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पान की पीक धरती पर थूकने वालों को वन्दे मातरम् कहने का अधिकार नही

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलशितां हमारा

विचारणीय तथ्य यह है कि क्या अब हिन्दुस्तान वैसा रह गया है अथवा पूर्व मे हिन्दुस्तान ऐसा था ? अथवा हिन्दुस्तान को अतिशयोक्ति के जरिए हमेशा ऐसा बताने की कोशिश की गई है ? ये सारे सवाल इसलिये उपज रहे हैं कि कल प्रधानमंत्री ने कहा "भारत माता पर थूकने वालों को वंदेमातरम् कहने का अधिकार नहीं है।" प्रधानमंत्री का निशाना उन लोगों पर था जो पान, गुटखा खा कर पीच सर्र्रररर से जमीं पर माय देते हैं कि जोगीरा सरारारार भी फेल हो जाता है।

वास्तव मे पीएम हैं बड़े दमदार
ऐसा हम इसलिये कह रहे हैं कि उन्होंने बनारसी बाबुओं से सीधी टक्कर मोल ले ली है। बनारस मे पान बड़ा फेमस है। कोई बनारस जाए और पान ना खाए उनमें एक प्रधानमंत्री ही होगें वरना अच्छे अच्छों की कमर लचक जाती है और जुबान बाहर निकल आती है। बनारसी पान खाने के लिए मुह मे पानी आ जाता है। बनारस के लोगों का पान खाना एक बड़ा शौक है। बनारसी देश विदेश कहीं भी रहे जब तक मुंह रच ना जाए वो बनारसी कैसे कहलाएगा। इसलिये पीएम की इस बात से बनारसी बाबू अगर नाराज हो गए तो पता चलेगा कि प्याज की मंहगाई के बाद पहली बार कोई पान की दुहाई से चुनाव हार बैठा है।  

इंदिरा गांधी प्याज की माला पहनकर गली गली घूमी थीं
इसलिये अब डर लग रहा है कि सांसद की कुर्सी बचाने के लिए पीएम को पान का माला पहनकर ना घूमना पड़ जाए। आखिर हम भारतीयों की आदत है कि छूटती नहीं है। अतः अन्ततोगत्वा वक्त आने पर पीएम पर पान भारी ना पड़ जाए।

पीएम ने पते की बात कही
गंभीरता से विचार किया जाए तो प्रधानमंत्री ने हास्य व्यंग्य के समागम से स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत मिशन के लिए पते की बात कही है। हम पृथ्वी को माँ का दर्जा देते हैं। परंपरागत तरीके से शादी समारोह आदि मे पूजते हैं। इसकी मिट्टी से तिलक करते हैं और तो और भगवान की मूर्ति भी बनाते हैं। अंतः सर्वविदित है कि धरती पर थूकना एक पाप है जो कि गंगा नहाने से भी नहीं धुल सकता है। प्रधानमंत्री का पान गुटखा खाने वालों पर मनोवैज्ञानिक हमला था। वैसे उन्होंने बड़ा जोखिम लिया है।

शौचालय और पान का काकटेल
पीएम को समझना चाहिए कि जिह देश की जनता को आज भी शौचालय की उपयोगिता समझानी पड़ रही है। वो आखिर पान पर वक्तव्य कैसे सहन कर लेगें और समझदारी होती तो शौचालय बनवाने से ज्यादा शौचालय बनाने के लिए प्रचार प्रसार मे ना खर्च करना पड़ता।

बेशक बेटियां अब इस बात का निर्णय ले ले कि शादी उस घर मे करेंगी जहाँ शौचालय होगा वरना नहीं ! यह भी मुंगेरीलाल के सपने की तरह होता है। भला है मजाल कि कोई बेटी अपने वर चुनने को लेकर अभिभावकों से दो शब्द कह सके और आप शौचालय नहीं तो शादी नहीं के फार्मूले को कैसे सच साबित करेगें ? इंडिया इतना फ्लेक्सिबल होता तो फिर जाति धर्म के आधार पर प्रेम मे भी कट्टरता क्यों दिख जाती ? इसलिये प्रधानमंत्री को चिंतन करना चाहिए कि जमीन पर अभी यह सब संभव नहीं है।

भ्रष्टाचार VS स्वच्छता अभियान
स्वच्छता का सपना तब पूरा होगा जब यहाँ से भ्रष्टाचार का अंत होगा। ये पूर्ण सच है कि नियुक्त सफाईकर्मी यदाकदा ही गांव पहुंचकर सफाई करते हैं बाकी के दिनों मे अफसरों की जी हुजूरी करके महीने भर का वेतन विद कमीशन उठा लेते हैं। इसलिये प्रधानमंत्री जी निवेदन सिर्फ इतना सा है कि स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत के नाम पर चल रहे साइलेंट करप्शन का अंत कर दीजिए फिर देखिए कि कैसे स्वच्छ और स्वस्थ हो जाएगा भारत।

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