भगवान श्रीराम की तपोस्थली के अगूढ़ तथ्यों को खोजकर पौ"/>

धार्मिक महत्व के साथ ऐतिहासिक वैभव के लिये मशहूर है कालिंजर

भगवान श्रीराम की तपोस्थली के अगूढ़ तथ्यों को खोजकर पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक स्थलों को विश्व धरोहर घोषित करने को लेकर शुरू हुई यात्रा पांचवे दिन नीलकंठ महादेव की स्थली कालिंजर पहुंची।

वेद पुराणों के अनुसार चारों युगों में अपना अस्तित्व रखने वाले इस स्थल की महिमा निराली है। कहते हैं समुद्र मंथन से निकले विष से संसार की रक्षा करने के लिए देवाधिदेव महादेव को विषपान करना पड़ा। शिव ने उस विष को अपने गले में धारण किया था। जहरीले विष के प्रभाव से शिव का गला नीला पड़ गया और नीले गले वाले शिव को नीलकंठ महादेव के नाम से भी पुकारा जाने लगा। कीर्तिमुख, सती का हाथ, ग्यारह सौ ग्यारह शिवलिंगों का एक लिंग सहित अनेकों मुद्राओं में शिव पार्वती की मूर्तियाँ और खंडित मूर्तियों का बेशुमार खजाना छिपाए यह स्थल धार्मिक महत्त्व के साथ साथ अपने ऐतिहासिक वैभव के लिए भी जाना जाता है। अजेय दुर्ग के रूप में कालिंजर के किले के निर्माण का इतिहास विवादग्रस्त है, लेकिन दूसरी शताब्दी से इसके अस्तित्व में आने की जानकारियाँ मिलती रही हैं। इतिहासकार फरिस्ता के अनुसार ब्राह्मणशाही राजा केदार ने सातवीं शताब्दी में इसका निर्माण कराये जाने की बात लिखी है।

राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार डा. टार के अनुसार दुष्यंत और शकुन्तला के चार पुत्रों में से किसी एक के द्वारा इसका निर्माण कराये जाने की बात कही है। शुंग, काण्ड, मौर्य और बाकाटक वंश के शासकों सहित कालिंजर लगभग आठ सौ राजाओं की राजधानी रहा है, लेकिन नौवीं शताब्दी में चंदेल वंशीय राजाओं ने इस किले का विकास कराया और इसे भव्य स्वरुप प्रदान किया। इतिहासकारों ने कालिंजर को सिकंदर की दीवार भी कहा है। चारों ओर नदी और विशाल प्रस्तर प्राचीरों से परिवेष्टित यह दुर्ग अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण था। समुद्र तल से 1230 फीट की ऊँचाई पर स्थित इस दुर्ग पर दिल्ली का हर शासक अपना अधिपत्य जमाने को आतुर रहता था। 22 मई 1545 को  महान सम्राट शेरशाह सूरी की हत्या भी यहीं हुई थी। हुमायूँ, अल्तमस, कुतुबुद्दीन ऐबक जैसे नामी गिरामी शासकों के अधीन रहे इस दुर्ग में नौवीं शताब्दी से ग्यारहवीं शताब्दी तक चंदेलों के शासन के बाद यहां बुंदेलों ने राज्य किया।

चैदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी में एक बार फिर चंदेल यहाँ के शासक बने लेकिन पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी में प्रसिद्द बुन्देली राजा छत्रसाल के वंशज हृदय दास ने पुनः इसे बुंदेलों के कब्जे में ला दिया। 1812 में इस दुर्ग पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया। आठ सौ शासकों के शासन का शायद देश में इकलौता उदाहरण है कालिंजर।

पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व वाले इस स्थल का जैसा विकास किया जाना चाहिए था वैसा कुछ भी यहाँ नजर नहीं आता। यात्रा दल जब कालिंजर किले में चढ़ने के लिए बनाये गए मार्ग से गुजर रहा था तब वहां दर्जनों लोग सड़क किनारे बैठ कर शौच कर रहे थे। पर्यटन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण किसी स्थल की शायद इससे बदसूरत तस्वीर और कोई नहीं हो सकती। पीने के पानी का समुचित प्रबंध न होने, महत्वपूर्ण स्थलों के मानचित्र का अभाव, इन स्थलों तक पहुंचने और उनकी दूरी प्रदर्शित करने वाले सूचना पटों की कमी, आकर्षक और महत्वपूर्ण मूर्तियों, उनके टुकड़ों और शिलालेखों को ताले में बंद कर रखने और सिर्फ रसूखदार लोगों को उसका दीदार कराने की नीति के कारण यहाँ आये जिज्ञासु पर्यटकों को भारी निराशा ही हाथ लगती है।

वैसे तो पुरातत्व विभाग ने इस पूरे दुर्ग को अपने कब्जे में ले रखा है, लेकिन किसी टूरिस्ट गाइड के न होने के कारण यहाँ आये लोगों को इस स्थल के तमाम पहलुओं की जानकारी नहीं मिल पाती। अगर लाल किले की तर्ज पर यहां भी कोई लाईट एण्ड साउण्ड शो शुरू किया जाये तो इस किले का इतिहास, यहाँ की शौर्य गाथाएँ लोगों को यहाँ आने के लिए प्रेरित कर सकेंगी। साथ ही पर्यटन विकसित कर स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर सृजित किये जा सकेंगे।

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  • राजकुमार याज्ञिक

    चित्रकूट जनपद के ब्यूरो चीफ एवं भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के जिलाध्यक्ष राजकुमार याज्ञिक चित्रकूट जनपद के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। पत्रकारिता में स्नातक श्री याज्ञिक मुख्यतः सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर अपनी गहरी पकड़ रखते हैं।, .



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