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जनता का विश्वास वित्तमंत्री से ज्यादा पीएम पर

जीएसटी और नोटबंदी को लेकर पुनः एक बार चर्चा गर्म हो गई है। भाजपा के अंदर से ही सुगबुगाहट बढ़ी हुई है। इस बार यशवंत सिन्हा ने सीधी बात से तकरार की है, तो शत्रुघ्न सिन्हा ने ट्विटर से उनकी बात का समर्थन किया है।

विपक्ष अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार पर हमलावर हुआ है। जीडीपी घटने का शोर भारत के आभा मंडल में छाने लगा है। लेकिन सबकुछ पटरी पर आ जाए इस बार अभी तक किसी ने कोई बात नहीं की वरन् राजनीति अवश्य की जा रही है।

सारा दारोमदार पीएम मोदी और वित्तमंत्री अरूण जेटली पर है। इस बाबत 2019 करीब होने को देखते हुए जब सोशल मीडिया पर मेरे द्वारा सर्वे किया गया। वो सर्वे दो अलग अलग पोस्ट पर नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री अरूण जेटली को लेकर था।

क्या कहते हैं सोशल मीडिया के युवा व युवतियां
मेरे इस सर्वे पर 100 से ज्यादा लाइक और लगभग 100 के आसपास टिप्पणियां आईं, जिनमें लगभग 1 फीसदी लोगों को छोड़कर सबने बतौर पीएम नरेन्द्र मोदी पर अभी भी भरोसा जताया है। इसमें विकल्प ना होने की बात भी खुले तौर पर सामने आयी कि मोदी का विकल्प भी नहीं है। स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी के सामने विपक्ष के समग्र नेता खड़ा करने में भी अक्षम है।

हालांकि नोटबंदी को काफी हद तक लोग सही ठहरा रहे हैं परंतु क्रियान्वयन सही ना हो पाने का दोष भी मढ़ रहे हैं। फिर भी इसमें सिस्टम का दोष अधिक बताया जा रहा है कि बैंक में बैठे कर्मियों के द्वारा ही सरकार की मंशा बड़ी धोखाधड़ी हुई व अमीरों को पीछे के दरवाजे से सुविधा प्रदान की गई अर्थात अपने ही देश में देश का अहित चाहने वाले लोगों की तादाद अधिक है। इसलिये भी नोटबंदी सफलता के साथ मन में क्षोभ उत्पन्न कर गई।

इसके साथ ही लोग अभी भी बहुत कुछ हाथ में होने की बात कहकर नरेन्द्र मोदी पर भरोसा जता रहे हैं खि बतौर पीएम बेहद साहसी व निर्णय लेने वाले व्यक्ति हैं।

वित्तमंत्री के बारे में
वित्तमंत्री अरूण जेटली को लेकर 90 फीसदी लोगों की मंशा बहुत अच्छी नहीं रही। खासतौर से जीएसटी के इम्प्लीमेंटेंशन में खासी गड़बड़ी गिनाई जा रही है और सीधे तौर आरोप लग रहे हैं कि वित्तमंत्री ने पीएम को अंधेरे में रखकर नोटबंदी के ठीक बाद जीएसटी जैसा निर्णय लेकर पीएम की पीठ पर छूरा भोकने का काम किया है। इस पर व्यापारी वर्ग बदलाव की उम्मीद के साथ सरकार से लगातार मांग पर डटा हुआ है कि थोड़े से बदलाव से काफी कुछ अच्छा होगा।

वैसे भी कुछ लोगों का कहना है कि ये सरकार सुनने वाली सरकार है। सरकार अवश्य सुनेगी और इस पर हल्की सनसनाहट भी जारी है कि शीघ्र ही नरेन्द्र मोदी राष्ट्र हित में कोई ऐसा फैसला लेगें कि भरोसा सिर्फ नरेन्द्र मोदी पर ही नहीं बल्कि वित्तमंत्री सहित पूरी सरकार पर कायम हो। वैसे जनता की मंशा है कि अरूण जेटली को वित्तमंत्री के प्रभार से अवमुक्त कर दिया जाए परंतु यहाँ पर एक अच्छे वित्तमंत्री को लाना बड़ी चुनौती व विश्वास की बात पटरी पर आकर लुढ़क जाती है। कुलमिलाकर स्पष्ट है कि बहरहाल नोटबंदी और जीएसटी के बाद जनता 50 - 50 के मूड में प्रतीत होती है। शायद कुछ और महीने बाद सबकुछ स्पष्ट हो सके। अभी तो ना बहुत ज्यादा अंधेरा है और ना ही दीवाली जैसा प्रकाश है। फिर भी एक नरेन्द्र मोदी ही हैं जिनसे जनता आशान्वित है कि शीघ्र ही कुछ ऐसा निर्णय होगा, जो सबकुछ पटरी पर ला देगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)



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