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मामा की सरकार मे मामा बने किसान

सरकार कोई भी हो किसान कल्याण की बात करती है। फिर भी किसान कल्याण की पहेली सुलझने का नाम तो नहीं लेती बल्कि दिन ब दिन किसानों को लूटने खसोटने के मामले उजागर होने से किसान कल्याण की बात दिवा स्वप्न महसूस होने लगती है। मामा के राज में पन्ना तहसील के 2 किसानों को अफसरों द्वारा ना सिर्फ मामा (बेवकूफ) बनाया गया बल्कि उनके हक के मुआवजे की धनराशि को सामूहिक प्रयास से डकार गए। हाँ जी ये वही अफसर हैं जिन्हे सरकार जनकल्याण करने के लिए सातवां वेतन आयोग लागू कर मंहगाई भत्ता से लेकर हर सुख सुविधा प्रदान करती है। किन्तु अवैध कमाई और धन के मद मे मदमस्त ये अफसर राममूर्ति तथा जागेश्वर नामक दो किसानों के 23 लाख हड़प लिए।

किसानों को पता चला तो होश पाख्ता हुए
एक लंबा अर्सा बीतने के बाद जब किसानों ने मुआवजे की पड़ताल करनी चाही तो मालूम पड़ा कि उनके नाम से चेक निकल भी गया और निगल भी लिया गया। अब मरता क्या ना करता की तर्ज पर किसान जमीन के मुआवजे की धनराशि डकारने वाले ठग अफसरों के खिलाफ न्याय का दरवाजा खटखटाना शुरू तो किया था पर शायद प्रशासन के न्याय के दरवाजे की कुण्डी इतनी जर्जर हो चुकी है कि किसान की देह ही जर्जर हुई जा रही थी। अंततः शासन प्रशासन को तमाम पत्राचार के बाद कुछ सुध आई तब एसपी द्वारा 5 सदस्यीय टीम का गठन किया गया।

खुल गई परतें
जब इस टीम ने सघन जांच शुरू की तब पता लगा कि इनकी नामाराशि के नाम पर फर्जी एकाउंट आईसीआईसीआई बैंक मे ओपन कर लिपिक राजेन्द्र सिगौत, पटवारी कमलेश पाण्डेय, उपयंत्री आरके उपाध्याय आदि के द्वारा किसानों के साठ बड़ी ठगी की गई है।  इस मामले मे तत्कालीन एसडीएम भी दोषी हैं किन्तु एसडीएम अशोक ओहरी के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत नहीं हुआ। जबकि उक्त अधिकारी भी बराबर का जिम्मेदार है। टीआई खनैजा की भूमिका भी बेहद संदिग्ध हैं। शायद बड़े अफसर भी छोटे अफसरों की आड़ मे बच निकलते हैं। जब इस मामले की परत दर परत खुल गई तब 5 आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी तथा मानसिक उत्पीड़न की धराओं के साथ सरकारी नौकरी के दुरूपयोग किए जाने की भी धारा लगाकर आगे की कार्यवाही सुनिश्चित की गई है।

जल संसाधन विभाग द्वारा राममूर्ति को 13 लाख 69 हजार तथा जागेश्वर को 9 लाख 65 हजार मुआवजे की धनराशि मिलनी थी। जिस पर अधिकारी ही लुटेरे बन बैठे तो किसान अंगूठा चूसते रह गए। आईसीआईसीआई बैंक मे जिस प्रकार से फर्जी खाता खुला फिर इतना बड़ा एमाउंट निकाला गया। उसमे फील्ड आफिसर की भूमिका भी बड़ी संदिग्ध है। बैंक की भी जांच होनी आवश्यक है। तत्कालीन एसडीएम का बच निकलना जनता के मन मे शोक उत्पन्न करता है। जबकि यकीनन इन बड़े अधिकारी के सह के बिना भ्रष्टाचार तो क्या विभागीय पत्ता भी नहीं हिलता है। कुलमिलाकर प्रथम चरण की कार्यवाही से किसानों के मन मे विश्वास जगा है कि देर है पर अंधेर नहीं एक ना एक दिन मुआवजा और न्याय दोनो मिलेगा।



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