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भारत और भाजपा की जिंदगी 50 - 50

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अब तक दो बड़े फैसले लिए हैं। जो भारत जैसे देश मे बड़े बदलाव के संकेतक हैं। सर्वप्रथम नोटबंदी का धमाकेदार चौकाने वाला फैसला जब आया किसी ने सोचा नहीं रहा होगा कि भारत मे ऐसा भी हो सकता है।

दूसरा फैसला जीएसटी का रहा जिसके लिए जनता कांग्रेस शासनकाल से माइंड मेकअप कर रही थी। लेकिन ये फैसला भी नोटबंदी के फैसले के एक वर्ष के अंदर ही लिया गया। इसलिये ये दो बड़े फैसले भारत और भाजपा की तकदीर लिखने वाले हैं। अब वक्त ही फैसला करेगा कि भारत की तकदीर में क्या मिलता है और भाजपा की तकदीर कितनी दगमगाती है अथवा डगमगाती है।

खैर अर्थव्यवस्था की रेखाएं आम आदमी की हथेली की तरह अबूझ पहेली हैं। जिस प्रकार से आम आदमी की रेखाओं का ज्ञान विशिष्ट ज्योतिषाचार्य को होता है उसी प्रकार से अर्थव्यवस्था का ज्ञान भी अर्थशास्त्री को होता है। दोनों ही जनता की समझ से इसलिये परे हैं कि इन दोनों के ज्ञान की पढ़ाई सरल और सुलभ नहीं है।

दूसरी सबसे बड़ी बात है कि जनता विश्वास किसका करे ? आजादी के बाद से ऐसा कोई अर्थशास्त्री भी जनता के सामने नहीं आया जिसकी कही हुई बात पर जनता भरोसा कर ले। जैसे जैसे जैसे समय बीतता रहा आधुनिकता बढ़ती रही वैसे वैसे ज्योतिषाचार्यों से भी जनता का विश्वास उठ गया। महज कारण इतना सा कि अनेक बार व्यक्ति विशेष के लिए कही हुई बात मौसम के अनुमान की तरह असफल साबित हुई है।

नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने से पहले ही भारत की जनता की नब्ज को टटोल लिया था। अकेले सिंघम की तरह भाषणबाजी करते हुए पालिटिकल फाइट किए और प्रधानमंत्री की कुर्सी जनविश्वास के साथ संभाल ली।

वही विश्वास जनता के बीच हल्की फुल्की दरार के साथ विकल्प के अभाव मे अब भी बना हुआ महसूस हो रहा है। किन्तु जीएसटी लागू होने के बाद सामान्य सा व्यापारी भी अपनी परेशानियों को इस तरह बयां कर रहा जाने उनके साथ वास्तव मे बड़ी बेवफाई हो चुकी है। कुछ व्यापारियों ने इस दर्द को बयां किया है और महसूस भी होता है कि बड़े चमत्कारिक परिवर्तन के लिए पीएम व वित्त मंत्री से कहीं थोड़ी बहुत चूक हो गई, तो वहीं शक नहीं है कि जिम्मेदार प्रशासनिक अफसरों ने भी इमानदारी से साथ नहीं निभाया।

नोटबंदी जिस उद्देश्य से की गई उसमे ब्लैक का बहुत बड़ी मात्रा मे बैंकिंग सांठगांठ से व्हाइट हो जाना देश के साथ नागरिकों का बहुत बड़ा धोखा है। किसी भी देश की उन्नति उस देश के नागरिक पर निर्भर होती है लेकिन गरीब आदमी खुशफहमी मे रहा आया कि बड़े बड़े तबाह हो गए परंतु यह सच अधूरा है बल्कि पूरा सच ये है कि तिनका भले बह गया हो नोटबंदी की बाढ़ मे परंतु बड़ो बड़ो की एंटीअर्थक्वेक स्ट्रक्चर वाली बड़ी बड़ी इमारते वैसे ही मजबूती से लाल किले की तरह खड़ी हैं। उनका अपना एक किला था जो आज भी उतना ही सुरक्षित है और झंडा फहर रहा है।

अब शीघ्र ही जीएसटी जैसा बड़ा फैसला इतने बड़े देश मे लागू कर देना कोई आसान बात नहीं है। परंतु बदलाव की प्रक्रिया जितनी सरल व मद्धिम होगी वास्तव में अपवाद को छोड़कर वही व्यापक तौर से मानसिक व धरातल पर व्याप्त हो पाती है।

इसलिये मुझे प्रतीत होता कि भारत और भाजपा की "जिंदगी 50 - 50" का दौर है। जिसमे भारत की जिंदगी उबर अवश्य जाएगी क्योंकि राष्ट्रप्रेमी बहुत हैं परंतु भाजपा शीर्ष नेतृत्व को गंभीरता से भाजपा की जिंदगी को भारत की जिंदगी के साथ जीवन देना ही होगा। अलबत्ता तमाम ऐसे मुद्दे हैं जहाँ बड़ी कामयाबी मिली परंतु नोट, वोट और व्यापार का अपना महत्व है। खैर मैं ना तो अर्थशास्त्री हूं, ना ज्योतिषाचार्य हूं बस जिंदगी को महसूस करता हूं और जिंदगी से कह दिया है समझना ना समझना बड़ों बड़ों का काम है अपुन छोटे लोग हैं।



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