टीम के सदस्यों में प्रमुख रूप से तकनीकी विशेषज्ञ वीके खत्री , प्रो. बृजेश रावत , वीरेंद्र शर्मा, शिवप्रेम ज्ञागिक और राजेश कुमार लगातार इस कार्य में लगे हैं । अगर इस कार्य में लगे मजदूरों की बात करें तो शेषमणि , शांतिलाल ,शिवराम , शदाशिव ,हरिमोहन ,हरिकृष्ण ,लवकुश लगातार पूरी मेहनत से जुटे हैं ।

सबसे खास बात आपको बता दें कि इस क्षेत्र की खोज क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी रामनरेश पाल ने की है । अभी तक पूरे चित्रकूट जिले श्री पाल ने सैकड़ो ऐसी साइटें खोज रखीं जिसके उत्खनन से हजारो लाखों वर्ष पुराने राज सामने आ सकते हैं । श्री पाल बताते हैं कि उन्होंने पिछले एक दशक के अंतर्गत जिले के अधिकांश गांव , ब्लाक, तहसील जाकर विभिन्न साइट्स का अध्ययन किया है । इस क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं ।



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