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स्वामी विवेकानंद का भारत या राहुल गांधी का भारत

राहुल गांधी के अमेरिकी दौरे को लेकर देशी जमीन पर बवाल ए जाम आ गया है। इस जाम को कांग्रेस बीजेपी पर वार करके हजम करना चाहती है तो वहीं बीजेपी को विपक्ष को बैकफुट पर भेजने के लिए पुनः एक मुद्दा मिल गया।

इससे पहले मणिशंकर अय्यर का पाकिस्तान दौरा याद आ जाता है। जब उन्होंने पाकिस्तान मे मोदी सरकार को हटाने की अपील की तो राहुल क्यों पीछे रहने वाले थे, आखिर वो पार्टी के अघोषित मुखिया जो हैं।
कांग्रेस के सर्वेसर्वा युवराज ने विदेशी जमीन पर नरेन्द्र मोदी के विरोध मे शायद यह भूल गए कि वो भारत की बुराई कर बैठे हैं। अपने देश की बुराई अमेरिका मे करने से पहले भारत की जनता का मिजाज जान लेना चाहिए था।

खाट पर चर्चा
अमेरिका की चर्चा करने से पहले राहुल गांधी की खाट पर चर्चा की बात करना आवश्यक है। युवराज जनप्रिय नेता बनना चाहते हैं और किसी पालिटिकल मैनेजमेंट वाले शख्स ने खाट पर चर्चा के जरिए शख्सियत बनने का फार्मूला सुझाया। लेकिन राहुल गांधी के दिल दिमाग मे भारत की जनता की दिली इच्छा का असर नहीं हो सका। भारतीय बड़े इज्जतदार होते हैं, जहाँ कहावत है कि "एड़ी उनार कर बड़े नहीं होते" अर्थात तलवे ऊपर उठाकर लंबाई नहीं बढाते। इसे आर्थिक संदर्भ पर भी लिया जाता है। लेकिन हमारे देश मे ऐसा ही है कि फटे तो फटे पर इज्जत ना घटे और राहुल गांधी से यहीई गलती हो गई कि उन्होंने ना खाट की लाज रखी और ना भारत की इज्जत पर पर्दा डाले रह सके।

राजनीतिक विचार vs जनविचार
राजनीतिक रूप से दोनो पार्टियां व उनकी सहयोगी पार्टी अपना अपना पक्ष रख रही हैं और मामला गरीबी रेखा से ऊपर और नीचे तक पहुंच गया कि कांग्रेस युवराज ने सही फरमाया है। लेकिन जो बात खाट पर चर्चा के दौरान कहनी चाहिए थी। वो बात अमेरिका मे कहने की जरूरत नहीं थी। उस दौरान आलू की फैक्ट्री खुलवा रहे थे और अब पीएम की नाकामी गिनाने के लिए विदेशी जमीन का प्रयोग कर रहे हैं।

जनता को भी राहुल गांधी की बातें ही समझ मे नहीं आ रही हैं। अगर बातों मे सच्चाई भी है तो तथ्य ठीक से रख नहीं पा रहे हैं। इससे एक बात तय हैं कि चुनावी सरगर्मी जमीनी मुद्दों पर ना होकर ऐसे ही ऊल जलूल मुद्दों पर तेज हो जाती है फिर चुनाव भी इस आधार पर तय हो जाता है। जनता अब ये नहीं चाहती। वो भी आजादी के बाद से ऊब चुकी है कि कब उसके सपनों का भारत बनेगा ? चुनाव 2019 मे होगा पर लडा अभी से जा रहा है और जनता के मुद्दे चुनावी चक्की मे पिसते जा रहे हैं।

राहुल गांधी कहते हैं
राहुल गांधी अमेरिका मे कट्टर भारत की छवि दिखाते हैं। उनका कहना है कि मुसलमान और निष्पक्ष व सच कहने वाले पत्रकार मारे जा रहे हैं। गौरक्षा के नाम पर मुस्लिमों पर हमला हो रहा है। असल मे जो बात संसद भवन मे कहनी चाहिए थी वो बात अमेरिका मे कहने के पीछे का मन्तव्य क्या है ? हद तो तब प्रतीत हुई जब सोशल मीडिया पर अपने खिलाफ चल रहे षडयंत्र की बात कहने लगे। जबकि जितने बीजेपी के लोग सक्रिय हैं उतने ही कांग्रेस और वामपंथ सहित सहयोगी पार्टी के लोग भी सोशल मीडिया मे सक्रिय हैं।

इस प्रकार के आरोप लगाकर स्वयं पर ही छींटाकशी का प्रयास कहा जा सकता है। जिन्होंने स्वयं की जुबान से छवि पर तलवार चला ली। राहुल गांधी ने वंशवाद की बात करते हुए कांग्रेस के हारने के कारण भी गिना दिए, जबकि उन्हे पता था तो अब तक सुधार क्यों नहीं कर लिया। सूत्रों की माने तो राहुल और माँ सोनिया गांधी की भी आपस मे पटती नहीं है। जिससे कांग्रेस के अंदर भी तनाव बना हुआ है।

भाजपा के बोल
काफी दिनों से शांतचित्त मुद्रा अपनाए स्मृति ईरानी अचानक से कैमरे के सामने आ जाए तो माजरा समझ मे आ जाता है कि भाजपा के अंदर लगभग तय है कि कब कौन किस नेता को जवाब देगा। अमेठी की जंग अमेरिका तक पहुंच चुकी है। अमेठी मे राहुल गांधी - स्मृति ईरानि आमने-सामने थे तो अमेरिका और भारत से भी दोनो आमने सामने आ गए और स्मृति ईरानी ने उन्हें एक विफल वंशवादी बताया तो राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी चुटकी लेते हुए कह दिया कि देश मे कोई सुनता नहीं तो विदेश मे भाषण ठोक कर आते हैं। भाजपा के फायर ब्रांड व समयानुकूल सहज प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी राहुल गांधी के इस भाषण को गैरजरूरी बताते हुए स्पष्ट किया भाजपा के अंदर लोकतंत्र है जबकि कांग्रेस ही वंशवाद की पोषक है। कुल मिलाकर दोनो तरफ की तलवार म्यान से निकल चुकी है तो राहुल पीएम का सेहरा बांधने को भी तैयार दिख रहे हैं। जिससे प्रतीत होता है कि मोधी vs गांधी तय है।

बुद्धिजीवी क्या कहते हैं

11 सितंबर को सम्पूर्ण विश्व मे स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था। सारा जहाँ मे भारत की ऐतिहासिक आध्यात्मिक संस्कृति का व्याख्यान हो रहा था। स्वयं प्रधानमंत्री युवाओं को स्वामी जी के विचारों का अनुसरण करने का विचार दे रहे थे। युवाओं मे ऊर्जा भरने के लिए जगह जगह स्वामी जी के जीवन चरित्र पर चर्चा हुई तथा युवा भारत के जरिए न्यू इंडिया का संकल्प लिया गया।

अगले ही दिन राहुल गांधी का अमेरिका मे यह भाषण कोई खास गुल तो नहीं खिला सका परंतु कुछ बुद्धिजीवी जमात का कहना है कि वैश्विक जगत पर ठीक एक दिन बाद भारत की छवि को नष्ट करने के लिए विपक्ष व राहुल गांधी का यह कुत्सित प्रयास है। जिससे प्रतीत होता है कि समस्यायें कुछ भी हों, कितनी भी हों लेकिन विपक्ष वापस बैकफुट पर जाता प्रतीत हो रहा है।
उसका महज कारण इतना सा है कि स्वामी विवेकानंद सिर्फ भारत ही नहीं वैश्विक जगत पर अलग पहचान रखते हैं।

सरकार स्वामी जी के सपनों के भारत को प्रदर्शित करती है तो वहीं राहुल गांधी ने भारत की गैर जरूरी नकारात्मक छवि को पेश किया है। जबकि सच है कि एक जगह पर रखे बर्तन आपस मे भडभडाते हैं। इसलिये लोगों को लगता है कि सबकुछ साजिशन हुआ है। जो राहुल गांधी का अक्षम्य अपराध बताया जा रहा है।

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